आकार पटेल | 2014 के बाद भारत-इज़राइल संबंध सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक निकटता भी बढ़ी

'हरकारा डीप डाइव' के इस एपिसोड में निधीश त्यागी के साथ लेखक, टिप्पणीकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल बातचीत करते हैं. चर्चा का केंद्र एमनेस्टी इंटरनेशनल की 30 जुलाई को जारी वह रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया है कि अक्टूबर 2023 से नवंबर 2025 के बीच भारत से इज़राइल को 2,596 सैन्य शिपमेंट भेजे गए. रिपोर्ट के अनुसार इनमें हथियारों और सैन्य उपकरणों के ऐसे पुर्जे भी शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल गाज़ा में हो रहे सैन्य अभियान में किया जा सकता है.

आकार पटेल का कहना है कि भारत केवल व्यापार नहीं कर रहा, बल्कि ऐसे समय में सैन्य सामग्री भेज रहा है जब इज़राइल पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों में गंभीर आरोपों की सुनवाई चल रही है. उनके अनुसार भारत सरकार को इन परिस्थितियों की पूरी जानकारी होने के बावजूद शिपमेंट जारी रहे. बातचीत में यह भी आरोप लगाया गया कि रिपोर्ट सरकार को भेजे जाने के बाद सार्वजनिक कस्टम डेटा तक सीमित कर दिया गया, जिससे इन शिपमेंट्स की निगरानी कठिन हो गई.

चर्चा का दूसरा बड़ा सवाल भारत-इज़राइल संबंधों की बदलती प्रकृति है. आकार पटेल का तर्क है कि 1991 के बाद संबंध सामान्य हुए, लेकिन 2014 के बाद दोनों देशों की राजनीतिक निकटता नई दिशा में बढ़ी. उनके अनुसार यह बदलाव केवल व्यापार या रणनीतिक जरूरतों से नहीं, बल्कि शासन के मॉडल और सुरक्षा नीति की समानताओं से भी जुड़ा दिखाई देता है. इसी संदर्भ में पेगासस, निगरानी तंत्र और नागरिक स्वतंत्रताओं पर भी चर्चा होती है.

बातचीत में यह भी कहा गया कि भारत खुद को "ग्लोबल साउथ की आवाज़" बताता है, लेकिन यदि वह ऐसे संघर्ष में हथियारों की आपूर्ति करता है तो उसकी नैतिक और कूटनीतिक विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है. आकार पटेल का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की दावेदारी जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी ऐसे फैसलों का असर पड़ सकता है. साथ ही वे भारत द्वारा गाज़ा में कृत्रिम अंगों के अस्पताल बनाने की घोषणा और दूसरी ओर सैन्य सामग्री के निर्यात को विरोधाभासी बताते हैं.

एमनेस्टी की कार्यप्रणाली पर उठने वाले सवालों का जवाब देते हुए आकार पटेल बताते हैं कि संस्था अपनी रिपोर्ट कानूनी विशेषज्ञों, मानवाधिकार शोधकर्ताओं और उपलब्ध दस्तावेज़ी प्रमाणों के आधार पर तैयार करती है. उनका कहना है कि रिपोर्टों का उद्देश्य किसी सरकार को निशाना बनाना नहीं, बल्कि मानवाधिकारों के संभावित उल्लंघनों की तथ्यात्मक पड़ताल करना है.

चर्चा के अंतिम हिस्से में भारत के भीतर छात्रों के आंदोलनों, असहमति पर सरकारी रवैये और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर बात होती है. आकार पटेल का कहना है कि नागरिकों को इन मुद्दों को चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना होगा, क्योंकि लोकतंत्र में नीतियों का अंतिम मूल्यांकन जनता ही करती है. पूरी चर्चा का केंद्रीय प्रश्न यही है कि क्या भारत की विदेश नीति, मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन बना पा रही है, या फिर यह संतुलन लगातार कठिन होता जा रहा है. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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