राकेश कायस्थ | अगर चोर दरवाजे से परिसीमन हुआ तो मैं क्या करूँगा?
आप इसे समाज और सरकार के नाम एक आम नागरिक का एलान मान सकते हैं. फरमान हमेशा सरकार जारी करती आई है, लेकिन अब इस देश के नागरिक भी फरमान जारी करेंगे, क्योंकि इस देश के असली मालिक आम नागरिक हैं. वही नागरिक, जिनसे उनकी नागरिकता का सबूत माँगा जा रहा है. आज अगस्त क्रांति दिवस है. आज ही के दिन 1942 को महात्मा गाँधी ने “करो या मरो” का नारा दिया था. गाँधीजी ने कहा था, “स्वराज कायरों के लिए नहीं है.”
इस देश की सरकार कायर है, उसे लोकतंत्र और विधिसम्मत संवैधानिक प्रक्रियाओं से डर लगता है, इसलिए वो हमेशा अपने लिए चोर दरवाजे ढूँढती है. लेकिन देश की जनता कायर नहीं है. सरकार वहीं पैंतरा अपनाने जा रही है, जिसकी कोशिश में वो अप्रैल में नाकाम हो चुकी है—यानी महिला आरक्षण की आड़ में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना और परिसीमन करके भारत में एकदलीय व्यवस्था की नींव रखना, ताकि भारत की मुख्य विभाजक शक्ति आरएसएस अनंत काल तक सत्ता का सुख भोग सके.
खबर है कि सोमवार को यह विधेयक फिर से लाया जा सकता है. ईडी-सीडी के दम पर तृणमूल के करीब बीस सांसद तोड़े जा चुके हैं. शिवसेना के उद्धव गुट के भी कुछ और सांसदों को खरीदे जाने की खबर है. बाकी कुछ लोगों को अनुपस्थित करा कर या किसी और तरीके से मैनेज करके बिल पास करवा लिया जाएगा. बतौर नागरिक, मैं ऐसे किसी भी षड्यंत्र का विरोध करता हूँ. कारण बहुत स्पष्ट हैं, जो आपके सामने बिंदुवार रख रहा हूँ.
1. महिला आरक्षण विधेयक संसद पहले ही पास कर चुका है. तमाम विपक्षी पार्टियाँ इस बात पर एकमत हैं कि अगर मौजूदा सदस्य संख्या में से एक तिहाई आरक्षण महिलाओं को देना हो, तो वो इसका समर्थन करेंगी. लेकिन मोदी सरकार बड़ी धूर्तता से महिलाओं के नाम पर लोकसभा के सदस्यों की संख्या बढ़ाना चाहती है.
दलील ये दी जा रही है कि देश की जनसंख्या बढ़ गई है, इसलिए लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़नी चाहिए. ये दलील इतनी विचित्र है कि मुझे ताली बजाकर बधाई माँगने वाली प्रजाति की याद आ रही है—“लल्ला हुआ इस बार तो दोगुनी बधाई लूँगी, हाँ.”
2. इस सफेदपोश परजीवी प्रजाति से पूछा जाना चाहिए कि जनता की सेवा करने के लिए आपको लोकसभा में लगभग 300 और कुर्सियाँ क्यों चाहिए. इसलिए, ताकि आप महिला आरक्षण के नाम पर अपनी बीवी, बहू और बेटियों को वहाँ बिठा सकें, हमारे टैक्स के पैसे से गुलछर्रे उड़ा सकें. और आप उम्मीद करते हैं कि बतौर नागरिक हम ऐसा होने देंगे.
3. आप हर बात में नागरिकों से हिसाब माँगते हैं. इनकम टैक्स कंपनी काट चुकी होती है, फिर भी रिटर्न भरवाते हैं, फिर उसमें गलतियाँ निकलवाते हैं और सफाई माँगते हैं. पूरा आयकर और जीएसटी भरकर हम अपनी आधी कमाई आपके हवाले कर चुके होते हैं और इसके बदले में आप हमें गंदा पानी पीने को मजबूर करते हैं और ऐसी सड़कों पर चलने को बाध्य करते हैं, जहाँ किसी भी वक्त गड्ढे में गिरकर जान जा सकती है. अब हिसाब आपको देना होगा.
4. आपने 543 सीटों वाली लोकसभा के साथ इस देश में ऐसा क्या किया है कि हम अपने खर्चे पर आपकी बहू-बेटियों के लिए 300 और सीटें दे दें. अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में सीटों की संख्या 435 है और 1929 के बाद से इसमें बढ़ोतरी पर रोक लगा दी गई है. गौर करने लायक बात ये है कि इस दौरान अमेरिका की आबादी लगभग तीन गुना हो गई है.
5. अगर भारत में 20 या 30 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक लोकसभा सांसद अपने क्षेत्र की जनता की आवाज़ ठीक से नहीं रख पाता, तो फिर 10 लाख वाला कैसे रख पाएगा. 850 लोकसभा सीटों वाली संसद एक ऐसी भीड़ में बदल जाएगी, जिसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा. छुट्टी और स्थगन के रिकॉर्ड को देखते हुए सांसदों के लिए बोलने का मौका बमुश्किल एक बार आएगा.
6. भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था विकेंद्रीकृत है, जिसकी सबसे छोटी इकाई पंचायत है और सबसे बड़ी लोकसभा. आप अपने मुखिया से लेकर विधायक, सांसद और प्रधानमंत्री तक को देख लीजिए, उन्होंने आपके लिए अब ऐसा क्या किया, जिसके आधार पर आप अपने पैसे खर्च करके परजीवियों की फौज और बढ़ाना चाहेंगे.
7. कुल मिलाकर यह नेताओं की रिश्तेदार रोजगार योजना है और अब वक्त आ गया है कि जनता आँखों में आँखें डालकर यह पूछे कि इससे देश का कौन-सा भला होने वाला है. असल में इसके पीछे का खेल ज्यादा गहरा है.
8. अगर युद्ध और बड़ी-से-बड़ी प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी इस देश की जनगणना कभी नहीं टाली गई और मोदी सरकार ने 2021 की जनगणना को 2027 तक टाल दिया, तो इसके पीछे क्या कहानी है. पूरी बात लिखूँगा तो बात बहुत लंबी हो जाएगी, आप खुद रिसर्च करेंगे तो सब कुछ साफ समझ में आ जाएगा.
9. सीटें बढ़ाने का खेल इसलिए खेला जा रहा है, ताकि उसके बाद मनमाने ढंग से सभी सीटों की सीमाएँ तय की जा सकें और यह सुनिश्चित हो जाए कि इसका फायदा सिर्फ एक पार्टी को ही मिलेगा. असम और जम्मू-कश्मीर में हम इस साजिश को कामयाब होता देख चुके हैं. अर्थव्यवस्था में तुलनात्मक रूप से अधिक योगदान देने वाले और अपनी जनसंख्या नियंत्रित रखने वाले राज्यों में परिसीमन से गंभीर असंतोष पैदा होगा, जो भारतीय के संघीय ढाँचे के लिए खतरनाक होगा.
10. अगर चोर दरवाजे लोकतंत्र को हड़पने का खेल संसद में कामयाब भी हो गया, तो देश की जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी और कृषि कानूनों की तरह सरकार को इसे वापस लेना पड़ेगा. बतौर नागरिक, मेरे पास सविनय अवज्ञा के अलावा कोई और रास्ता नहीं रहेगा. आप इस देश के नागरिकों को नागरिक मानने से इनकार कर रहे हैं, मैं आपको सरकार मानने से इनकार करूँगा.

