निरुपमा राव | पाकिस्तान की ‘कनेक्शन’ से बनी प्रासंगिकता कितनी टिकाऊ?
भारत की पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति और भूमिका पर लंबा लेख लिखा है. ‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित इस लेख का हिंदी में अनुदित सारांश हम यहां पेश कर रहे हैं. निरुपमा लिखती हैं कि विश्व बैंक द्वारा हाल ही में पाकिस्तान को 'दक्षिण एशिया समूह' से हटाकर 'मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और अफगानिस्तान' के साथ वर्गीकृत करने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक या सांख्यिकीय फेरबदल नहीं है. विश्व बैंक जैसे वैश्विक संस्थान जब डेटा का पुनर्गठन करते हैं, तो वे केवल भूगोल को नहीं देखते, बल्कि आर्थिक संरचनाओं, राजनीतिक जुड़ाव और विकासात्मक प्रतिमानों को भी ध्यान में रखते हैं. यह बदलाव इस बात की मौन स्वीकारोक्ति है कि पाकिस्तान अब दक्षिण एशियाई पहचान और भारतीय उपमहाद्वीप की आर्थिक गतिशीलता से दूर जा चुका है.
विश्व बैंक की गणना दर्शाती है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के हटने से दक्षिण एशिया की औसत विकास दर में उल्लेखनीय सुधार होता है. यह स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान अब उपमहाद्वीप के विकास मॉडल के विपरीत विदेशी वित्तपोषण, भारी ऋण दबाव, ऊर्जा निर्भरता और तीव्र भू-राजनीतिक अस्थिरता जैसी समस्याओं से घिर चुका है.
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से संकट और क्षणिक राहत के चक्र में फंसी है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से सहायता प्राप्त करना एक रस्म बन चुका है, जो संरचनात्मक सुधारों को टालकर केवल तात्कालिक स्थिरता देता है. इस लड़खड़ाती व्यवस्था को खाड़ी देशों (विशेषकर सऊदी अरब) से मिलने वाले वित्तीय निवेश, विलंबित भुगतान पर मिलने वाले तेल और आपातकालीन अनुदानों ने संभाल रखा है. इसके परिणामस्वरूप, पाकिस्तान की खाड़ी देशों पर निर्भरता अब सामयिक न रहकर पूरी तरह व्यवस्थागत हो चुकी है.
पाकिस्तान का यह भटकाव आकस्मिक नहीं है. अपनी स्थापना के समय से ही वह खुद को केवल एक 'दक्षिण एशियाई' राज्य के रूप में देखने से बचता रहा है, क्योंकि दक्षिण एशिया की पूरी अवधारणा स्वाभाविक रूप से भारत को केंद्र में रखती है. पाकिस्तान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कल्पना हमेशा से फारसी, मध्य एशियाई और व्यापक इस्लामी दुनिया से जुड़ी रही है.
समय के साथ इस सांस्कृतिक सोच को एक कूटनीतिक रणनीति में बदल दिया गया. पाकिस्तान ने खुद को इस्लामी दुनिया के एक अग्रिम राज्य के रूप में स्थापित किया. शीत युद्ध में पश्चिमी सुरक्षा गठबंधनों का हिस्सा बनना, 1980 के दशक के अफगान जिहाद में अमेरिका-सऊदी अरब का जरिया बनना, और 9/11 के बाद वाशिंगटन के आतंकवाद विरोधी युद्ध में अपरिहार्य बनना—इसी रणनीति का हिस्सा थे. वर्तमान में, पश्चिम एशिया के संकट के बीच वह अमेरिका और ईरान के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका तलाश रहा है.
पाकिस्तान ने यह समझ लिया है कि वह अपनी प्रासंगिकता सैन्य या आर्थिक क्षमता के पैमाने से नहीं, बल्कि अपनी भौगोलिक स्थिति की उपयोगिता से साबित कर सकता है. एक बहुध्रुवीय और बिखरी हुई वैश्विक व्यवस्था में, जहाँ महाशक्तियों के पास सीधे संवाद के साधन नहीं होते, एक 'कनेक्टर' या 'पुल' बनने की क्षमता प्रभाव का माध्यम बन जाती है. 1971 में अमेरिका और चीन के बीच ऐतिहासिक संबंध बहाल कराने में अपनी भूमिका से प्रेरित होकर, पाकिस्तान आज भी मानता है कि उसकी महत्ता तब सबसे अधिक होती है जब वैश्विक ताकतों को एक मध्यस्थ की आवश्यकता होती है.
भारत की विशाल आर्थिक और तकनीकी बढ़त के सामने अब पाकिस्तान के लिए सीधे तौर पर मुकाबला करना असंभव हो चुका है. इसलिए उसने अपनी रणनीति बदल ली है. अब वह क्षमता के बजाय फुर्ती, पैंतरेबाज़ी और गति के माध्यम से प्रतिद्वंद्वी व्यवस्थाओं के बीच जगह बनाना चाहता है. वह खुद को भारत की छाया में कैद देश मानने के बजाय, बड़े भू-राजनीतिक क्रमों के बीच एक आवश्यक मध्यस्थ के रूप में देखता है.
यद्यपि पाकिस्तान का यह व्यवहार 'मध्यम-शक्ति' जैसा दिखता है, परंतु यह यूरोप की पारंपरिक मध्यम शक्तियों से भिन्न है. यूरोप का प्रभाव आर्थिक मजबूती और संस्थागत साख पर टिका होता है, जबकि पाकिस्तान का प्रभाव केवल उसकी 'पहुँच' पर आधारित है. वह प्रतिस्पर्धी शक्तियों का संदेशवाहक तो बन सकता है, लेकिन परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रखता.
वर्तमान में अमेरिका-पाकिस्तान के बीच बढ़ा संवाद इसी सामरिक उपयोगिता का परिणाम है. वाशिंगटन को पश्चिम एशिया संकट में तेहरान तक पहुँचने के लिए पाकिस्तान के संबंधों की आवश्यकता है. हालाँकि, यह मध्यस्थता किसी दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी का संकेत नहीं है. अमेरिकी रणनीति के केंद्र में आज भी इंडो-पैसिफिक को लेकर भारत ही है. चीन के साथ पाकिस्तान के प्रगाढ़ संबंध और उसकी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अमेरिकी प्रतिष्ठान में गहरा अविश्वास अब भी कायम है. अतः, पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से बुनियादी नहीं, बल्कि केवल सामरिक रूप से उपयोगी माना जा रहा है.
पाकिस्तान का यह पश्चिम की ओर झुकाव दक्षिण एशिया के लिए गंभीर निहितार्थ रखता है. यह इस बात का संकेत है कि एक सुसंगत आर्थिक और रणनीतिक इकाई के रूप में 'दक्षिण एशिया' की मूल अवधारणा अब बिखर रही है.
यह बदलाव वैश्विक व्यवस्था में हो रहे बड़े परिवर्तन का ही रूप है, जहाँ महाद्वीपों और गुटों के पुराने भूगोलीय नक्शे अप्रासंगिक हो रहे हैं. अब देशों की पहचान इस बात से नहीं होती कि वे नक्शे पर कहाँ स्थित हैं, बल्कि इससे होती है कि वे पूंजी प्रवाह, ऊर्जा निर्भरता और रणनीतिक संपर्क के किन नेटवर्कों का हिस्सा हैं. पाकिस्तान का पुनवर्गीकरण इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आधुनिक युग में निर्भरता और कनेक्शन की वास्तविकताएं भूगोल की सीमाओं को पीछे छोड़ चुकी हैं. हालांकि, बिना आंतरिक आर्थिक सुधारों, सामाजिक एकजुटता और संस्थागत स्थिरता के, केवल 'कनेक्शन' के आधार पर निर्मित यह प्रासंगिकता कितनी टिकाऊ होगी, यह एक अनुत्तरित सवाल है.

