रूस के युद्ध में फंसे भारतीयों के परिवारों का लंबा और बेबस इंतजार
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, राजस्थान के जयपुर निवासी 33 वर्षीय कैब चालक मनोज सिंह शेखावत ने 15 अक्टूबर को रूस-यूक्रेन सीमा के मोर्चे से अपने परिवार को सिर्फ 21 सेकंड का एक ऑडियो संदेश भेजा था. उन्होंने कहा था, "अगर तीन दिन तक मेरी कोई खबर नहीं मिले तो समझ लेना कि मैं अब नहीं रहा." उस संदेश के करीब दस महीने बाद भी परिवार को मनोज के बारे में कोई जानकारी नहीं है, लेकिन उम्मीद अब भी बाकी है कि शायद वह किसी ऐसी जगह जिंदा हों, जहां इंटरनेट या संपर्क की सुविधा नहीं है.
मनोज का परिवार उन 26 भारतीय परिवारों में शामिल है जिन्होंने मार्च में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उनकी मांग है कि केंद्र सरकार रूस-यूक्रेन युद्ध क्षेत्र में फंसे या लापता भारतीयों का पता लगाए और उन्हें भारत वापस लाने की कोशिश करे. रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद सैकड़ों भारतीय किसी न किसी तरह रूसी सेना तक पहुंच गए. कई परिवारों का आरोप है कि उनके परिजनों को नौकरी और बेहतर कमाई का झांसा देकर एजेंटों ने रूस भेजा और बाद में उन्हें युद्ध में धकेल दिया गया.
31 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को लापता भारतीय नागरिकों को खोजने के प्रयास जारी रखने का निर्देश दिया. विदेश मंत्रालय को दिल्ली में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा गया, जो रूस में फंसे भारतीयों के परिवारों के लिए संपर्क का एकल केंद्र होगा. अदालत ने परिवारों के डीएनए नमूने लेने की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया, ताकि रूसी शवगृहों में मौजूद अज्ञात सैनिकों के शवों से उनका मिलान किया जा सके.
हालांकि कई परिवारों के लिए यह राहत बहुत देर से आई. याचिका से जुड़े 14 परिवारों के परिजन युद्ध में मारे जा चुके हैं, जिनमें कुछ की मौत 2025 में हुई. केंद्र सरकार के अनुसार, याचिका दाखिल होने के बाद छह शव भारत लाकर परिवारों को सौंपे गए, लेकिन सक्रिय युद्ध क्षेत्र में मौजूद कुछ शवों को निकालना संभव नहीं हो पाया. 11 भारतीयों के बारे में अब भी कोई जानकारी नहीं है, जबकि एक भारतीय रूस की जेल में सजा काट रहा है.
मनोज शेखावत की कहानी उन एजेंटों के नेटवर्क पर सवाल उठाती है, जिन पर युवाओं को विदेश में नौकरी का सपना दिखाकर फंसाने के आरोप हैं. परिवार के अनुसार, मनोज को रूस में एक अंडे की फैक्ट्री में अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी का वादा किया गया था. उन्हें भारत से ई-वीजा पर रूस भेजा गया. लेकिन यह वीजा सीमित अवधि के पर्यटन या व्यावसायिक दौरे के लिए था, रोजगार के लिए नहीं. रूस पहुंचने के बाद उन्होंने अंडे की फैक्ट्री और फिर टमाटर तोड़ने के काम में मेहनत की, लेकिन उन्हें वेतन नहीं मिला.
इसी आर्थिक और कानूनी संकट के बीच मनोज और अन्य भारतीयों की मुलाकात रूस में मौजूद एक भारतीय एजेंट से हुई. उन्हें बताया गया कि भारत-रूस के अच्छे संबंधों के कारण उन्हें सीधे युद्ध में नहीं भेजा जाएगा. कहा गया कि वे बंकर खोदने, सामान पहुंचाने या अन्य गैर-लड़ाकू काम करेंगे. लेकिन परिवारों और उनके वकीलों का आरोप है कि रूसी सेना की हिरासत में पहुंचने के बाद उनके पासपोर्ट ले लिए गए और उनसे सैन्य अनुबंध पर हस्ताक्षर कराए गए. इसके बाद उन्हें कथित तौर पर साफ विकल्प दिया गया कि युद्ध में जाओ या गंभीर परिणाम भुगतो.
मनोज ने सितंबर 2025 में 15 दिनों का सैन्य प्रशिक्षण लिया और अक्टूबर के मध्य तक उन्हें कुप्यांस्क के पास रूस-यूक्रेन सीमा के मोर्चे पर भेज दिया गया. 15 अक्टूबर के बाद से परिवार का उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ.
हिमाचल प्रदेश के दिनेश कुमार की कहानी भी अलग नहीं है. वह कई वर्षों से रूस में भारतीय भोजन के रेस्तरां से जुड़े काम कर रहे थे और रूस में स्थायी निवास पाने की इच्छा रखते थे. उन्हें सेना में रसोइए की नौकरी, अच्छी तनख्वाह और एक साल का अनुबंध पूरा करने पर स्थायी निवास का वादा किया गया. लेकिन प्रशिक्षण के बाद उन्हें भी युद्ध क्षेत्र में भेज दिया गया. 14 सितंबर 2025 को उन्होंने अपने भाई को आखिरी वीडियो कॉल कर बताया कि उन्हें गुमराह किया गया है और उन्हें मोर्चे पर ले जाया जा रहा है. उसके बाद से उनका भी कोई पता नहीं है.
भारत सरकार के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल विवरण के अनुसार, कई भारतीय आकर्षक वेतन, भारी साइनिंग बोनस और रूसी नागरिकता के वादों से प्रभावित हुए. सैनिकों को करीब 2,500 डॉलर मासिक वेतन, 5,000 डॉलर तक साइनिंग बोनस और मौत की स्थिति में करीब 1.68 लाख डॉलर मुआवजे का वादा किया गया था. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक कम से कम 217 भारतीय रूसी सेना में शामिल हुए, जिनमें से 139 को भारत सरकार की कूटनीतिक कोशिशों के बाद सैन्य अनुबंधों से मुक्त कराया जा चुका है.
परिवारों की दूसरी लड़ाई भारत में उन एजेंटों के खिलाफ है, जिन्होंने कथित तौर पर युवाओं को इस जाल में फंसाया. मनोज के परिवार ने पिछले साल नवंबर में राजस्थान के तीन ट्रैवल एजेंटों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन करीब दस महीने बाद भी गिरफ्तारी नहीं हुई. परिवार का आरोप है कि एजेंट समझौता करने और पैसे लौटाने की पेशकश कर रहे हैं, लेकिन उनका सवाल है कि पैसे से उनके लापता बेटे और भाई वापस कैसे आएंगे.
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, प्रवासन अधिनियम के तहत अवैध भर्ती एजेंटों पर कार्रवाई की प्रक्रिया लंबी और जटिल है. विदेशों से जुड़े मामलों में जांच और अभियोजन के लिए केंद्र सरकार और विदेश मंत्रालय की मंजूरी की जरूरत पड़ सकती है. संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक 2023 से 2025 के बीच अवैध या अनधिकृत भर्ती एजेंटों के खिलाफ 3,925 शिकायतें मिलीं, लेकिन केवल 955 मामलों में एफआईआर दर्ज हुई. जांच पूरी होने के बाद सिर्फ 39 मामले केंद्र से अभियोजन की मंजूरी मांगने की स्थिति तक पहुंचे.
इन परिवारों के लिए यह सिर्फ युद्ध, कूटनीति या कानून का मामला नहीं है. यह हर दिन फोन की घंटी बजने, किसी अनजान नंबर से खबर आने और फिर निराशा में बदल जाने का इंतजार है. उनका सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है: जिन युवाओं को नौकरी का सपना दिखाकर रूस भेजा गया, वे आखिर कहां हैं और उन्हें घर कब वापस लाया जाएगा.

