कैसे सोशल मीडिया दहेज को जबरन वसूली नहीं, बल्कि हास्य और सामाजिक प्रतिष्ठा के रूप में पेश कर रहा है 

‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्ष 2024 के दौरान दहेज से जुड़े मामलों में 5,700 से अधिक महिलाओं की मौत दर्ज की गई. यानी औसतन हर दिन लगभग 16 महिलाओं ने दहेज की वजह से अपनी जान गंवाई. इसके बावजूद सोशल मीडिया पर दहेज को अपराध या सामाजिक बुराई के रूप में नहीं, बल्कि मनोरंजन और हास्य के विषय के रूप में पेश किया जा रहा है. इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और अन्य प्लेटफॉर्मों पर ऐसे वीडियो तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जिनमें दहेज को “गिफ्ट”, “आशीर्वाद” या “प्यार की निशानी” जैसे शब्दों में पैक करके सामान्य और स्वीकार्य बनाने की कोशिश की जाती है.

दहेज भारत में कानूनी रूप से प्रतिबंधित है. दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं. लेकिन डिजिटल दुनिया में इस अपराध की गंभीरता लगातार धुंधली होती दिखाई दे रही है. सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली कई रील्स में दहेज को मज़ाकिया अंदाज़ में प्रस्तुत किया जाता है. कहीं प्रेम विवाह करने वाले युवक को दहेज छोड़ने पर “नुकसान” उठाने वाला बताया जाता है, तो कहीं महंगी कारों और बड़ी रकम को दहेज के रूप में दिखाकर उसे सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक उन्नति का प्रतीक बना दिया जाता है.

हाल के वर्षों में सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो भी बड़ी संख्या में सामने आए हैं, जिनमें यह बताया जाता है कि प्रेम विवाह में भी दहेज कैसे लिया जाए या फिर दहेज को “गिफ्ट” कहकर उसकी वैधता साबित करने की कोशिश की जाती है. एक वायरल रील में प्रेमिका को दहेज के लिए राज़ी करने की बात हास्य के रूप में पेश की गई. दूसरी रील में भारी-भरकम दहेज और महंगी गाड़ियों को दिखाते हुए अंत में सवाल पूछा जाता है, “बताओ भाई, अब भी लव मैरिज करोगे?” इस तरह के संदेश दहेज को सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक लाभ और पारिवारिक सफलता के प्रतीक के रूप में स्थापित करने का काम करते हैं.

यह केवल हास्य नहीं है, बल्कि एक गहरी सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब है. दहेज को “गिफ्ट” कह देना उसके वास्तविक स्वरूप को नहीं बदलता. इन तथाकथित उपहारों के पीछे अक्सर आर्थिक दबाव, सामाजिक मजबूरी, पारिवारिक शोषण और महिलाओं के खिलाफ हिंसा का लंबा इतिहास मौजूद होता है. लेकिन सोशल मीडिया पर इस संदर्भ को हटा दिया जाता है और केवल उसका चमकदार, मनोरंजक संस्करण दर्शकों के सामने रखा जाता है.

कुछ वीडियो तो इससे भी आगे बढ़कर दहेज का खुला समर्थन करते दिखाई देते हैं. उदाहरण के लिए, कुछ रील्स में यह तर्क दिया जाता है कि बेटियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता, इसलिए दहेज किसी तरह की “बराबरी” है. यह तर्क न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि महिलाओं के संपत्ति अधिकारों और लैंगिक समानता की अवधारणा को भी विकृत करता है. दहेज को अधिकार या न्याय के रूप में प्रस्तुत करना वास्तव में एक शोषणकारी व्यवस्था को वैधता देने जैसा है.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की कार्यप्रणाली इस समस्या को और गंभीर बनाती है. एल्गोरिद्म यह नहीं देखते कि कोई सामग्री सामाजिक रूप से जिम्मेदार है या हानिकारक. वे केवल यह देखते हैं कि कौन-सा कंटेंट अधिक लोगों को आकर्षित कर रहा है, अधिक शेयर हो रहा है और अधिक प्रतिक्रियाएं बटोर रहा है. परिणामस्वरूप दहेज से जुड़े मज़ाक, मीम और वीडियो बार-बार लोगों की स्क्रीन पर दिखाई देते हैं और धीरे-धीरे उनकी संवेदनशीलता को कम करते जाते हैं.

मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो किसी भी चीज़ के बार-बार संपर्क में आने से उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया बदलने लगती है. हास्य इस प्रक्रिया को और तेज़ कर देता है. जब किसी गंभीर सामाजिक समस्या को लगातार मज़ाक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके प्रति नैतिक असहजता कम होने लगती है. लोग दहेज को हिंसा, उत्पीड़न, घरेलू प्रताड़ना और मौत से जोड़कर देखने के बजाय उसे एक सामान्य सामाजिक व्यवहार के रूप में स्वीकार करने लगते हैं.

यही कारण है कि दहेज पर आधारित हास्य सामग्री केवल मनोरंजन नहीं है. यह एक ऐसी सांस्कृतिक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाती है, जो अपराध को सामान्य और स्वीकार्य बनाती है. जब नई पीढ़ी दहेज को बार-बार मीम, जोक और रील्स के रूप में देखती है, तो उसके मन में दहेज की कानूनी और नैतिक गंभीरता धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है.

दहेज के खिलाफ दशकों से कानून बनाए गए, जागरूकता अभियान चलाए गए और सामाजिक आंदोलनों ने इसे कलंकित करने की कोशिश की. लेकिन यदि डिजिटल संस्कृति उसी प्रथा को नए रूप में आकर्षक, हास्यास्पद और प्रतिष्ठित बनाकर पेश करने लगे, तो यह उन सभी प्रयासों को कमजोर कर सकती है. कानून तभी प्रभावी होता है जब समाज भी उस अपराध को अपराध मानता रहे. यदि सामाजिक स्मृति से दहेज की क्रूरता मिटने लगे और उसकी जगह केवल मज़ाक बच जाए, तो यह एक बेहद चिंताजनक स्थिति होगी.

दहेज कोई पुरानी परंपरा भर नहीं है. यह महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और समानता पर हमला करने वाली एक संरचनात्मक हिंसा है. सोशल मीडिया पर इसके सामान्यीकरण को केवल “मजाक” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. क्योंकि कई बार मज़ाक वही काम कर देता है, जो खुला समर्थन भी नहीं कर पाता वह समाज को धीरे-धीरे यह विश्वास दिला देता है कि एक गलत चीज़ दरअसल इतनी गलत नहीं है.

आज जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया पर दहेज को लेकर बनने वाली सामग्री को केवल मनोरंजन के चश्मे से न देखा जाए. सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहां हजारों महिलाओं की मौतों और पीड़ाओं से जुड़ी प्रथा को लोग अपराध नहीं, बल्कि कंटेंट मानने लगें. यदि ऐसा है, तो यह केवल डिजिटल संस्कृति का संकट नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक चेतना का भी संकट है.

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