अपूर्वानंद | जो आरएसएस कहता है, उस पर नहीं, जो करता है उस पर ध्यान देना चाहिए 

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव इंटरव्यू में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और प्रोफेसर अपूर्वानंद ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैश्विक छवि निर्माण की कोशिशों, हिंदुत्व राजनीति, इज़राइल के साथ भारत के संबंधों और भारतीय विदेश नीति की बदलती दिशा पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत इस सवाल से हुई कि आखिर क्यों आरएसएस दुनिया भर में जाकर यह कह रहा है कि भारत में मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के साथ कोई भेदभाव नहीं हो रहा, जबकि देश के भीतर भाजपा शासित राज्यों के कई नेता खुले तौर पर मुसलमान विरोधी बयान दे रहे हैं.

प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि आरएसएस इस समय अपना “शताब्दी वर्ष अभियान” चला रहा है, जिसके तहत भारत और विदेशों में अपनी छवि सुधारने की कोशिश की जा रही है. उनके अनुसार अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बढ़ते हिंदू प्रवासी समुदाय को संघ वैचारिक और आर्थिक समर्थन के बड़े स्रोत के रूप में देखता है. उन्होंने कहा कि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के कमजोर होने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल बनने की बात कही गई है, जिससे संघ अपनी वैश्विक छवि को लेकर चिंतित है.

बातचीत में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और बंगाल भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के बयानों का भी उल्लेख हुआ. अपूर्वानंद ने आरोप लगाया कि भाजपा और आरएसएस की राजनीति में मुसलमान विरोध स्थायी तत्व बन चुका है. उन्होंने कहा कि संघ एक तरफ समानता और भाईचारे की भाषा बोलता है, जबकि दूसरी तरफ उसके प्रभाव वाले नेता नफरत और विभाजन की राजनीति करते हैं. उनके अनुसार “आरएसएस का मतलब ही दोहरी भाषा और पाखंड है.”

इंटरव्यू में आरएसएस की संरचना और जवाबदेही पर भी चर्चा हुई. अपूर्वानंद ने कहा कि संघ देश के सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक है, लेकिन वह पंजीकृत संस्था नहीं है और उसकी वित्तीय पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल मौजूद हैं. उन्होंने कहा कि संघ की सदस्यता, धन और गतिविधियों पर सार्वजनिक जवाबदेही लगभग नहीं के बराबर है.

बातचीत का बड़ा हिस्सा मोहन भागवत और आरएसएस नेतृत्व के बयानों की विरोधाभासी प्रकृति पर केंद्रित रहा. अपूर्वानंद ने कहा कि एक तरफ भागवत “सभी भारतीयों का डीएनए एक” बताते हैं, वहीं दूसरी तरफ “घुसपैठ” और “राज्यतंत्र में साजिश” जैसी बातें भी करते हैं. उनके अनुसार भारत में अब सवाल पूछने की परंपरा कमजोर हो गई है और मीडिया तथा अभिजात वर्ग संघ नेतृत्व से कठिन सवाल पूछने से बचता है.

इंटरव्यू में इज़राइल और हिंदुत्व राजनीति के वैचारिक संबंधों पर भी लंबी चर्चा हुई. अपूर्वानंद ने कहा कि आरएसएस की शुरुआती प्रेरणा यूरोपीय फासीवाद और बेनितो मुसोलिनी जैसे नेताओं से जुड़ी रही है. उनके अनुसार हिंदुत्व और जियोनिज्म दोनों में “बहुसंख्यक श्रेष्ठता”, “पवित्र भूमि” और “सांस्कृतिक शुद्धता” की राजनीति समान रूप से दिखाई देती है. उन्होंने दावा किया कि आरएसएस अब इज़राइल को एक आदर्श राज्य की तरह देखता है, क्योंकि उसके अनुसार इज़राइल फिलिस्तीनियों के साथ वही व्यवहार कर रहा है, जिसकी कल्पना हिंदुत्ववादी राजनीति भारत के मुसलमानों के लिए करती है.

नरेंद्र मोदी और बेंजामिन नेतन्याहू के रिश्तों पर टिप्पणी करते हुए बातचीत में कहा गया कि आज भारत की विदेश नीति पहले जैसी नैतिक स्थिति में नहीं दिखती. अपूर्वानंद ने कहा कि कभी भारत फिलिस्तीन, दक्षिण अफ्रीका, वियतनाम और तिब्बत जैसे संघर्षों में उत्पीड़ित समाजों की आवाज माना जाता था, लेकिन अब वह अमेरिका और इज़राइल जैसे ताकतवर देशों के साथ खड़ा दिखाई देता है. उन्होंने कहा कि ब्रिक्स और ईरान जैसे सवालों पर भी भारत पहले जैसी स्वतंत्र और स्पष्ट भूमिका निभाने में असफल दिख रहा है.पूरी वीडियो यहाँ देखी जा सकती है. 

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