झींगा निर्यात से अरबों की कमाई, लेकिन मजदूर कम वेतन और निगरानी में कैद

‘आर्टिकल 14’ के अनुसार, सूरत की 42 डिग्री गर्मी में एक दुबला-पतला मजदूर बांस का कमजोर पुल बना रहा था. उसके पैरों के नीचे नमक जमी जमीन थी और सामने झींगों से भरे तालाब. वह झारखंड के सिमडेगा जिले से 1500 किलोमीटर दूर गुजरात पहुंचा था. फरवरी से फार्म पर काम कर रहा था, लेकिन मई तक उसे मजदूरी नहीं मिली थी. उसने एक बात कही “हमें तो यहां के पैसों का चेहरा तक नहीं पता.”

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा श्रिम्प उत्पादक देश है. अमेरिका, यूरोप और चीन तक भारतीय झींगे भेजे जाते हैं. 2024-25 में भारत ने झींगा निर्यात से लगभग 5 अरब डॉलर कमाए. गुजरात में पिछले डेढ़ दशक में श्रिम्प निर्यात कई गुना बढ़ा है. लेकिन इस चमकदार निर्यात अर्थव्यवस्था के नीचे एक दूसरी दुनिया मौजूद है  ऐसी दुनिया जिसमें हजारों आदिवासी प्रवासी मजदूर महीनों तक अलग-थलग, कम मजदूरी और लगातार निगरानी के बीच जीते हैं.

एक हालिया अध्ययन में गुजरात के सूरत जिले के ओलपाड और चौर्यासी इलाकों के श्रिम्प फार्मों पर काम करने वाले 350 से अधिक मजदूरों, सुपरवाइजरों और मालिकों से बातचीत की गई. इस अध्ययन ने उस श्रम व्यवस्था की तस्वीर सामने रखी है जो औपचारिक रूप से शायद “बंधुआ मजदूरी” की श्रेणी में न आती हो, लेकिन व्यवहार में मजदूरों को लगभग कैद जैसी स्थिति में धकेल देती है.

इन फार्मों पर काम करने वाले ज्यादातर मजदूर झारखंड और ओडिशा के आदिवासी इलाकों से आते हैं. सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम और सुंदरगढ़ जैसे जिले लंबे समय से पलायन की मार झेल रहे हैं. गांवों में खेती से गुजारा नहीं होता, रोजगार गारंटी योजनाएं कमजोर पड़ चुकी हैं और खनन व सरकारी परियोजनाओं ने जमीन और संसाधन छीन लिए हैं. ऐसे में गुजरात का श्रिम्प उद्योग उनके लिए मजबूरी का रास्ता बन जाता है.

मजदूरों को गांवों से सीधे फार्म मालिक या उनके परिचित बुलाते हैं. ट्रेन टिकट मालिक देते हैं, स्टेशन से उन्हें सीधे फार्म ले जाया जाता है. वहां पहुंचने के बाद कई बार मजदूरी की शर्तें बदल जाती हैं. किसी से 10 हजार रुपये महीने का वादा किया जाता है, लेकिन बाद में खाने और राशन के नाम पर कटौती कर दी जाती है. कई मजदूरों ने कहा कि उन्हें रोज 12 घंटे काम के बदले सिर्फ 266 से 400 रुपये तक मिलते हैं, जबकि गुजरात की न्यूनतम मजदूरी इससे कहीं ज्यादा है.

सबसे अहम बात यह है कि इन मजदूरों के पास कोई लिखित अनुबंध नहीं होता. न नियुक्ति पत्र, न वेतन पर्ची और न कोई रिकॉर्ड. अगर मजदूरी रोक ली जाए तो उनके पास कुछ साबित करने का साधन नहीं बचता. अध्ययन में शामिल अधिकांश मजदूरों ने कहा कि उन्हें पैसे तब मिलते हैं जब वे काम खत्म कर गांव लौट जाते हैं. कई लोग महीनों तक इंतजार करते रहे, कुछ के पैसे तो सालों से अटके हुए हैं.

फार्मों पर काम भी बेहद जोखिम भरा है. मजदूर दिन में कई बार तालाबों के चक्कर लगाते हैं, कीचड़ और फिसलन के बीच नंगे पैर चलते हैं. बारिश के मौसम में खुले बिजली के तारों और मशीनों के बीच काम करना पड़ता है. मजदूरों ने बताया कि करंट लगने का डर हमेशा बना रहता है. इसके बावजूद अधिकांश को कोई सुरक्षा उपकरण नहीं दिए जाते.

रहने की स्थिति भी उतनी ही खराब है. जहां झींगों का दाना और केमिकल रखे जाते हैं, वहीं मजदूर सोते हैं. कई फार्मों पर शौचालय तक नहीं हैं. बिजली का इस्तेमाल पहले मशीनों के लिए होता है, मजदूरों के लिए नहीं. गर्मी में बिना पंखे के रात काटना आम बात है. पानी टैंकरों से आता है और उसी से नहाने, पीने और खाना बनाने का काम चलता है.

लेकिन केवल खराब मजदूरी और असुरक्षित काम ही समस्या नहीं है. अध्ययन बताता है कि इन फार्मों पर निगरानी और नियंत्रण की एक पूरी संस्कृति मौजूद है. मजदूरों के रहने की जगहों पर कैमरे लगाए गए हैं. जब शोधकर्ता फार्मों पर पहुंचे तो कई मजदूरों को तुरंत मालिकों के फोन आ गए कि उनसे बात न करें. कुछ मालिक बातचीत के दौरान खुद मौजूद रहे. एक मालिक ने मजदूरों को “अपने बच्चे” कहा, लेकिन साथ ही यह भी बताया कि कैमरे उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जरूरी हैं.

कई मामलों में मालिक मजदूरों के आधार कार्ड तक अपने पास रख लेते हैं. मजदूर स्थानीय समाज से कटे रहते हैं. वे दूर-दराज फार्मों में बिखरे होते हैं, जहां न कोई यूनियन है, न सामूहिक आवाज. कुछ मजदूरों ने कहा कि पास में चर्च होने के बावजूद उन्हें वहां जाने की छुट्टी तक नहीं मिलती.

भारत में श्रिम्प उद्योग का विस्तार तेज़ी से हुआ है, लेकिन श्रम कानूनों की मौजूदगी लगभग गायब है. श्रिम्प फार्मों की निगरानी करने वाली संस्थाओं का ध्यान मुख्य रूप से पर्यावरण और उत्पादन पर रहता है, मजदूरों की हालत पर नहीं. निजी ऑडिट और “सस्टेनेबल” सर्टिफिकेशन भी अक्सर सिर्फ कागजी रिकॉर्ड देखते हैं, मजदूरों की वास्तविक स्थिति नहीं.

यही वजह है कि यह कहानी केवल झींगों की नहीं, बल्कि उस भारतीय अर्थव्यवस्था की भी है जो सस्ते और असुरक्षित श्रम पर टिकी हुई है. गांवों की गरीबी शहरों और औद्योगिक इलाकों को सस्ती मेहनत देती है, लेकिन बदले में मजदूरों को न सुरक्षा मिलती है, न सम्मान और न स्थायित्व.

जब एक मजदूर से पूछा गया कि क्या वह अगले सीजन फिर गुजरात लौटेगा, तो उसने कहा “मेरा घर ही बेहतर है.” लेकिन असली सवाल यही है कि अगर घर बेहतर है, तो फिर हर साल हजारों लोग वापस इन्हीं फार्मों पर लौटने को क्यों मजबूर हो जाते हैं.

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