‘इंशाअल्लाह’ कहना भी अपराध? मुस्लिम पहचान और सुरक्षा पर बढ़ते सवाल

'आर्टिकल-14' में बेतवा शर्मा ने लिखा है कि सितंबर में सामने आई कई घटनाएं भारत में मुस्लिम समुदाय की गरिमा, सुरक्षा और नागरिक अधिकारों को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं. पश्चिम बंगाल की आईपीएस अधिकारी बुशरा बानो का तबादला एक प्रेरक वीडियो में "इंशाअल्लाह", "अस्सलामु अलैकुम" और "जज़ाकल्लाह" जैसे सामान्य शब्दों के इस्तेमाल के बाद किया गया. इसी अवधि में दिल्ली में दो मुस्लिम महिला पत्रकारों के साथ पुलिस थाने में कथित मारपीट, उत्तर प्रदेश में एक पुरानी मस्जिद का विध्वंस, असम में मुस्लिम परिवारों के घरों पर बुलडोजर कार्रवाई और बंगाली भाषी मुसलमानों को बांग्लादेश भेजे जाने के मामले सामने आए.

लेख में इन घटनाओं को मुस्लिम पहचान से जुड़े अधिकारों और पेशेवर जीवन पर बढ़ते दबाव के व्यापक संदर्भ में देखा गया है. बुशरा बानो ने वंचित पृष्ठभूमि के युवाओं को सिविल सेवा परीक्षा देने के लिए प्रोत्साहित करने वाला एक वीडियो बनाया था. इसमें उन्होंने "इंशाअल्लाह" यानी "ईश्वर की इच्छा से", "अस्सलामु अलैकुम" यानी "आप पर शांति हो" और "जज़ाकल्लाह" यानी "ईश्वर आपको इसका बदला दे" जैसे सामान्य अरबी शब्दों का इस्तेमाल किया था. एक दक्षिणपंथी संगठन की शिकायत के बाद उनका खड़गपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद से तबादला कर दिया गया.

दिल्ली से उत्तर प्रदेश तक कई घटनाएं

दिल्ली में दो मुस्लिम महिला पत्रकारों शाहीन और नफीसा खान ने आरोप लगाया कि पुलिस के साथ विवाद के बाद उन्हें थाने ले जाया गया, जहां उनके साथ थप्पड़ और मारपीट की गई. उनका कहना है कि पुलिस को उनके मुस्लिम होने की जानकारी मिलने के बाद कथित दुर्व्यवहार बढ़ गया. पुलिस ने आरोपों से इनकार किया है, जबकि दोनों पत्रकारों ने थाने की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की मांग की है.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में 5 सितंबर को एक करीब एक सदी पुरानी मस्जिद को तड़के ढहा दिया गया. प्रशासन ने इसे सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण बताया. इसके कुछ ही दिनों बाद वहां मिली 1909 अंकित ईंटों और पुराने कुएं ने मस्जिद की पुरानापन को लेकर सवाल खड़े किए. मस्जिद विध्वंस की आलोचना करने वाली यूट्यूबर हुडा जरिवाला के खिलाफ मामला दर्ज किया गया और उन्हें गिरफ्तार कर दो दिन हिरासत में रखा गया.

असम के गोलपाड़ा में भी निजी जमीन पर बने मुस्लिम परिवारों के घरों को 24 घंटे के नोटिस के बाद गिराया गया. गौहाटी हाईकोर्ट ने शुरुआती तौर पर कार्रवाई को "अवैध", "अनधिकृत" और आपदा कानून के दुरुपयोग का मामला बताया. अदालत ने यह भी कहा कि राज्य के कानून के तहत कृषि भूमि पर एक बीघा तक छोटा आवास बनाने के लिए विशेष अनुमति आवश्यक नहीं थी.

सरकारी कार्यक्रमों और नागरिकता पर सवाल

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के राज्य दौरों के दौरान वरिष्ठ मुस्लिम आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को उनके धर्म के कारण सरकारी कार्यक्रमों से अलग रखा गया. उन्होंने इस मामले को संयुक्त राष्ट्र के अल्पसंख्यक मामलों के विशेष दूत और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सामने भी उठाया है.

इसी बीच बंगाली भाषी मुसलमानों को अवैध प्रवासी बताकर बांग्लादेश भेजे जाने की घटनाओं ने नागरिकता और उचित कानूनी प्रक्रिया को लेकर चिंता बढ़ाई है. कई मामलों में अदालतों ने गलत तरीके से भेजे गए भारतीय नागरिकों को वापस लाने के आदेश दिए हैं.

66 वर्षीय जलील अख्तर का मामला इसका प्रमुख उदाहरण है. उनका नाम 2002 और 2016 की मतदाता सूचियों में दर्ज था, फिर भी उन्हें बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया. 87 दिन जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत मिली. अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने मामले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि अख्तर के पास भारतीय नागरिकता साबित करने वाले वैध दस्तावेज मौजूद थे.

इस मामले में पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठे. अख्तर के परिवार ने आरोप लगाया था कि उन्हें हथियार के बल पर पकड़ा गया और यहां तक कि कपड़े पहनने का अवसर भी नहीं दिया गया. संबंधित पुलिस अधिकारी ने इन आरोपों का व्यंग्यात्मक जवाब दिया था.

इन घटनाओं को एक साथ देखने पर बहस केवल किसी एक व्यक्ति या घटना तक सीमित नहीं रहती. सवाल यह है कि क्या धार्मिक पहचान किसी नागरिक के पेशे, आवास, अभिव्यक्ति और नागरिकता के अधिकारों को प्रभावित करने का आधार बन रही है. सितंबर में सामने आए ये मामले इसी व्यापक चिंता को सामने रखते हैं कि कानून का इस्तेमाल सभी नागरिकों के लिए समान रूप से और उचित प्रक्रिया के साथ होना चाहिए.

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