ओडिशा में बॉक्साइट की लूट, भंडारों के ‘दोहन’ पर जताई चिंता
सत्यसुंदर बारीक की रिपोर्ट के अनुसार, ओडिशा में बॉक्साइट खदानों की अंधाधुंध नीलामी को लेकर पर्यावरण और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने गंभीर चिंता व्यक्त की है. उनका आरोप है कि राज्य में बॉक्साइट का उत्पादन देश की वास्तविक आवश्यकताओं से कहीं अधिक हो रहा है, जिससे पूर्वी घाट की अत्यंत संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाएं नष्ट हो रही हैं. देश का 55 प्रतिशत से अधिक बॉक्साइट भंडार ओडिशा के पांच दक्षिण-पश्चिमी जिलों—बरगढ़, बलांगीर, कालाहांडी, रायगड़ा और कोरापुट में गंधमार्दन, नियमगिरी, कर्लापाट, सिजीमाली और देवमाली जैसी प्रमुख पहाड़ियों में केंद्रित है.
गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार विजेता प्रफुल्ल सामंतरा के अनुसार, बॉक्साइट अयस्क प्रकृति का एक 'वॉटर स्पंज' है, जो बारिश के पानी को सोखकर भूमिगत जल के रूप में संचित करता है और उसे प्राकृतिक झरनों व बारहमासी नदियों में धीरे-धीरे छोड़ता है. वर्तमान में नाल्को, ओएमसी और आदित्य बिड़ला ग्रुप जैसी कंपनियों द्वारा किए जा रहे खनन से जल स्रोत सूख रहे हैं और नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं. यदि खनन प्रक्रिया जारी रही, तो सिजीमाली और जलापुट क्षेत्रों के लगभग 50 झरने, कर्लापाट के 18 झरने और माली पहाड़ी की 36 नदियां/धाराएं पूरी तरह समाप्त हो सकती हैं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता नरेंद्र मोहंती ने कहा कि घरेलू ज़रूरत से ज़्यादा खनन करना भावी पीढ़ियों और स्थानीय जनजातियों के साथ अन्याय है. कॉर्पोरेट समूहों (जैसे अडानी और वेदांत) को एल्युमिना हब बनाने के नाम पर खदानें सौंपने से कोलाब, सबेरी, झांजावती, नागावली और तेल जैसी प्रमुख नदियां सूखने की कगार पर हैं. इससे कृषि और बाजरा (मिलेट) की खेती तबाह हो रही है, जिससे हजारों परिवारों के सामने गंभीर खाद्य संकट और आजीविका का खतरा पैदा हो गया है.
कार्यकर्ता विश्वजीत राय ने स्पष्ट किया कि दिए गए खनन पट्टे वन अधिकार अधिनियम, पेसा कानून, 1996 और 1956 के जनजातीय भूमि संरक्षण नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करते हैं. ग्राम सभाओं के अधिकारों को अनदेखा करके "बॉक्साइट की लूट" की जा रही है. पुलिसिया कार्रवाई और जेल जाने के बावजूद स्थानीय आदिवासी समुदाय इसके खिलाफ एकजुट हैं. कार्यकर्ताओं ने सरकार से सभी नीलामी अधिसूचनाएं रद्द करने, अंधाधुंध खनन रोकने और कॉर्पोरेट पक्षपातपूर्ण नीतियों को समाप्त करने की मांग की है.

