सुकांत चौधरी | दोषपूर्ण व्यवस्था की शिकार परीक्षाएं

वर्तमान में भारत के शैक्षणिक जगत को एक साथ तीन बड़ी मुसीबतों ने घेर रखा है: 'नीट' में प्रश्न-पत्र लीक होना, सीबीएसई की 12वीं की परीक्षाओं में डिजिटल मूल्यांकन पर मचा हंगामा, और सीयूईटी में तकनीकी गड़बड़ियों के कारण परीक्षाओं का रद्द होना.

हैरानी इन घटनाओं से ज्यादा इनके सुधार के सरकारी प्रयासों पर होती है. एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) ने नीट परीक्षा के लिए वायुसेना की मदद ली, तो शिक्षा मंत्रालय ने कक्षा 12वीं की समीक्षा के लिए बैंक अधिकारियों को बुलाया. तार्किक रूप से देखें, तो प्रश्न-पत्रों की सुरक्षा के लिए सशस्त्र बल और पंजीकरण ट्रैकिंग के लिए बैंक उपयुक्त हो सकते हैं, लेकिन यह बेहद अजीब है कि हमारी शिक्षा प्रणाली संकट के समय खुद को उबारने के लिए ऐसी गैर-शैक्षणिक एजेंसियों पर निर्भर है.

सुकांत चौधरी लिखते हैं कि यह संकट तब से ही तय था जब से शिक्षा का अत्यधिक 'केंद्रीकरण' हुआ और व्यक्तिगत संस्थानों को राज्य (सरकार) द्वारा नियंत्रित एक विशाल 'सिस्टम' में बदल दिया गया. पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर हुए इस बदलाव ने शिक्षा के सामने संरचनात्मक और प्रबंधकीय चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं. जब यह ढांचा नियंत्रण से बाहर होता है, तो यह बैंक, अदालतों या सेना जैसे बाहरी सहारों की तलाश करता है. आज के दौर में यह व्यवस्था अनिवार्य रूप से कंप्यूटर आधारित कंप्यूटेशनल ऑर्डरिंग (यांत्रिक प्रणाली) में तब्दील हो चुकी है.

तकनीक का विरोधी न होने के बावजूद, मेरा मानना है कि हम माध्यम  और सामग्री (कॉन्टेंट) के बीच भ्रमित हो रहे हैं. आज कंप्यूटर इंसानी शिक्षकों की जगह ले रहे हैं. वास्तविक शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को तेजी से केवल कंप्यूटर-आधारित डिलीवरी के अनुकूल ढाला जा रहा है. इसे केवल एक व्यावहारिक विकल्प नहीं, बल्कि ज्ञान प्रदान करने का सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक लक्ष्य मान लिया गया है.

प्राचीन काल से ज्ञान का मानक तरीका गुरु-शिष्य का सीधा संवाद रहा है. लिपि और छपाई के आने के बाद भी यह मानवीय साझा गतिविधि बनी रही। पारंपरिक क्लासरूम मौखिक अभिव्यक्ति का आखिरी सबसे बड़ा मंच है, लेकिन आज इसे 'ऑफलाइन' जैसा नकारात्मक नाम दे दिया गया है, मानो इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन के बिना इसका कोई अस्तित्व ही न हो. आज 'स्मार्ट क्लासरूम' का मतलब प्रेरणादायक शिक्षक और होनहार छात्र नहीं, बल्कि कंप्यूटर से लैस कमरा हो गया है.

चूँकि राज्य स्तर के पाठ्यक्रम भी अब अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षाओं से जुड़ रहे हैं, इसलिए इतने बड़े पैमाने के आयोजन केवल इलेक्ट्रॉनिक रूप से ही संभव हैं. नतीजतन, इनकी विषय-वस्तु को कंप्यूटर-अनुकूल (एमसीक्यू आधारित) बना दिया गया है. कोई भी समझदार व्यक्ति बहुविकल्पीय प्रश्नों को ज्ञान या तार्किक क्षमता परखने का सर्वोत्तम तरीका नहीं मान सकता. इस व्यवस्था से चुने गए छात्र शायद देश के सर्वश्रेष्ठ बौद्धिक युवाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते. इसके विपरीत, मोटी रकम चुकाने वालों के लिए मेडिकल सीटें आसानी से उपलब्ध हैं, भले ही उनका नीट स्कोर शून्य हो.

लाखों उम्मीदवारों की मौजूदगी में केवल 'रटना' सफलता की गारंटी नहीं है. यह व्यवस्था लोगों को सिस्टम को चकमा देने और घोटालों के लिए प्रेरित करती है. जब मूल्यांकन प्रणाली खुद एक ईमानदार छात्र और नकलची में अंतर नहीं कर सकती, तो परीक्षा की साख केवल बाहरी यांत्रिक निगरानी पर टिक जाती है.

हम 'विशालतावाद' (गिगेंटिज्म) के शिकार हैं, जहाँ एक अकेले 'एनटीए' के तहत सब कुछ केंद्रित किया जा रहा है. यहाँ तक कि इंसानी परीक्षकों द्वारा किया जाने वाला ऑनलाइन मूल्यांकन भी गति और सटीकता के चक्कर में उन्हें 'बॉट्स' (रोबोट) में बदल देता है.

क्या हम इस कंप्यूटर प्रणाली को ऐसा नया रूप नहीं दे सकते जो छात्रों की विशिष्ट शैक्षणिक क्षमता और कौशल का मूल्यांकन कर सके? क्या वर्तमान व्यवस्था में गहन समस्या-समाधान, प्रश्नों के विकल्प या संशोधित रूप में 'निबंध-प्रकार' (वर्णनात्मक) के प्रश्नों को शामिल करके थोड़ी मानवीय बारीकी नहीं लाई जा सकती? क्या यहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का सकारात्मक उपयोग संभव नहीं है?

छात्रों में बढ़ती निराशा और आत्महत्याएं इस बात का प्रमाण हैं कि अब संवेदनहीन प्रशासनिक अमले को जागना होगा. तकनीकी विफलताओं और घोटालों ने इस व्यवस्था में लोगों के विश्वास को तोड़ दिया है. यह मूलतः शिक्षकों और शिक्षाविदों की समस्या है, पुलिस, बैंकरों या सशस्त्र बलों की नहीं.

(सुकांत चौधरी जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एमेरिटस हैं, अंग्रेजी में उनके मूल लेख के यहां हिंदी में अनुदित अंश दिए गए हैं.)

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