बिहार के झटके के बाद, अगड़ी जातियों का असंतोष उत्तर प्रदेश में भाजपा को नुकसान पहुँचाएगा?
बिहार के बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद पार्टी के भीतर उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर चिंताएँ गहरी हो गई हैं. भाजपा के पारंपरिक और सबसे मजबूत वोट बैंक—उच्च जातियों (विशेष रूप से ब्राह्मण और ठाकुर)—के बीच पनप रहे असंतोष को इस हार का मुख्य कारण माना जा रहा है. पार्टी के शीर्ष रणनीतिकारों को डर है कि यदि इस असंतोष को समय रहते दूर नहीं किया गया, तो 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को बड़ा राजनीतिक नुकसान झेलना पड़ सकता है.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लालमणि वर्मा और विकास पाठक की रिपोर्ट है कि उच्च जातियों के गुस्से की मुख्य वजह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा जारी किए गए नए समानता (इक्विटी) नियम हैं, जिन्हें इस साल की शुरुआत में अधिसूचित किया गया था. इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना था. हालाँकि, उच्च-जातीय छात्रों और संगठनों ने इसका तीखा विरोध किया. उनका तर्क था कि ये नियम जातिगत आधार पर समाज में विभाजन पैदा करेंगे और सामान्य वर्ग के छात्रों के उत्पीड़न का जरिया बन सकते हैं. मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इन नियमों पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि ये समाज को विभाजित कर सकते हैं और इनके व्यापक परिणाम हो सकते हैं.
इस विरोध प्रदर्शन को दिल्ली के जंतर-मंतर पर वामपंथी और आंबेडकरवादी संगठनों का समर्थन मिला, लेकिन इसे असली ताकत शहरी, उच्च-जातीय परिवारों और युवाओं की भागीदारी से मिली. इसके अलावा, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक के मुद्दों ने युवाओं के गुस्से को और भड़का दिया. जयपुर में राजपूत करणी सेना द्वारा निकाला गया विरोध मार्च इस बात का संकेत है कि यह असंतोष केवल यूपी या बिहार तक सीमित न होकर पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र (जैसे राजस्थान और हरियाणा) में फैल रहा है.
भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक का दर्द और राजनीतिक गणित
उत्तर प्रदेश के स्थानीय भाजपा नेता, विशेषकर सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अयोध्या और लखीमपुर खीरी के ब्राह्मण व ठाकुर प्रतिनिधि, इस स्थिति से बेहद असहज हैं.
उच्च जातियों का तर्क है कि वे राम जन्मभूमि आंदोलन और पार्टी के शुरुआती संघर्ष के दिनों से भाजपा के साथ मजबूती से खड़े रहे हैं. ऐसे में जब पार्टी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और दलितों को अपने साथ जोड़ने पर ध्यान केंद्रित कर रही है, तो उनके हितों की अनदेखी की जा रही है.
स्थानीय नेताओं के अनुसार, नाराज उच्च जाति के मतदाता कांग्रेस या सपा (यादव वोट बैंक के कारण) के बजाय बसपा को एक विकल्प के रूप में देख सकते हैं या चुनाव में वोट देने से परहेज कर सकते हैं. 2024 के चुनावों में ठाकुर समुदाय की नाराजगी के कारण यूपी में भाजपा की सीटें 62 से घटकर 33 रह गई थीं. मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर और कैराना जैसी सीटों पर मिली हार और मेरठ व मथुरा में जीत का कम अंतर इसी असंतोष का परिणाम था.
बढ़ते दबाव को देखते हुए भाजपा का केंद्रीय और प्रांतीय नेतृत्व स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास में जुट गया है.
पिछले दिनों यूपी की अपनी यात्रा के दौरान बंद कमरे में हुई बैठकों में पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन और संगठन महामंत्री बी. एल. संतोष ने नेताओं से न घबराने की अपील की. उन्होंने स्पष्ट किया कि यूजीसी नियमों की मंशा गलत नहीं थी, बल्कि अधिसूचना में शब्दों के चयन की गड़बड़ी के कारण गलत संदेश चला गया. सरकार इसमें सुधार करने की प्रक्रिया में है.
संगठन ने स्थानीय नेताओं को निर्देश दिया है कि वे जनता के बीच जाकर स्थिति को संभालें और सरकार द्वारा उठाए गए सकारात्मक कदमों से लोगों को अवगत कराएं.
फिलहाल करणी सेना जैसी लामबंदी को राजस्थान जैसे राज्यों के प्रभावशाली सामाजिक दिग्गजों का पूर्ण समर्थन नहीं मिला है, लेकिन युवाओं और उच्च जातियों के भीतर बेरोजगारी, परीक्षा में गड़बड़ी और यूजीसी नियमों को लेकर सुलगता गुस्सा भाजपा के लिए बड़ी चेतावनी है. केंद्र में सत्ता बनाए रखने के लिए उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत रखना भाजपा के लिए अनिवार्य है, जिसके लिए उसे अपने पारंपरिक वोट बैंक के विश्वास को पुनः बहाल करना होगा.

