टी. नवीन | दो नागरिक, न्याय की दो रफ्तार
‘काउंटरकरंट्स’ में टी. नवीन ने लिखा है कि सितंबर 2026 में स्वतंत्र भारतद्वाज को जंतर-मंतर पर एक छात्र प्रदर्शनकारी के पिता के साथ कथित मारपीट के मामले में गिरफ्तार किया गया. मामला तब चर्चा में आया जब एक वीडियो सामने आया, जिसमें भारतद्वाज ने कथित तौर पर हमले की बात स्वीकार की थी. गिरफ्तारी के करीब दस दिन बाद दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दे दी. अदालत ने कहा कि दस दिन की हिरासत उन्हें आत्मचिंतन के लिए पर्याप्त समय दे चुकी होगी.
इसके विपरीत उमर खालिद को उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित बड़ी साजिश के मामले में 13 सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया गया था. छह साल बाद भी वह विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं. जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी और अप्रैल में पुनर्विचार याचिका भी खारिज हो गई.
दोनों मामले एक जैसे नहीं हैं. खालिद पर आरोप अधिक व्यापक हैं और उन पर कठोर यूएपीए के तहत मामला दर्ज है. अदालतों ने जमानत के चरण में अभियोजन सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला और यूएपीए की वैधानिक पाबंदियों को ध्यान में रखा है. ये न्यायिक निष्कर्ष रिकॉर्ड का हिस्सा हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. फिर भी दोनों मामलों के बीच अंतर एक बुनियादी सवाल उठाता है कि कुछ आरोपियों के मामलों में न्याय इतनी तेजी से आगे बढ़ता है, जबकि कुछ अन्य लोगों के लिए यह वर्षों तक धीमा क्यों रहता है.
जमानत दोषमुक्ति नहीं है और हिरासत दोषसिद्धि नहीं. मुकदमे की प्रतीक्षा कर रहा व्यक्ति तब तक आरोपी है, जब तक कानून की प्रक्रिया के तहत उसका अपराध सिद्ध नहीं हो जाता. लंबी अवधि की विचाराधीन हिरासत में समस्या यह है कि अंतिम फैसला चाहे जो हो, जेल में बिताए वर्षों को वापस नहीं किया जा सकता. छह साल केवल किसी अदालती दस्तावेज में दर्ज संख्या नहीं हैं. यह छह साल की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पारिवारिक जीवन, रोजगार और सामान्य जीवन के अवसरों का नुकसान है.
गंभीर आरोपों की जांच और अभियोजन जरूरी हैं. अदालतों को सबूतों और संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विचार करना होता है. लेकिन आरोप की गंभीरता समय बीतने के सवाल को अप्रासंगिक नहीं बना सकती. सवाल यह है कि राज्य को अपना मामला साबित करने में कितना समय मिल सकता है और उससे पहले कोई आरोपी कितने समय तक जेल में रह सकता है.
यहीं राजनीतिक पहचान का सवाल भी सामने आता है. खालिद नागरिकता संशोधन कानून के विरोध और मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान की विचारधारा की आलोचना से जुड़े रहे हैं, जबकि भारतद्वाज का सार्वजनिक जुड़ाव मौजूदा सत्तारूढ़ विचारधारा के करीब बताए जाने वाले राजनीतिक माहौल से है. केवल इस आधार पर न्यायपालिका के पक्षपात का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. अदालतों का मूल्यांकन उनके आदेशों, तर्क और कानून के इस्तेमाल के आधार पर होना चाहिए.
लेकिन लोकतंत्र में यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि क्या राजनीतिक पहचान इस बात को प्रभावित करती है कि समाज और संस्थाएं किसी नागरिक के स्वतंत्रता के अधिकार को किस तरह देखती हैं. राजनीतिक भाषण के मामले में भी एक समान कसौटी होनी चाहिए. यदि सत्ता के करीब रहने वाला व्यक्ति भड़काऊ बयान देता है, तो सवाल यह होना चाहिए कि क्या उसने कोई अपराध किया है. सत्ता का विरोध करने वाले व्यक्ति के लिए भी यही सवाल पूछा जाना चाहिए. मानक राजनीतिक पहचान के आधार पर नहीं बदल सकता.
भारतीय संविधान कानून के समक्ष समानता का वादा करता है. इसका अर्थ केवल यह नहीं कि सभी नागरिकों पर एक जैसे कानून लागू हों, बल्कि यह भी है कि हर व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता और निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकार का समान भरोसा मिले. सत्ता समर्थक हो या विरोधी, बहुसंख्यक समुदाय से हो या राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय अल्पसंख्यक, सभी को उचित प्रक्रिया का समान अधिकार होना चाहिए.
लेख का सवाल यह नहीं है कि भारतद्वाज को जमानत मिलनी चाहिए थी या खालिद को जमानत मिलनी चाहिए. ये निर्णय कानून, सबूत और संबंधित मामलों की परिस्थितियों के आधार पर अदालतों को करने हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या न्याय की गति खुद किसी विशेषाधिकार का रूप ले सकती है.
यदि एक मामले में दस दिन की हिरासत को आत्मचिंतन के लिए पर्याप्त माना जा सकता है, तो दूसरे मामले में छह साल की विचाराधीन हिरासत का मानवीय और संवैधानिक महत्व भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए. यदि दोनों मामलों में अंतर है, तो उस अंतर के कानूनी कारण स्पष्ट, पारदर्शी और कानून पर आधारित होने चाहिए.
कानून के शासन की असली परीक्षा यह नहीं है कि सत्ता से सहमत लोगों के साथ कैसा व्यवहार होता है. असली परीक्षा यह है कि सत्ता से असहमत नागरिक के अधिकारों की कितनी गंभीरता से रक्षा की जाती है. न्याय का अर्थ हर मामले में समान फैसला नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए समान कानून, उचित प्रक्रिया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समय पर सुनवाई सुनिश्चित करना है.
(टी. नवीन एक स्वतंत्र लेखक हैं. यह उनके अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.)

