पंजाब का ड्रग सर्वे सच बताएगा या सरकार को राहत देने वाले आंकड़े?
पंजाब सरकार इन दिनों राज्य के इतिहास का पहला व्यापक ड्रग और सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है. मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अप्रैल में इसकी घोषणा करते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य राज्य में नशे की वास्तविक स्थिति को समझना और उसके आधार पर बेहतर नीतियां बनाना है. लेकिन सर्वे शुरू होने के कुछ ही सप्ताह बाद इसकी विश्वसनीयता, कार्यप्रणाली और राजनीतिक मंशा को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, राज्य भर में लगभग 28 हजार सरकारी कर्मचारियों को 65 लाख परिवारों का सर्वे करने की जिम्मेदारी दी गई है. अमृतसर के एक सरकारी स्कूल शिक्षक बताते हैं कि पिछले दो सप्ताह में उन्होंने 120 घरों का सर्वे किया, लेकिन मुश्किल से दो या तीन परिवारों ने स्वीकार किया कि उनके घर का कोई सदस्य नशे की गिरफ्त में है.
सच स्वीकार करना आसान नहीं.
सर्वे की सबसे बड़ी चुनौती यही दिखाई दे रही है कि लोग नशे से जुड़े सवालों का ईमानदारी से जवाब देने से बच रहे हैं. सर्वे करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि कोई भी मां किसी अजनबी को यह बताने में सहज महसूस नहीं करती कि उसका बेटा या बेटी नशा करता है.
स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब सर्वे ऐप लोगों से पूछता है कि क्या उनके इलाके में नशा आसानी से उपलब्ध है. यदि कोई व्यक्ति "हां" कहता है तो उसके बाद कई और सवाल सामने आते हैं, जैसे नशा कहां मिलता है और कौन बेचता है. ऐसे में अधिकांश लोग इन सवालों से बचना ही बेहतर समझते हैं.
दो दशकों से नशा विरोधी अभियान चला रहे सामाजिक कार्यकर्ता मोहन शर्मा का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है. उनके अनुसार जागरूकता कार्यक्रमों में भी लोग खुलकर सामने नहीं आते. यहां तक कि मुफ्त इलाज और परामर्श की पेशकश के बावजूद बहुत कम लोग अपनी लत स्वीकार करते हैं.
कई परिवार सामाजिक कारणों से भी सच्चाई छिपाते हैं. यदि किसी व्यक्ति की मौत ड्रग ओवरडोज़ से होती है तो परिवार अक्सर उसे हार्ट अटैक या किसी अन्य बीमारी का नाम दे देता है. उन्हें डर होता है कि परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित होगी और घर की बेटियों के विवाह पर असर पड़ सकता है.
पंजाबी विश्वविद्यालय के सामाजिक कार्य विभाग की प्रमुख डॉ. रितु बाला का कहना है कि संवेदनशील विषयों पर शोध की एक स्थापित पद्धति होती है. किसी व्यक्ति से सीधे नशे जैसी निजी बात पूछकर सटीक उत्तर मिलने की उम्मीद करना व्यवहारिक नहीं है. सामाजिक विज्ञान में ऐसे अध्ययन विश्वास और संवाद के आधार पर किए जाते हैं, जबकि मौजूदा सर्वे में यह तत्व कमजोर दिखाई देता है.
आंकड़ों की खामियां दूर करने में असफल?
पंजाब में नशे की समस्या पर पहले भी कई अध्ययन हो चुके हैं. 2015 में एम्स और सामाजिक न्याय मंत्रालय के अध्ययन ने राज्य में 2.3 लाख से अधिक ओपिओइड-निर्भर लोगों का अनुमान लगाया था. 2017 में पीजीआई चंडीगढ़ के अध्ययन में दावा किया गया था कि पंजाब की लगभग 14.7 प्रतिशत आबादी किसी न किसी नशे की गिरफ्त में है.
बाद में संसद की स्थायी समिति के समक्ष प्रस्तुत 2023 की रिपोर्ट में ओपिओइड पर निर्भर लोगों की संख्या 21.36 लाख बताई गई थी. इनमें बड़ी संख्या किशोरों की भी थी.
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान सर्वे कई महत्वपूर्ण कमियों को दूर नहीं कर पाएगा. सबसे बड़ा विवाद शराब को लेकर है. सामाजिक कार्यकर्ता मोहन शर्मा का आरोप है कि सर्वे में शराब की लत को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है, जबकि पंजाब में शराब सामाजिक और पारिवारिक संकट का बड़ा कारण रही है.
महिला नशा पीड़ितों की वास्तविक संख्या का पता लगाना भी इस सर्वे के लिए चुनौती होगा. पहले के अध्ययनों में महिलाओं की संख्या बेहद कम दर्ज की गई थी, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक आंकड़े इससे कहीं अधिक हो सकते हैं. डॉ. रितु बाला का कहना है कि जब पुरुष ही अपनी लत स्वीकार करने से हिचकते हैं तो महिलाओं से खुले तौर पर स्वीकारोक्ति की उम्मीद करना और भी कठिन है.
ड्रग सर्वे या राजनीतिक फीडबैक?
सर्वे को लेकर एक और बड़ा विवाद इसके प्रश्नों की प्रकृति को लेकर है. लगभग 160 सवालों वाले इस सर्वे को पूरा करने में 30 से 35 मिनट लगते हैं. लेकिन सर्वे करने वाले कर्मचारियों का कहना है कि बड़ी संख्या में सवाल नशे से संबंधित नहीं हैं.
इनमें सरकार की विभिन्न योजनाओं से लोगों को हुए लाभ, मुफ्त बिजली से होने वाली बचत और सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी जैसे प्रश्न शामिल हैं. कई मामलों में सर्वे करने वाले कर्मचारियों को लोगों को योजनाओं के बारे में समझाना भी पड़ रहा है.
कुछ सवाल ऐसे भी हैं जिनमें लोगों से पूछा जा रहा है कि सरकार को किन तीन मुद्दों पर सबसे पहले काम करना चाहिए. आलोचकों का कहना है कि इस तरह के प्रश्न किसी सामाजिक अध्ययन से ज्यादा राजनीतिक जनमत सर्वेक्षण का आभास देते हैं.
इसी वजह से विपक्षी दलों ने सर्वे की मंशा पर सवाल उठाए हैं. कांग्रेस और भाजपा दोनों ने आरोप लगाया है कि यह अभ्यास नशे की समस्या को समझने से अधिक राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश बनता जा रहा है.
पंजाब सरकार का दावा है कि यह सर्वे राज्य को नशे के संकट से बाहर निकालने के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार करेगा. लेकिन विशेषज्ञों और विपक्ष का तर्क है कि यदि लोग सच्चाई बताने से ही बचते रहें तो सर्वे के नतीजे वास्तविकता से काफी दूर हो सकते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सर्वे पंजाब में नशे की असली तस्वीर सामने लाएगा, या फिर एक ऐसा आंकड़ा तैयार करेगा जो सरकार के लिए राजनीतिक रूप से अधिक सुविधाजनक साबित होगा.

