श्रवण गर्ग | ये गजब का त्रिकोण जैसा बना है. सरकार, हिंदू और मुसलमान और बीच में गाय खड़ी हुई है.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस विस्तृत संवाद में वरिष्ठ पत्रकार निधीश त्यागी और वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने पश्चिम बंगाल में बकरी ईद के दौरान गायों की कुर्बानी को लेकर पैदा हुए विवाद, उसके राजनीतिक अर्थ और उससे निकलते बड़े सामाजिक संकेतों पर विस्तार से चर्चा की. बातचीत की शुरुआत पश्चिम बंगाल की नई राजनीतिक परिस्थितियों से हुई, जहां बीजेपी के उभार के बाद 1950 के पुराने कानून को सख्ती से लागू करने की बात सामने आई. इसी कानून के आधार पर कहा गया कि बिना विशेष फिटनेस सर्टिफिकेट के गायों को स्लॉटर हाउस नहीं भेजा जा सकता.
इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल के मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से ने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की कि वे ईद के दौरान गायों की कुर्बानी नहीं देंगे. बातचीत में यह कहा गया कि यह सिर्फ धार्मिक या कानूनी प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक संदेश की तरह सामने आई. श्रवणग ने कहा कि पश्चिम बंगाल ऐतिहासिक रूप से सांस्कृतिक विविधता वाला प्रदेश रहा है, जहां मांसाहार को लेकर उत्तर भारत जैसी वैचारिक कठोरता नहीं रही. वामपंथी सरकारों से लेकर तृणमूल कांग्रेस तक, 1950 का कानून किताबों में जरूर था, लेकिन उसे राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं किया गया.
चर्चा में बार-बार शुभेंदु अधिकारी की भूमिका का जिक्र आया. कहा गया कि तृणमूल कांग्रेस में रहते हुए उन्हें कभी इस मुद्दे पर आपत्ति नहीं थी, लेकिन बीजेपी में आने के बाद वही मुद्दा अचानक “हिंदुत्व राजनीति” का केंद्र बन गया. इसी संदर्भ में यह सवाल उठाया गया कि क्या बीजेपी का यह दांव उल्टा पड़ गया, क्योंकि मुस्लिम समुदाय ने टकराव के बजाय “हम गाय नहीं काटेंगे” जैसी रणनीति अपनाकर पूरा राजनीतिक समीकरण बदल दिया.
बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जहां इस फैसले के आर्थिक असर पर चर्चा हुई.श्रवण गर्ग ने कहा कि पश्चिम बंगाल में गायों और पशुधन का पूरा बाजार केवल धार्मिक नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है. गाय खरीदने वाले मुसलमान होते हैं, लेकिन बेचने वाले बड़ी संख्या में गरीब हिंदू पशुपालक होते हैं. अनुमानित तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपये का यह कारोबार ईद के आसपास सक्रिय होता है. ऐसे में जब मुस्लिम समुदाय ने गाय न खरीदने का फैसला लिया, तो सबसे ज्यादा असर उन्हीं ग्रामीण हिंदू परिवारों पर पड़ा जिन्होंने पशु पालकर बिक्री की उम्मीद लगाई थी.
संवाद में यह भी कहा गया कि अचानक बहुत से हिंदू पशुपालक खुद बीजेपी से नाराज दिखने लगे. कथित तौर पर वे कह रहे हैं कि “हमने दीदी से नाराज होकर बीजेपी को वोट दिया था, लेकिन अब हमारी रोजी-रोटी ही खत्म हो रही है.” इसी बिंदु पर बातचीत ने एक नया मोड़ लिया, जहां इसे केवल सांप्रदायिक या धार्मिक विवाद नहीं बल्कि “आर्थिक राजनीति” के रूप में देखने की कोशिश की गई.
श्रवण गर्ग ने इसके बाद तीन अलग-अलग बीजेपी शासित राज्यों की घटनाओं को एक साथ जोड़कर देखने की बात कही. मध्य प्रदेश के रतलाम में गाय का कटा सिर मिलने के बाद सांप्रदायिक तनाव पैदा होने की घटना, राजस्थान के जैसलमेर में भूख-प्यास और सरकारी लापरवाही से सैकड़ों गायों की मौत, और पश्चिम बंगाल में गायों की कुर्बानी पर राजनीतिक विवाद इन तीनों को उन्होंने “गाय की राजनीति” के अलग-अलग चेहरे बताया. उनका तर्क था कि जहां एक तरफ गाय के नाम पर मॉब लिंचिंग और सांप्रदायिक उन्माद पैदा किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ हजारों गायों की मौत पर वही राजनीतिक संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती.
बातचीत में यह सवाल भी उठाया गया कि अगर बीजेपी गाय को इतना पवित्र मानती है, तो उसे आधिकारिक रूप से “राष्ट्रीय पशु” घोषित क्यों नहीं करती. इसी संदर्भ में शुभेंदु अधिकारी के उस बयान की चर्चा हुई जिसमें 14 साल से अधिक उम्र की गायों को विशेष प्रमाणपत्र के बाद काटने की अनुमति की बात कही गई थी. इस पर व्यंग्यात्मक तरीके से सवाल उठाया गया कि अगर गाय “माता” है, तो उसकी उम्र के आधार पर उसके वध की अनुमति कैसे दी जा सकती है.
संवाद के दौरान एक बड़ा राजनीतिक सवाल यह भी उभरा कि क्या पश्चिम बंगाल के मुसलमानों का यह कदम एक तरह का “अहिंसक प्रतिरोध” है. निधीश त्यागी ने पूछा कि क्या इसे हिंदुत्व राजनीति के खिलाफ एक शांत लेकिन रणनीतिक जवाब माना जा सकता है. श्रवण गर्ग ने इसकी तुलना गुजरात और सौराष्ट्र के उन दलित आंदोलनों से की, जहां दलित समुदाय ने अत्याचारों के खिलाफ मृत पशु उठाने और चमड़ा निकालने का काम बंद कर दिया था, जिसके बाद पूरा इलाका संकट में आ गया था. उनके मुताबिक, जब कोई समुदाय उस काम को करने से इनकार कर देता है जिस पर पूरी सामाजिक-आर्थिक संरचना निर्भर हो, तो उसका असर सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता.
चर्चा में विपक्षी दलों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए. यह कहा गया कि तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और वामपंथी दल सार्वजनिक रूप से मुस्लिम समुदाय के इस फैसले के साथ खड़े क्यों नहीं दिख रहे. क्या उन्हें डर है कि खुलकर समर्थन देने पर हिंदू वोट बैंक नाराज हो सकता है. इस बहस के जरिए “सॉफ्ट हिंदुत्व” और विपक्ष की राजनीतिक चुप्पी पर भी सवाल उठाए गए.
बातचीत आगे बढ़ते हुए नागरिकता, मतदाता सूची और एसआईआर विवाद तक पहुंची. श्रवणग ने कहा कि पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ गाय या कुर्बानी नहीं है, बल्कि मतदाता सूची से नाम हटने और भविष्य में नागरिकता पर संकट की आशंका है. इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए और यह कहा गया कि आने वाले समय में यह विवाद दूसरे राज्यों तक फैल सकता है. पूरी वीडियो यहाँ देखी जा सकती है.

