निहार नलिनी सारंगी | हंकार का गणित: दो उपचुनाव, भाजपा के लिए एक चेतावनी

करीब एक हजार किलोमीटर की दूरी पर हुए दो उपचुनावों ने एक जैसा संदेश दिया है. यह संदेश विचारधारा का नहीं, बल्कि उस राजनीति का है जो चुनाव लड़ने के बजाय अपनी जीत को तय मान लेती है.

3 अगस्त को पटना के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया से आए नतीजों ने भाजपा के लिए असहज सवाल खड़े कर दिए. बांकीपुर में भाजपा के नितिन नवीन, जिन्होंने पिछले 15 वर्षों से सीट पर कब्जा बनाए रखा था और आठ महीने पहले 62.66 प्रतिशत वोटों के साथ जीते थे, उन्हें पहली बार चुनाव लड़ रहे प्रशांत किशोर ने 18,953 वोटों से हरा दिया. वहीं दतिया में भाजपा ने पूरी संगठनात्मक ताकत झोंक दी, लेकिन कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने 6,016 वोटों से जीत दर्ज कर ली. दोनों राज्यों के मुद्दे अलग थे, लेकिन दोनों नतीजों ने भाजपा की चुनावी रणनीति में एक जैसी कमजोरी की ओर इशारा किया.

दो सीटें, एक ही निष्कर्ष

बांकीपुर और दतिया को किसी राष्ट्रीय लहर का संकेत मानना जल्दबाजी होगी. बिहार का उपचुनाव एक नई राजनीतिक पार्टी के उदय का मंच था, जबकि दतिया अपेक्षाकृत स्थानीय मुकाबला था. इसके बावजूद दोनों चुनावों में भाजपा ने अपनी संगठनात्मक ताकत और पुराने जनाधार को मतदाताओं को फिर से मनाने का विकल्प मान लिया.

बांकीपुर में विधानसभा चुनाव की तुलना में मतदान सात प्रतिशत से अधिक घट गया. इससे संकेत मिला कि भाजपा का एक हिस्सा जीत को तय मानकर मतदान के लिए निकला ही नहीं. दतिया में शुरुआती बढ़त बाद के दौर में खत्म हो गई और हार के बाद भाजपा उम्मीदवार ने जनता से अधिक संगठन के भीतर मतभेदों की बात की. दोनों घटनाएं बताती हैं कि चुनाव अभियान मतदाता की अपेक्षाओं से कट गया था.

आंकड़ों के पीछे का बदलाव

इन नतीजों का महत्व केवल जीत-हार में नहीं, बल्कि मतदाताओं के बदलते व्यवहार में है. पिछले एक दशक में भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उसकी "अपरिहार्यता" की छवि रही है. लेकिन उपचुनाव वह अवसर होते हैं, जहां मतदाता बिना सरकार बदले भी अपनी नाराजगी दर्ज कर सकते हैं.

बांकीपुर में मतदाताओं ने आठ महीने पहले भारी बहुमत से चुने गए उम्मीदवार के बजाय एक नए चेहरे को मौका दिया. दतिया में उन्होंने ऐसी पार्टी को झटका दिया, जिसने अपनी जीत पहले ही तय मान ली थी.

यहीं सबसे बड़ा बदलाव दिखाई देता है. मतदाता अब हर चुनाव को सत्ता की पुष्टि नहीं, बल्कि उसे सुधारने का अवसर मानने लगे हैं. अतिआत्मविश्वास केवल एक भावना नहीं, बल्कि उम्मीदवार चयन, प्रचार, स्थानीय नेतृत्व को सुनने और मतदाता से संवाद जैसे फैसलों का परिणाम होता है. इन दोनों चुनावों ने दिखाया कि भाजपा ने कई फैसले मतदाता की अपेक्षाओं के बजाय अपनी धारणाओं के आधार पर लिए.

अतिआत्मविश्वास का जाल

भारतीय राजनीति में अतिआत्मविश्वास का एक परिचित ढांचा है—स्थानीय नेतृत्व की बात कम सुनना, संगठनात्मक ताकत पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना और उम्मीदवार चयन में निष्ठा को प्राथमिकता देना.

बांकीपुर में भाजपा ने अपने शहरी गढ़ को लगभग अभेद्य मान लिया. दतिया में कांग्रेस विधायक की अयोग्यता को जीत की गारंटी समझा गया. इसके विपरीत विपक्ष ने स्थानीय स्तर पर मतदाताओं तक पहुंचने और उन्हें मनाने में ज्यादा मेहनत की.

इन परिणामों को 2028 के आम चुनाव का पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता. स्थानीय परिस्थितियां और उम्मीदवार अब भी निर्णायक हैं. लेकिन एक ही दिन दो अलग-अलग राज्यों में मिले ऐसे झटके यह बताते हैं कि भाजपा की सबसे बड़ी चुनावी पूंजी—उसकी "अजेय" छवि—अब अपने आप काम नहीं कर रही. उसे हर सीट पर दोबारा अर्जित करना होगा.

जातीय गणित से आगे

इन नतीजों की एक और व्याख्या भी है. लंबे समय तक भारतीय चुनावों को जातीय समीकरणों से समझा जाता रहा. लेकिन अब आजीविका और रोजगार उस गणित को चुनौती देते दिख रहे हैं.

बिहार का उपचुनाव ऐसे समय हुआ, जब परीक्षा पत्र लीक, छात्र आंदोलनों और युवाओं की बेरोजगारी राष्ट्रीय बहस का विषय बने हुए थे. इससे केवल छात्र ही नहीं, बल्कि उनके परिवार भी प्रभावित हुए. जिन घरों में पहले जातीय समीकरण चुनावी चर्चा का केंद्र होते थे, वहां अब रोजगार और भविष्य की चिंता ज्यादा बड़ी हो चुकी है.

ऐसे में यदि कोई दल अब भी केवल जातीय समीकरणों के आधार पर चुनाव लड़ रहा है, तो संभव है कि वह उस सवाल का जवाब दे रहा हो, जिसे मतदाता अब पहले जितना महत्वपूर्ण नहीं मानते.

उत्तर प्रदेश से पहले एक शुरुआती झटका

इन दोनों उपचुनावों का महत्व बिहार और मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है. इन्हें 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले एक शुरुआती संकेत के रूप में भी देखा जा सकता है.

उत्तर प्रदेश भाजपा की सबसे मजबूत राजनीतिक प्रयोगशाला रहा है, जहां गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों का सामाजिक गठबंधन उसकी लगातार जीत की बुनियाद बना. लेकिन यही राज्य सरकारी नौकरियों की कमी, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं की बेरोजगारी से भी सबसे अधिक प्रभावित है.

यदि जातीय गणित की जगह आजीविका और रोजगार का नया राजनीतिक गणित उभर रहा है, तो बांकीपुर और दतिया केवल दो उपचुनाव नहीं, बल्कि उस बदलाव के शुरुआती संकेत हैं.

3 अगस्त के इन दोनों नतीजों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अतिआत्मविश्वास कोई भावना नहीं, बल्कि राजनीतिक फैसलों की एक श्रृंखला है. भारतीय मतदाता अब उन फैसलों का मूल्यांकन पहले से अधिक गंभीरता से कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश का चुनाव बताएगा कि भाजपा ने इस चेतावनी को सुना है या नहीं.

निहार नलिनी सारंगी सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक हैं. मूल लेख अंग्रेज़ी में Countercurrents.org पर पढ़ा जा सकता है.

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