अजित साही | अमेरिका में हिंदू होना और हिंदुत्व की राजनीति करना, दोनों अलग है

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस एपिसोड में निधिश त्यागी ने वाशिंगटन डीसी से पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अजीत साही के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के अमेरिका और कनाडा दौरे पर विस्तार से चर्चा की. आरएसएस अपने 100वें वर्ष में इस दौरे को दुनिया तक "वसुधैव कुटुम्बकम" का संदेश पहुंचाने की कोशिश बता रहा है. लेकिन अमेरिका में इस दौरे को लेकर सवाल भी हैं और विरोध भी. आखिर मोहन भागवत के इस दौरे का मकसद क्या है और अमेरिका में आरएसएस से जुड़े संगठन किस तरह काम करते हैं?

अजित साही ने बातचीत में कहा कि अमेरिका में हिंदू स्वयंसेवक संघ यानी एचएसएस, विश्व हिंदू परिषद ऑफ अमेरिका और कई दूसरे संगठन लंबे समय से सक्रिय हैं. उनके मुताबिक, इन संगठनों को अक्सर स्वतंत्र अमेरिकी संगठन के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन वैचारिक रूप से इनका संबंध आरएसएस परिवार से जोड़ा जाता है. साही ने यह भी दावा किया कि अमेरिका में नए-नए संगठनों और प्लेटफॉर्म के जरिए एक व्यापक नेटवर्क तैयार किया गया है.

चर्चा का एक बड़ा मुद्दा यह रहा कि अमेरिका में हिंदू पहचान और भारतीय पहचान की राजनीति अलग-अलग तरीके से कैसे काम करती है. भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं, लेकिन अमेरिका में भारतीय मूल के लोग और हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि हिंदुओं के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले संगठन क्या वास्तव में पूरे समुदाय की आवाज हैं, या वे एक खास राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं?

अजित साही ने अमेरिकी समाज में इन संगठनों की गतिविधियों के कई उदाहरण दिए. उनके अनुसार, धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ स्कूलों, विश्वविद्यालयों, इंटरफेथ समूहों और स्थानीय राजनीति तक पहुंच बनाने की कोशिश की जाती है. उन्होंने हिंदूफोबिया, जाति भेदभाव और अमेरिकी पाठ्यक्रमों में भारतीय इतिहास की व्याख्या को लेकर चल रही बहसों का भी जिक्र किया.

बातचीत में क्षमा सावंत के जाति भेदभाव विरोधी कानून और न्यू जर्सी में हुई चर्चित बुलडोजर परेड का मुद्दा भी उठा. अजीत साही का तर्क था कि अमेरिकी राजनीति में भारतीय राजनीतिक प्रतीकों और भारत की धार्मिक-राजनीतिक बहसों को ले जाने की कोशिशें लगातार बढ़ी हैं. वहीं, इन घटनाओं के विरोध में अमेरिकी समाज और भारतीय मूल के अलग-अलग समुदायों की प्रतिक्रिया भी सामने आई.

मोहन भागवत का दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आरएसएस के 100 साल पूरे होने के मौके पर हो रहा है. संघ की कोशिश दुनिया के सामने अपनी एक व्यापक और सांस्कृतिक छवि पेश करने की है. लेकिन आलोचकों का सवाल है कि क्या यह केवल सांस्कृतिक संवाद है या फिर अमेरिका में अपने वैचारिक और सामाजिक नेटवर्क को मजबूत करने की बड़ी रणनीति का हिस्सा?

इस पूरे संवाद का सबसे अहम सवाल यही है कि अमेरिकी भारतीय समुदाय को आखिर किस नजर से देखा जाए. क्या उसे एक राजनीतिक इकाई मानना सही है, या उसके भीतर मौजूद अलग-अलग धर्मों, विचारों और पहचानों को समझना ज्यादा जरूरी है?

मोहन भागवत का यह दौरा खत्म होने के बाद असली तस्वीर और साफ होगी. क्या आरएसएस अमेरिका में अपनी स्वीकार्यता बढ़ा पाएगा, या फिर उसके नेटवर्क और राजनीति को लेकर उठ रहे सवाल और तेज होंगे? हरकारा डीप डाइव इस दौरे के बाद एक बार फिर इस बहस पर लौटेगा. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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