‘अन्यथा यूपी ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ में बदल जाएगा’ : डीयू स्नातक को हिरासत में लेने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी सरकार को फटकार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय स्नातक आकृति चौधरी के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के आरोपों को खारिज करते हुए राज्य प्रशासन और पुलिस तंत्र को सख्त चेतावनी दी है. न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ द्वारा दिए गए इस ऐतिहासिक 15 पन्नों के आदेश में नागरिक स्वतंत्रताओं, लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया गया है.

आकृति चौधरी को नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था. पुलिस ने इस आंदोलन को रोकने के लिए 15 एफआईआर दर्ज की थीं और लगभग 60 लोगों को जेल भेजा था.

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में सोम्या पंवार के अनुसार, अदालत ने पाया कि वीडियो साक्ष्यों में लोग शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों (अधिक वेतन और काम के मानवीय घंटे) के लिए एकत्र हुए थे, न कि हिंसा फैलाने के लिए. पीठ ने माना कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सड़कों पर उतरकर बिना हथियारों के शांतिपूर्ण आंदोलन करना शामिल है.

मुख्य बिंदु और कानूनी दिशा-निर्देश

'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' और नौकरशाही को चेतावनी: आदेश में कहा गया कि "नौकरशाही और पुलिस जब अपनी निष्ठा की शपथ के अनुरूप कार्य करती है, तो इस राज्य के आभारी नागरिक उन्हें अत्यंत सम्मान देंगे और सही मायनों में उन्हें ऐसे स्थान पर बिठाएंगे जिससे ईश्वर को भी ईर्ष्या हो सकती है."

लेकिन आदेश में आगे कहा गया, "हालांकि, हर बार जब वे उस गंभीर शपथ को नजरअंदाज करते हैं और उसके विपरीत कार्य करते हैं, तो उत्तर प्रदेश राज्य के लोग उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के एक दमनकारी अवशेष के रूप में देखेंगे, जिससे उनके प्रति आक्रोश और घृणा उत्पन्न होगी तथा नागरिक अशांति का माहौल बनेगा. यह अदालत उनकी ज्यादतियों और/या गैर-कानूनी कृत्यों—विशेष रूप से जो बिना किसी पर्याप्त कारण या उचित प्रक्रिया (कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया में निहित) के नागरिकों की नागरिक स्वतंत्रता पर आघात करते हैं—को सुधारते हुए, उनके तानाशाही आचरण को दर्ज करने के अलावा, पीड़ित नागरिक को मुआवजा देने के लिए सख्त आदेश पारित कर सकती है. अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब नौकरशाही में मौजूद गुमराह अधिकारी उत्तर प्रदेश राज्य को एक 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' में बदल देंगे."

संविधान के प्रति वफादारी: पीठ ने रेखांकित किया कि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की प्राथमिक वफादारी संविधान और जनता के प्रति होनी चाहिए, न कि तत्कालीन राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति.  अधिकारियों को याद दिलाया गया कि वे लोकतंत्र में जनता के सेवक हैं.

लोकतांत्रिक सेफ्टी वाल्व के रूप में विरोध प्रदर्शन: अदालत ने कहा कि समाज में असहमति और प्रदर्शन 'प्रेशर कुकर में सेफ्टी वाल्व' की तरह काम करते हैं. दबी हुई भावनाओं को रोकने से हिंसा भड़कने का खतरा बढ़ता है. शांति भंग की केवल आशंका के आधार पर लोगों को एकत्रित होने से रोकना उनके संवैधानिक अधिकारों को खत्म करने जैसा है.

एनएसए के दुरुपयोग पर रोक: उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) का उपयोग सामान्य मामलों में जमानत रोकने के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता. किसी व्यक्ति को एनएसए के तहत निरुद्ध करने के लिए ठोस और मजबूत साक्ष्य होने चाहिए, न कि केवल जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) की काल्पनिक या पूर्वाग्रह से ग्रसित राय.

ऐतिहासिक मुआवजा और अधिकारियों पर व्यक्तिगत जवाबदेही अदालत ने गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) द्वारा शक्ति के गैर-जिम्मेदाराना प्रयोग और अनुच्छेद 21 के तहत नागरिक अधिकारों के उल्लंघन पर कड़ा रुख अपनाया. अदालत ने याचिकाकर्ता को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया और यह स्पष्ट निर्देश दिया कि इस राशि की वसूली संबंधित जिला मजिस्ट्रेट के वेतन से की जाए, साथ ही इसमें शामिल निचले स्तर के अधिकारियों (एसएचओ तक) से भी अनुपातिक वसूली हो. आदेश में कहा गया, "यह अदालत यह भी निर्देश देती है कि उक्त राशि की वसूली गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट के वेतन से की जानी चाहिए, जिन्होंने बिना दिमाग लगाए यह हिरासत आदेश पारित किया है, और उन सभी अन्य अधिकारियों से भी की जानी चाहिए जो एसएचओ स्तर तक इसके लिए जिम्मेदार रहे हों."

राज्य को यह याद दिलाते हुए कि एक शांतिपूर्ण आंदोलन जहां लोग बिना अस्त्र-शस्त्र के एकत्र होते हैं, उसे अभी भी शरारती तत्वों द्वारा विफल किया जा सकता है (जो उन पक्षों द्वारा भेजे जा सकते हैं जिनकी रुचि यह सुनिश्चित करने में हो कि ऐसा आंदोलन टूट जाए), अदालत ने कहा कि ऐसे तत्व हिंसा के कृत्यों में लिप्त हो सकते हैं जिन्हें बाद में पूरे समूह पर मढ़ दिया जाता है जो "स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण" है.

फैसले में कहा गया, "शांति भंग की आशंका के आधार पर लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर एकत्र होने या अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करने से रोकना, समस्या के समाधान की जगह मुख्य अधिकार को ही खत्म कर देने जैसा होगा. यदि राज्य द्वारा ऐसा दृष्टिकोण अपनाया जाता है और अदालतों द्वारा उसका अनुमोदन किया जाता है, तो इससे सार्वजनिक स्थानों पर राय की सामूहिक अभिव्यक्ति समाप्त हो जाएगी.  संविधान ऐसे अधिकार की रक्षा करता है और राज्य की केवल व्यक्तिपरक राय पर इसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है.  राज्य को यह भी महसूस करना चाहिए कि उसके पास एक मजबूत और शक्तिशाली पुलिस बल है, जिसे ऐसी बड़ी सभाओं में सार्वजनिक व्यवस्था सुनिश्चित करने और सभा व उसके संचालन के तरीके की वीडियोग्राफी करने में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि हिंसा भड़कने की स्थिति में जवाबदेही तय की जा सके."

यह फैसला प्रशासनिक मशीनरी को यह संदेश देता है कि अनियंत्रित शक्तियों का प्रयोग लोकतंत्र में अस्वीकार्य है और व्यक्तिगत जवाबदेही से बचना संभव नहीं है. यह खबर का सारांश है. पूरी खबर यहां पढ़ी जा सकती है.

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