असली जैसी दिखने वाली नकली दवाएं: सर्वे में हर तीन में एक उपभोक्ता को मिला नकली हेल्थकेयर उत्पाद

‘साउथ फर्स्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, नकली दवा या हेल्थकेयर उत्पाद पहली नजर में असली जैसा दिख सकता है. पैकेजिंग, ब्रांडिंग और डिजाइन की नकल इतनी बेहतर हो सकती है कि उपभोक्ता को फर्क पता ही न चले. एएसपीए-क्रिसिल की “स्टेट ऑफ काउंटरफिटिंग इन इंडिया 2025” रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सर्वे किए गए हर तीन में लगभग एक उपभोक्ता ने पिछले एक साल के दौरान किसी नकली हेल्थकेयर उत्पाद का सामना किया. इसके बावजूद केवल 52 प्रतिशत उपभोक्ता ही खरीदने से पहले यह जांचते हैं कि हेल्थकेयर उत्पाद असली है या नहीं.

रिपोर्ट के लिए नौ शहरों में 1,639 उपभोक्ताओं का ऑनलाइन सर्वे किया गया. सर्वे में उपभोक्ताओं ने हेल्थकेयर क्षेत्र में नकली उत्पादों की हिस्सेदारी करीब 28 प्रतिशत आंकी, जो 2022 में 20 प्रतिशत थी. करीब 80 प्रतिशत लोगों ने माना कि पिछले 12 महीनों में हेल्थकेयर उत्पादों की नकली बिक्री बढ़ी है.

यह समस्या सामान्य नकली कपड़ों या इलेक्ट्रॉनिक सामान से ज्यादा गंभीर है, क्योंकि यहां सीधे मरीज की सेहत और जान पर असर पड़ सकता है. रिपोर्ट में दवाएं, मेडिकल डिवाइस, न्यूट्रास्यूटिकल्स और ओवर-द-काउंटर उत्पादों को हेल्थकेयर उत्पादों की श्रेणी में शामिल किया गया है.

दुकानों से लेकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुंच

सर्वे के मुताबिक नकली हेल्थकेयर उत्पाद केवल ऑनलाइन बाजार तक सीमित नहीं हैं. जिन उपभोक्ताओं ने नकली उत्पाद का सामना किया, उनमें 63 प्रतिशत ने स्थानीय रिटेल दुकानों को इसका स्रोत बताया, जबकि 60 प्रतिशत ने ऑनलाइन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म का नाम लिया. करीब एक तिहाई लोगों ने मल्टी-ब्रांड स्टोर और सोशल मीडिया विज्ञापनों के जरिए भी ऐसे उत्पाद मिलने की बात कही.

कीमत भी नकली बाजार का बड़ा हथियार है. उपभोक्ताओं ने अनुमान लगाया कि नकली हेल्थकेयर उत्पाद असली उत्पादों की तुलना में औसतन 18 प्रतिशत सस्ते होते हैं. लेकिन रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर लोग जानबूझकर नकली उत्पाद खरीदना नहीं चाहते. केवल 23 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे नकली होने की जानकारी न होने पर ऐसा उत्पाद खरीद सकते हैं, जबकि सिर्फ 4 प्रतिशत ने कहा कि असली उत्पाद उपलब्ध न होने पर वे नकली विकल्प ले सकते हैं.

यानी असली समस्या यह है कि उपभोक्ता के पास यह पहचानने का आसान और भरोसेमंद तरीका नहीं है कि उसके हाथ में आया उत्पाद वास्तव में असली है या नकली.

पैकेजिंग पर भरोसा, लेकिन यही सबसे कमजोर कड़ी

केवल 52 प्रतिशत उपभोक्ता हेल्थकेयर उत्पाद खरीदने से पहले उसकी असलियत जांचते हैं, जबकि सभी उत्पाद श्रेणियों में यह आंकड़ा 62 प्रतिशत है. इसके बावजूद 60 प्रतिशत लोग मानते हैं कि वे खुद नकली हेल्थकेयर उत्पाद पहचान सकते हैं.

ज्यादातर लोग उत्पाद की शक्ल, पैकेजिंग और ब्रांडिंग देखकर फैसला करते हैं. हेल्थकेयर उत्पादों में 66 प्रतिशत लोग पैकेजिंग की गुणवत्ता देखते हैं, 48 प्रतिशत होलोग्राम और 40 प्रतिशत QR कोड की जांच करते हैं. समस्या यह है कि आधुनिक नकली उत्पाद बनाने वाले पैकेजिंग और ब्रांड डिजाइन की भी बेहद सटीक नकल कर सकते हैं.

रिपोर्ट में टैम्पर-एविडेंट लेबल, सिक्योरिटी पैकेजिंग, होलोग्राफिक फॉइल, QR कोड और NFC आधारित ऑथेंटिकेशन जैसी तकनीकों को जरूरी बताया गया है. QR और NFC टैग के जरिए उत्पाद को सप्लाई चेन में ट्रैक किया जा सकता है और उपभोक्ता स्मार्टफोन से उसकी असलियत जांच सकता है.

हैदराबाद में सबसे ज्यादा मामले

सर्वे किए गए नौ शहरों में हैदराबाद में नकली उत्पादों से हालिया सामना करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा रही. यहां 46 प्रतिशत उपभोक्ताओं ने पिछले 12 महीनों में नकली उत्पाद मिलने की बात कही. इसके बाद चेन्नई में 39 प्रतिशत और बेंगलुरु में 33 प्रतिशत का आंकड़ा रहा.

सभी उत्पाद श्रेणियों में 35 प्रतिशत लोगों ने पिछले एक साल में नकली उत्पाद का सामना करने की बात कही. उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स 54 प्रतिशत के साथ सबसे ऊपर रहा, उसके बाद ऑटोमोबाइल पार्ट्स 50 प्रतिशत पर रहे. हेल्थकेयर उत्पादों का आंकड़ा 33 प्रतिशत रहा.

2018 से अब तक 521 मामले

ASPA के Counterfeit News Repository के अनुसार 2018 से 2025 के बीच हेल्थकेयर उत्पादों की नकली बिक्री से जुड़े 521 मामले दर्ज किए गए. कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 और 2021 में ऐसे मामलों में सबसे ज्यादा उछाल आया. इस दौरान नकली PPE किट, मास्क, खांसी-जुकाम की दवाएं और यहां तक कि वैक्सीन भी निशाने पर रहीं.

2025 में ही हेल्थकेयर उत्पादों की नकली बिक्री के 52 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2018 में यह संख्या 27 थी. रिपोर्ट के मुताबिक सप्लाई चेन की कमजोरियां, ऑथेंटिकेशन तकनीक का सीमित इस्तेमाल और उपभोक्ताओं में जागरूकता की कमी इस कारोबार को बढ़ावा देती है.

जागरूकता बढ़ी, लेकिन खतरा बरकरार

सर्वे में 89 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने जीवन में कभी न कभी नकली उत्पाद खरीदा है, हालांकि यह स्व-रिपोर्ट किए गए अनुभव पर आधारित आंकड़ा है. करीब 50 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे जानबूझकर कभी नकली उत्पाद नहीं खरीदेंगे. वहीं 93 प्रतिशत लोगों ने नकली उत्पादों के खिलाफ अधिक जागरूकता अभियान चलाने की मांग की.

ASPA के अध्यक्ष अंकित गुप्ता ने कहा कि नकली उत्पाद रोजमर्रा के उपभोक्ता अनुभव का हिस्सा बन चुके हैं और इसे चेतावनी के रूप में लेना चाहिए. संगठन के अधिकारियों का कहना है कि केवल पैकेजिंग और ब्रांडिंग देखकर भरोसा करने के बजाय सुरक्षित पैकेजिंग, सीरियलाइजेशन, डिजिटल ऑथेंटिकेशन और ट्रैक-एंड-ट्रेस तकनीक को बढ़ाना जरूरी है.

हेल्थकेयर उत्पादों के मामले में यह सिर्फ पैसे का नुकसान नहीं है. नकली दवा या मेडिकल उत्पाद सीधे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है. रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि उपभोक्ताओं में नकली उत्पादों का खतरा समझने की जागरूकता तो बढ़ रही है, लेकिन किसी दवा या मेडिकल उत्पाद की असलियत तुरंत और भरोसेमंद तरीके से जांचने की व्यवस्था अभी भी उस जागरूकता से पीछे है.

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