भंवर मेघवंशी | “ये सिर्फ ट्रेलर है… हिंदू राष्ट्र अभी आया नहीं है!”
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं भंवर मेघवंशी ने बात उस घटना पर की है, जिसने संसद से लेकर सड़क तक एक बेहद असहज सवाल खड़ा किया है. 8 अगस्त को हल्द्वानी में कांग्रेस की विजय शंखनाद रैली हुई, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हुए. दो दिन बाद उसी रामलीला मैदान में हवन और कथित शुद्धिकरण कराया गया. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वहां हवन क्यों हुआ, सवाल यह है कि आखिर किस चीज का शुद्धिकरण किया गया.
सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक भंवर मेघवंशी इसे महज एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि जाति आधारित मानसिकता का सार्वजनिक प्रदर्शन मानते हैं. उनका कहना है, "यह शुद्धिकरण आखिर किस चीज का है? यह रामलीला मैदान का है या उस व्यक्ति की उपस्थिति का है?" उनके मुताबिक, जिस मानसिकता को खत्म करने के लिए महात्मा गांधी, बाबा साहेब आंबेडकर और सामाजिक आंदोलनों ने लंबा संघर्ष किया, वह आज फिर सार्वजनिक रूप से दिखाई दे रही है.
इस घटना का सबसे बड़ा सवाल कानून और राजनीतिक जवाबदेही का भी है. राज्यसभा में मामला उठने के बाद इसे गलत और निंदनीय तो बताया गया, लेकिन कार्रवाई को लेकर सवाल अब भी कायम है. मेघवंशी कहते हैं, "आपकी सरकार है. आपसे जुड़े हुए आपकी विचारधारा के लोगों ने यह किया है और आप कह रहे हैं बहुत गलत हो गया. तो फिर इसका निदान क्या है?"
यही सवाल उत्तराखंड से आगे पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है. अगर एक लंबे सार्वजनिक जीवन वाले दलित नेता की मौजूदगी के बाद किसी सार्वजनिक स्थल का शुद्धिकरण किया जाता है, तो यह उन करोड़ों दलितों को क्या संदेश देता है जो आज भी सामाजिक बराबरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. मेघवंशी इसे "बहुत भयानक संकेत" बताते हैं.
बात सिर्फ एक मैदान तक सीमित नहीं है. अलग बर्तन, सार्वजनिक स्थानों पर भेदभाव, दलितों की सामाजिक हैसियत को लेकर सवाल और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद कायम जातिगत दूरी इस पूरे विमर्श को बड़ा बनाती है. यहां तक कि स्वतंत्रता दिवस जैसे सार्वजनिक आयोजनों में दलितों के कुर्सी पर बैठने तक पर विरोध की घटनाएं सामने आती हैं.
इस पूरी बहस का एक दूसरा पहलू कानून का कमजोर क्रियान्वयन है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून का उद्देश्य सिर्फ घटना के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि अत्याचार को रोकना भी है. लेकिन मेघवंशी के मुताबिक, "इसका प्रिवेंटिव पार्ट गायब है." एफआईआर से लेकर जांच और अदालत में दोषसिद्धि तक की प्रक्रिया में कमजोरियां न्याय की उम्मीद को कमजोर करती हैं.
और शायद इसी वजह से यह घटना सिर्फ एक राजनीतिक विवाद नहीं रह जाती. यह उस भारत के सामने खड़ा सवाल है, जहां संविधान बराबरी की बात करता है, लेकिन समाज के भीतर पवित्र और अपवित्र की धारणाएं अब भी मौजूद हैं.
भंवर मेघवंशी के शब्दों में, "जब मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे व्यक्ति की उपस्थिति के बाद शुद्धिकरण करते हैं, तो इस देश के करोड़ों-करोड़ दलित समाज को यह मैसेज देते हैं कि तुम्हारे 60 साल से जो सार्वजनिक जीवन में एक बड़ा लीजेंड लीडर है उसको भी हम कुछ नहीं मानते हैं."
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल है. क्या शुद्धिकरण की यह राजनीति सिर्फ एक घटना है, या उस सामाजिक व्यवस्था की वापसी का संकेत है जिसे संविधान और लोकतांत्रिक भारत ने पीछे छोड़ने की कोशिश की थी.
पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

