श्रवण गर्ग | राहुल ग़ुस्से में हैं ! क्या करेंगे ? तीसरी ‘भारत जोड़ो’ यात्रा ?

मान लिया जाना चाहिए कि अमित शाह मानसून सत्र के बचे दो दिनों में भी लोकसभा का रुख़ नहीं करेंगे ! हक़ीक़त में तो उनके सदन में आने की कोई ज़रूरत भी नहीं बची है. उनके द्वारा पेश किए जाने वाले विधेयक जूनियर मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत करवाए जा चुके हैं. गृहमंत्री अगर सदन में आ जाते तब भी अपनी सफ़ाई या दावों में इससे ज़्यादा क्या कुछ नया बोलते जो उनके एक मंत्री जितेंद्र सिंह सदन के भीतर और दूसरे मंत्री जे पी नड्डा बाहर बोल चुके हैं ? नड्डा के कहे हुए को गृहमंत्री का आधिकारिक स्टेटमेंट भी माना जा सकता है.

जितेंद्र सिंह ने ऑन रिकॉर्ड संसद में बोल दिया था कि बीस जुलाई को छात्रों पर कोई शूटिंग नहीं हुई. नड्डा ने तो उनसे भी चार कदम आगे बढ़कर यह कह दिया कि राहुल गांधी झूठ बोल रहे हैं. वे अराजकता फैलाना चाहते हैं. जंतर मंतर पर न तो कोई गोलियाँ चलाई गईं और न गोली चलाने के कोई ऑर्डर दिए गए. तृणमूल सांसद साकेत गोखले को आरटीआई के जवाब में मिली आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ दिल्ली के सिर्फ़ दो अस्पतालों में ही पैलेट गन के शिकार दस घायलों का इलाज किया गया है. बाकी दो अस्पतालों, जिनमें एक AIIMS भी शामिल है, की जानकारी प्राप्त होना अभी बाकी है. पैलेट गन से घायल हुए लोगों का आँकड़ा अभी तक तीन-चार तक ही सीमित था. क्या जवाब दे पाएँगे अमित शाह ?

अनुमान लगाया जा सकता है कि विपक्ष की माँगों पर सरकार के मंत्रियों द्वारा दिए जा रहे जवाबों और किए जा रहे हमलों से राहुल गांधी पूरी तरह उखड़ चुके हैं ! शायद इसीलिए अमित शाह के बयान की विपक्षी माँग को लेकर किरण रिजुजू के मार्फ़त सरकार द्वारा करवाई गई पेशकश पर राहुल गांधी ने ग़ुस्से से दो टूक जवाब दे दिया कि उन्हें गृहमंत्री की स्पीच नहीं सुननी है. उन्हें सिर्फ़ एक सवाल का जवाब चाहिए कि जंतर मंतर की बर्बरता के लिए कौन दोषी है ?

अमित शाह बोलना नहीं चाहते और मोदीजी मौन हैं. प्रधानमंत्री शायद आश्चर्य में हों कि बारह सालों में पहली बार ऐसा हो रहा है कि राहुल गांधी के निशाने पर उनका सबसे प्रिय और निकटस्थ व्यक्ति है जो उनके लिए विपक्ष से लड़ता रहा है. क्या मोदीजी अपना मौन पंद्रह अगस्त को लालक़िले पर ही तोड़ेंगे ? बिना राहुल का नाम लिए ‘अराजकता’ फैलाने के लिए विपक्ष को धिक्कारेंगे ? युवाओं को उनकी ‘गलती’ के लिए माफ़ करने और उन्हें गले लगाने की स्क्रिप्ट एक बार फिर दोहराएँगे ? क्या विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी भीड़ में बैठे मोदीजी को सुनते नज़र आएँगे ?

लोग जानना चाहते हैं : पिक्चर अगर अभी बाक़ी है तो आगे का सीन क्या बनने वाला है ? क्या ‘जंतर मंतर’ से प्रारंभ हुई लड़ाई पंद्रह अगस्त के बाद सरकार के लिए अपने अस्तित्व की रक्षा करने और विपक्ष के लिए देश की दूसरी आज़ादी के संघर्ष में बदल सकती है ?

भय व्यक्त किया जाना चाहिए कि देश के संसदीय इतिहास में जो नजारा संसद-परिसर में पहली बार (11 अगस्त को) प्रकट हुआ, जिसमें एनडीए और विपक्ष के सांसद अपने-अपने प्रदर्शनों के दौरान एक दूसरे के सामने आ गए और सुरक्षाकर्मियों को दीवार बनकर उनके बीच खड़ा होना पड़ा, क्या देश की सड़कों पर रिपीट हो सकता है ? ऐसा हुआ तो क्या सत्तारूढ़ दल के समर्थक लोकतांत्रिक औज़ारों और संवैधानिक संसाधनों की ही मदद लेंगे अथवा ‘जंतर मंतर’ का प्रयोग ही हर जगह दोहराया जाएगा ?

क्या राहुल को अपनी तीसरी और निर्णायक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकलना पड़ सकता है ?

श्रवण गर्ग वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनितिक टिप्पणीकार हैं.

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