शोभन सक्सेना | भारत फुटबॉल में इसलिए पीछे है क्योंकि यहां खेल की सामाजिक और संस्थागत संस्कृति विकसित नहीं हो पाई

फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं है, बल्कि कई देशों की संस्कृति, राजनीति और सामाजिक इतिहास का हिस्सा भी है. ‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधीश त्यागी ने पत्रकार शोभन सक्सेना से बातचीत की. चर्चा का केंद्र फीफा विश्व कप, ब्राज़ील की फुटबॉल संस्कृति, अर्जेंटीना से जुड़े विवाद, फीफा की कार्यप्रणाली और भारत में फुटबॉल की स्थिति रही.

शोभन सक्सेना बताते हैं कि इस बार ब्राज़ील के विश्व कप से बाहर होने के बावजूद वहां राष्ट्रीय शोक जैसा माहौल नहीं है. इसकी वजह यह है कि लोगों को इस टीम से बहुत उम्मीदें नहीं थीं. ब्राज़ील में फुटबॉल का मतलब सिर्फ जीत नहीं है, बल्कि खूबसूरत खेल है. अगर टीम अच्छा खेलते हुए हार जाए तो लोग उसे स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन खराब खेलकर मिली जीत भी उन्हें संतुष्ट नहीं करती.

बातचीत में ब्राज़ील के फुटबॉल इतिहास पर भी विस्तार से चर्चा हुई. बताया गया कि फुटबॉल यूरोप से आया, लेकिन उसे नई पहचान दक्षिण अमेरिका ने दी. ड्रिब्लिंग, बैक हील पास और आक्रामक शैली जैसी कई चीज़ों ने आधुनिक फुटबॉल को नया रूप दिया. यह खेल गरीब बस्तियों और श्रमिक वर्ग के बीच लोकप्रिय हुआ क्योंकि यहां प्रतिभा के आधार पर पहचान बनाने का अवसर मिलता था.

शोभन सक्सेना का कहना है कि फुटबॉल ने ब्राज़ील में सामाजिक न्याय की भावना भी पैदा की. नस्लीय और आर्थिक भेदभाव झेलने वाले समुदायों के लिए मैदान वह जगह बना जहां नियम सबके लिए समान थे. पेले जैसे खिलाड़ी इसी पृष्ठभूमि से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े सितारे बने.

चर्चा में मौजूदा विश्व कप के दौरान अर्जेंटीना को लेकर उठे विवादों पर भी बात हुई. शोभन सक्सेना ने दावा किया कि रेफरिंग और वीएआर के कई फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं और सोशल मीडिया पर इन्हें लेकर लगातार बहस चल रही है. उनके मुताबिक कुछ फैसलों ने टूर्नामेंट की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं. साथ ही उन्होंने अर्जेंटीना की राजनीति, राष्ट्रपति हावियर मिले, डोनाल्ड ट्रंप और फीफा की भूमिका को लेकर भी अपने विचार रखे.

फीफा के बढ़ते व्यावसायीकरण पर भी चर्चा हुई. शोभन सक्सेना ने कहा कि विश्व कप अब आम दर्शकों की पहुंच से दूर होता जा रहा है. महंगे टिकट, बढ़ते विज्ञापन और कारोबारी मॉडल ने खेल के मूल चरित्र को प्रभावित किया है. उनके अनुसार मेज़बान देश बुनियादी ढांचे पर भारी खर्च करते हैं, जबकि सबसे बड़ा आर्थिक लाभ फीफा को मिलता है.

भारत और चीन जैसे बड़े देशों के फुटबॉल में पीछे रहने के सवाल पर शोभन सक्सेना ने कहा कि दक्षिण अमेरिका में खिलाड़ी गलियों, मोहल्लों और स्थानीय समुदायों से निकलते हैं, जबकि कई देशों ने इसे केवल अकादमी आधारित मॉडल तक सीमित कर दिया. उनका मानना है कि फुटबॉल तभी फलता-फूलता है जब वह समाज की संस्कृति का हिस्सा बन जाए.

बातचीत में यह भी कहा गया कि क्रिकेट और फुटबॉल की सामाजिक संरचना अलग रही है. यूरोप और दक्षिण अमेरिका में कई फुटबॉल क्लब अपनी राजनीतिक और सामाजिक पहचान भी रखते हैं, जबकि भारत में खेल धीरे-धीरे पूरी तरह व्यावसायिक होता गया.

एपिसोड के अंत में दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध, राजनीति और वैश्विक तनाव के बावजूद फुटबॉल आज भी दुनिया को जोड़ने वाला सबसे बड़ा खेल बना हुआ है. यही वजह है कि विश्व कप सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राजनीति को समझने का भी अवसर बन जाता है.पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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