₹7,000 करोड़ का मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे अपने पहले ही मानसून में फेल हो गया, क्यों?

महाराष्ट्र में मानसून की भारी बारिश के कारण सोमवार, 6 ⁠जुलाई को ₹6,695 करोड़ की लागत से बने मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के नवनिर्मित 'मिसिंग लिंक' प्रोजेक्ट की टनल 2 (सुरंग 2) के प्रवेश द्वार पर भीषण भूस्खलन (लैंडस्लाइड) हुआ. इस घटना के कारण यह महत्वपूर्ण कॉरिडोर लगभग 18 घंटे तक बंद रहा, जिससे हजारों यात्रियों को पुराने हाईवे पर जाना पड़ा और भारी जाम की स्थिति पैदा हो गई. महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम (एमएसआरडीसी) ने इसे असाधारण बारिश का नतीजा बताया, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर इंजीनियरिंग उपायों से इस प्रभाव को कम किया जा सकता था.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में सबाह वीरानी ने देवेंद्र फडणवीस सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना—जिसे एक्सप्रेसवे के सबसे भीषण जाम वाले पॉइंट को ठीक करने के लिए बनाया गया था— में भूस्खलन के कारण पहला बड़ा व्यवधान आने के बाद इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है कि क्या इस त्रासदी को रोका जा सकता था? और, अपने पहले ही मानसून में यह एक्सप्रेस वे फेल क्यों हो गया?

विरानी भूस्खलन के कारण भारी मात्रा में चट्टानें, कीचड़ और बड़े पत्थर सुरंग के मुहाने (टनल पोर्टल) पर आ गिरे. हालांकि मुख्य सुरंग सुरक्षित रही, लेकिन इसके बाहरी सजावटी कंक्रीट बीम और फॉल्स फ्रेम को नुकसान पहुंचा. टनल पोर्टल वह बिंदु है जहाँ भूमिगत सुरंग खुली पहाड़ी से मिलती है. यह हिस्सा बारिश, बहते पानी और गिरती चट्टानों के सीधे संपर्क में होने के कारण सुरंग का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है.

एमएसआरडीसी ने सुरंग के प्रवेश द्वार से 15 मीटर ऊपर तक लोहे की जाली (स्टील मेश) और रॉक बोल्ट लगाए थे, जो सुरक्षित रहे. लेकिन सोमवार को गिरे पत्थर सुरक्षित दायरे से लगभग 150 मीटर ऊपर से आए थे.

आईटीए-एआईटीएस के पूर्व अध्यक्ष अर्नोल्ड डिक्स के अनुसार पश्चिमी घाट के बेसाल्ट पहाड़ों की बाहरी परत मौसम की मार से नरम हो जाती है, जिसमें पानी रिसने से वह फिसल जाती है. डिक्स ने इसे एक 'इंजीनियरिंग विफलता' होने की संभावना जताई और कहा कि अगर सुरंग को 600 मिमी से अधिक बारिश के लिए डिजाइन किया गया था, तो इसे इस तूफान को झेलना चाहिए था.

आईआईटी बॉम्बे के प्रो. आशीष जुनेजा ने अधिक व्यावहारिक रुख अपनाते हुए कहा कि इतनी भारी बारिश दुर्लभ होती है. हालांकि, ढलानों पर 'फ्लेक्सिबल रॉकफॉल्ट बैरियर' (लोहे की सुरक्षा बाड़) लगाकर बड़े पत्थरों को रोका जा सकता था, जो इस मामले में नाकाफी साबित हुए.  इसके अलावा भारी बारिश के कारण ड्रेनेज सिस्टम भी फेल हो गया और पानी सुरंग के अंदर घुस गया.

दोनों विशेषज्ञों ने माना कि जलवायु परिवर्तन के कारण पश्चिमी घाटों में कम समय में अत्यधिक तीव्र बारिश की घटनाएं अब आम होती जा रही हैं. हालांकि इस बार तूफान ने इंजीनियरिंग को पछाड़ दिया, लेकिन भविष्य में ऐसी त्रासदियों से बचने के लिए सुरंग के आसपास के सुरक्षा डिजाइन को और अधिक मजबूत तथा अपग्रेड करने की सख्त जरूरत है.

Previous
Previous

राकेश कायस्थ | संघ और भाजपा के भीतर मौजूद अंतर्विरोध अब पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट होकर सामने आ रहे हैं 

Next
Next

बांग्लादेश भेजे गए पश्चिम बंगाल के चार भारतीय नागरिक एक साल बाद लौटे भारत