श्रमिक संगठनों का विरोध, वीबी-जी-राम जी कानून के क्रियान्वयन पर रोक की मांग
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से जुड़े संगठनों के मंच नरेगा संघर्ष मोर्चा ने केंद्र सरकार से विकसित भारत-गारंटी ग्रामीण रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है. संगठन का आरोप है कि श्रमिक संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों से पर्याप्त परामर्श किए बिना इस नए कानून को लागू किया जा रहा है.
‘डाउन टू अर्थ’ के मुताबिक, दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को समाप्त कर उसकी जगह विकसित भारत-गारंटी ग्रामीण रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून लागू किया था. सरकार ने यह भी अधिसूचित किया है कि 1 जुलाई 2026 से मनरेगा औपचारिक रूप से समाप्त हो जाएगा.
वर्ष 2006 में लागू किया गया मनरेगा देश की सबसे महत्वपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजनाओं में से एक माना जाता है. नरेगा संघर्ष मोर्चा, जो श्रमिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का राष्ट्रीय मंच है, ने मांग की है कि नए कानून के नियमों को लागू करने से पहले व्यापक और पारदर्शी परामर्श प्रक्रिया अपनाई जाए.
परामर्श प्रक्रिया को लेकर चिंताएं
नरेगा संघर्ष मोर्चा का कहना है कि नए कानून को संसद में बिना पर्याप्त चर्चा और प्रभावित पक्षों से संवाद के जल्दबाजी में पारित कराया गया. संगठन के अनुसार यही रवैया नए कानून के तहत बनाए जा रहे नियमों में भी दिखाई देता है.
मोर्चे के मुताबिक मसौदा नियम 23 मई 2026 को जारी किए गए और सुझाव देने की अंतिम तिथि 21 जून तय की गई. लेकिन इससे पहले ही ग्रामीण विकास मंत्रालय ने घोषणा कर दी कि नई व्यवस्था 1 जुलाई से लागू कर दी जाएगी.
संगठन का कहना है कि जब लागू करने की तारीख पहले ही तय कर दी गई हो तो सार्वजनिक परामर्श महज औपचारिकता बन जाता है. मोर्चे ने यह भी कहा कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून के नियमों पर सरकार ने लंबी परामर्श प्रक्रिया अपनाई थी, जबकि इस मामले में हितधारकों को अपनी राय रखने के लिए बहुत कम समय दिया गया.
श्रमिकों के अधिकारों को लेकर चिंताएं
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने मनरेगा को वर्षों के जनसंघर्ष और ग्रामीण आंदोलनों का परिणाम बताया है. संगठन का कहना है कि इसकी जगह ऐसे कानून को लागू करना जिसकी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही, श्रमिक अधिकारों के लिए गंभीर चिंता का विषय है.
मोर्चे का आरोप है कि मसौदा नियमों में कई ऐसे प्रावधान बनाए रखे गए हैं जिनका श्रमिक संगठन लंबे समय से विरोध करते रहे हैं. इनमें प्रौद्योगिकी आधारित प्रणालियों का अनिवार्य उपयोग और कम मजदूरी दरें शामिल हैं.
संगठन का कहना है कि नए नियम श्रमिकों की उन चिंताओं को दूर नहीं करते जिन्हें वर्षों से उठाया जाता रहा है. मोर्चे ने मांग की है कि सरकार सभी संबंधित पक्षों के साथ वास्तविक संवाद करे और नियमों में आवश्यक संशोधन करे. उसका कहना है कि प्रौद्योगिकी आधारित व्यवस्थाओं और मजदूरी दरों से जुड़ी समस्याओं का समाधान किए बिना नई व्यवस्था लागू नहीं की जानी चाहिए.
ज़मीनी स्तर पर व्यवधान के दावे
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के उस दावे पर भी सवाल उठाया है जिसमें कहा गया था कि नई व्यवस्था लागू होने तक मनरेगा सामान्य रूप से जारी रहेगा.
संगठन का आरोप है कि कई इलाकों में स्थानीय अधिकारी काम मांगने वाले आवेदन स्वीकार नहीं कर रहे हैं और नए कार्यस्थल भी नहीं खोले जा रहे. मोर्चे के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 के 3,200 करोड़ रुपये से अधिक के मजदूरी भुगतान अब भी लंबित हैं.
संगठन ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि अप्रैल 2025 से अप्रैल 2026 के बीच मनरेगा के तहत रोजगार में 57 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि मई में यह कमी 49 प्रतिशत रही. इसके अलावा चेहरे की पहचान आधारित उपस्थिति प्रणाली से जुड़ी तकनीकी समस्याओं के कारण भी कई श्रमिकों को काम और भुगतान से वंचित होना पड़ रहा है.
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने चेतावनी दी है कि यदि व्यापक और विश्वसनीय परामर्श प्रक्रिया के बिना नए कानून को लागू किया गया, तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रम और अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है. संगठन का कहना है कि लाखों श्रमिकों और उनके परिवारों को प्रभावित करने वाले इतने बड़े बदलाव से पहले सरकार को संवाद, समीक्षा और संशोधन की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए.

