हरीश दामोदरन | चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए एथेनॉल जिम्मेदार क्यों नहीं
दशहरा 20 अक्टूबर और दिवाली 8 नवंबर को है, लेकिन त्योहारी मौसम शुरू होने से पहले ही चीनी की कीमतों ने कड़वाहट बढ़ा दी है. उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, शुक्रवार को देशभर में चीनी की सबसे अधिक प्रचलित खुदरा कीमत 65 रुपये प्रति किलोग्राम थी. 21 जुलाई को यह कीमत 45 रुपये और 31 जुलाई तक 50 रुपये थी. यानी केवल एक महीने में चीनी की खुदरा कीमत 20 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ गई.
चीनी की कीमतों में यह तेजी केवल खुदरा बाजार तक सीमित नहीं है. 20 अगस्त को उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों से निकलने वाली कीमत 57-60 रुपये, महाराष्ट्र में 62.5-64 रुपये और कर्नाटक में 63-64 रुपये प्रति किलोग्राम थी. इसके मुकाबले 1 अगस्त को यही कीमतें क्रमशः 44.95-46.7 रुपये, 46.2-46.9 रुपये और 46.25-47 रुपये थीं.
कीमतें अचानक क्यों बढ़ीं
इस तेजी की सबसे बड़ी वजह उम्मीद से कम चीनी उत्पादन और पिछले नौ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा चीनी भंडार है.
नवंबर 2025 की शुरुआत में भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा निर्माता संघ ने 2025-26 चीनी सत्र के लिए सकल उत्पादन 343.5 लाख टन रहने का अनुमान लगाया था. इसमें से 34 लाख टन एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने के बाद शुद्ध चीनी उत्पादन 309.5 लाख टन रहने का अनुमान था.
लेकिन अब उद्योग के ताजा अनुमान के अनुसार सकल उत्पादन केवल 309 लाख टन रहा और एथेनॉल के लिए 30 लाख टन चीनी का इस्तेमाल हुआ. इससे शुद्ध उत्पादन लगभग 279 लाख टन रह गया, जो शुरुआती अनुमान से 30.5 लाख टन कम है.
सत्र की शुरुआत में करीब 50 लाख टन का शुरुआती भंडार था. उत्पादन जोड़ने के बाद कुल उपलब्ध चीनी लगभग 329 लाख टन रही. घरेलू खपत 280 लाख टन और निर्यात 8 लाख टन घटाने के बाद सत्र के अंत में लगभग 41 लाख टन भंडार बचने का अनुमान है. यह 2016-17 के बाद सबसे कम स्तर होगा. कुछ उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार शुरुआती भंडार 50.03 लाख टन के बजाय केवल 48 लाख टन था. ऐसा होने पर अंतिम भंडार लगभग 39 लाख टन रह सकता है, जो 2008-09 के बाद सबसे निचला स्तर होगा.
उत्पादन अनुमान क्यों गलत साबित हुए
महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में पिछले साल सितंबर-अक्टूबर के दौरान अत्यधिक बारिश और दक्षिण-पश्चिम मानसून की देर से वापसी ने गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचाया. खेतों में पानी भरने और धूप की कमी से गन्ने की वृद्धि और उसमें सुक्रोज का संचय प्रभावित हुआ. इसका सीधा असर उत्पादन और चीनी की रिकवरी पर पड़ा.
नवंबर में भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा निर्माता संघ ने महाराष्ट्र में 130 लाख टन और कर्नाटक में 63.5 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया था. वास्तविक उत्पादन क्रमशः 99.2 लाख टन और 47.2 लाख टन रहा. उत्तर प्रदेश में भी शुरुआती अनुमान 103.2 लाख टन था, जबकि उत्पादन 89.7 लाख टन रहा. राज्य में लाल सड़न रोग और टॉप शूट बोरर कीट ने गन्ने को नुकसान पहुंचाया. उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर उगाई जाने वाली को-0238 किस्म भी इन हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील होती जा रही है.
चीनी की कीमतों में वास्तविक तेजी जुलाई से शुरू हुई. महाराष्ट्र में मिल स्तर की औसत कीमत सितंबर 2025 में 38.31 रुपये से घटकर अप्रैल 2026 में 36.98 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई थी. जून में यह 38.23 रुपये रही, लेकिन जुलाई में बढ़कर 41.85 रुपये हो गई.
उद्योग से जुड़े एक सूत्र के अनुसार, इसकी पहली वजह उत्पादन में अप्रत्याशित कमी और वास्तविक भंडार को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता थी. आर्थिक दबाव से जूझ रही कुछ मिलों ने सरकार द्वारा निर्धारित मासिक सीमा से अधिक चीनी पहले ही बेच दी थी. इसलिए उनके पास वास्तविक भंडार कम था, जबकि कागजों में स्टॉक अधिक दिखाई दे रहा था.
दूसरी वजह इस साल का मानसून है. जून में खासकर महाराष्ट्र और कर्नाटक में बारिश की कमी ने व्यापारियों को आशंकित किया कि 2026-27 में गन्ने की पैदावार और चीनी उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है.
क्या एथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल जिम्मेदार है
पहली नजर में एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल हुई 30 लाख टन चीनी महत्वपूर्ण लगती है. लेकिन मौजूदा कीमतों के लिए केवल इसे जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा.
असल समस्या यह है कि कुल चीनी उत्पादन ही शुरुआती अनुमान से 34.5 लाख टन कम रहा. इतनी बड़ी कमी की उम्मीद उद्योग ने भी नहीं की थी.
एथेनॉल उत्पादन के आंकड़े भी यही बताते हैं. नवंबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच तेल विपणन कंपनियों को पेट्रोल में मिलाने के लिए कुल 810.67 करोड़ लीटर एथेनॉल दिया गया. इसमें गन्ने से प्राप्त स्रोतों का हिस्सा केवल 259.24 करोड़ लीटर यानी करीब 32 प्रतिशत था. बाकी 551.43 करोड़ लीटर यानी 68 प्रतिशत एथेनॉल मक्का, भारतीय खाद्य निगम के चावल और टूटे या खराब अनाज से बना था.
इसलिए चीनी की मौजूदा कीमतों में तेज उछाल को केवल एथेनॉल नीति से जोड़ना बढ़ा-चढ़ाकर किया गया आकलन होगा.
सरकार ने क्या कदम उठाए
सरकार ने 13 मई को 30 सितंबर 2026 तक चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी थी. इसके बाद गुरुवार को 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी गई. इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाना है, जब तक भारतीय मिलों में अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत से गन्ने की पेराई शुरू नहीं हो जाती.
28 जुलाई को सरकार ने सभी चीनी कारोबारियों के लिए 400 टन की भंडारण सीमा भी तय की. इसके अलावा, कारोबारियों को प्राप्त स्टॉक को 30 दिनों से अधिक रखने की अनुमति नहीं दी गई.
13 अगस्त को सरकार ने चीनी मिलों से उन बड़े उपभोक्ताओं की जानकारी भी मांगी, जिन्हें 2025-26 में सीधे या एजेंटों के माध्यम से सालाना 500 टन या उससे अधिक चीनी बेची गई थी.
उद्योग के अनुसार, सरकार 2026-27 के अगले सत्र में सीधे गन्ने के रस और बी-भारी शीरे से एथेनॉल बनाने पर भी रोक लगाने का निर्देश दे सकती है. फिलहाल सरकार की प्राथमिकता घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना है, चाहे इसके लिए आयात करना पड़े या मिलों और कारोबारियों को बाजार में अधिक चीनी बेचने के लिए बाध्य करना पड़े.
हरीश दामोदरन 'द इंडियन एक्सप्रेस' में राष्ट्रीय ग्रामीण मामले एवं कृषि संपादक हैं. यह लेख उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है

