शुद्धव्रत सेनगुप्ता | वंदे मातरम को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना, उस पर सवाल खड़े करता है

‘कड़वी कॉफी’ की इस कड़ी में प्रो. अपूर्वानंद, शुद्धव्रत सेनगुप्ता के साथ वंदे मातरम को लेकर जारी विवाद पर विस्तार से बातचीत कर रहे हैं. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वंदे मातरम के पूरे छंद गाए जाएं या नहीं, बल्कि यह भी है कि इस गीत का मूल संदर्भ क्या था, आनंदमठ में इसका अर्थ कैसे बदलता है और क्या किसी नागरिक को देशभक्ति की एक तय अभिव्यक्ति के लिए बाध्य किया जा सकता है.

शुद्धव्रत सेनगुप्ता के मुताबिक वंदे मातरम को आज जिस तरह एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जा रहा है, उस पर सवाल उठना स्वाभाविक है. उनके अनुसार देश में शिक्षा, रोजगार, महंगाई और सामाजिक-आर्थिक संकट जैसे कई गंभीर मुद्दे हैं, लेकिन संसद का एक पूरा सत्र इन पर पर्याप्त चर्चा के बिना निकल गया. ऐसे में वंदे मातरम को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना क्या वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने की कोशिश है?

बातचीत में वंदे मातरम के साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भ को समझने की कोशिश की जाती है. शुद्धव्रत बताते हैं कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की मूल रचना और आनंदमठ में शामिल विस्तृत रूप के बीच महत्वपूर्ण अंतर है. शुरुआती दो छंदों में जहां मातृभूमि का भाव प्रमुख है, वहीं बाद के छंदों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक प्रतीक आते हैं. यही वजह है कि निराकार ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए इसके पूरे रूप का गायन धार्मिक आपत्ति का विषय बन सकता है.

यह आपत्ति केवल मुसलमानों या ईसाइयों तक सीमित नहीं है. ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसी हिंदू परंपराओं में भी मूर्ति पूजा को स्वीकार नहीं किया जाता. शुद्धव्रत अपने ब्रह्म समाज परिवार का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि उन्हें बचपन से वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों तक ही गाने की परंपरा बताई गई.

इसके बाद बातचीत आनंदमठ के उस संदर्भ तक पहुंचती है, जिसे आज की बहस में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. शुद्धव्रत के अनुसार उपन्यास का मुसलमान विरोधी संदर्भ महत्वपूर्ण है. वे बताते हैं कि जिस ऐतिहासिक संन्यासी-फकीर विद्रोह की पृष्ठभूमि में आनंदमठ को रखा जाता है, उसमें हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल थे. यह विद्रोह अकाल, आर्थिक संकट और ईस्ट इंडिया कंपनी की कर नीतियों के खिलाफ था. लेकिन आनंदमठ में इस जटिल इतिहास को एक ऐसे आख्यान में बदला गया जिसमें मुसलमानों को प्रमुख शत्रु के रूप में प्रस्तुत किया गया.

इसी कारण शुद्धव्रत का तर्क है कि आनंदमठ और वंदे मातरम को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग करके देखना मुश्किल है. उनके अनुसार किसी ऐसे साहित्यिक संदर्भ से निकले गीत को उन लोगों से अनिवार्य रूप से गाने के लिए कहना, जिन्हें उस रचना के धार्मिक या राजनीतिक अर्थ से आपत्ति हो सकती है, एक गंभीर सवाल खड़ा करता है.

बातचीत में रविंद्रनाथ टैगोर की भूमिका भी सामने आती है. "घरे-बाइरे" और "गोरा" जैसी रचनाओं के जरिए टैगोर के राष्ट्रवाद और हिंदू जातीयतावाद के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण को समझाया जाता है. 1937 में वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस की कार्यकारिणी समिति के निर्णय का भी उल्लेख होता है, जिसमें महात्मा गांधी, मौलाना आजाद, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता शामिल थे. शुद्धव्रत के अनुसार उस समय शुरुआती दो छंदों को स्वीकार करने का रास्ता अपनाया गया था, क्योंकि इससे धार्मिक और सामाजिक विविधता का सम्मान बना रह सकता था.

बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण सवाल नागरिक स्वतंत्रता से जुड़ता है. शुद्धव्रत बीजू इमैनुएल मामले का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि किसी राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान को न गाना, यदि व्यक्ति शांतिपूर्वक रहे और उसमें बाधा न डाले, अपने आप में अपमान नहीं माना जा सकता. उनका सवाल है कि अगर देश के प्रति प्रेम वास्तविक है तो उसकी अभिव्यक्ति का तरीका भी क्या राज्य तय करेगा?

इसी संदर्भ में उनका एक महत्वपूर्ण तर्क सामने आता है: "आप मुझे किसी से प्रेम करने के लिए बाध्य कैसे कर सकते हैं?" उनके अनुसार किसी नागरिक को यह बताना कि वह अपने देश के प्रति प्रेम किस तरह व्यक्त करे, स्वतंत्रता की भावना के विपरीत है.

पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

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