अडानी के खिलाफ मामला वापस लेने के फैसले पर अमेरिकी न्यायाधीश ने न्याय विभाग से मांगा जवाब

‘द वायर’ के मुताबिक, अमेरिका में गौतम अडानी के खिलाफ आपराधिक मामले को वापस लेने के फैसले पर अब अदालत ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं. न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की अमेरिकी जिला अदालत के न्यायाधीश निकोलस गाराउफिस ने कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) ने अदालत को मुकदमा वापस लेने के अपने फैसले के पीछे की पूरी वजह नहीं बताई.

यह मामला उस समय नया मोड़ ले गया जब गौतम अडानी के वकील रॉबर्ट जिउफ्रा जूनियर की ओर से दाखिल दस्तावेज़ों में ऐसी जानकारी सामने आई, जो न्याय विभाग के पहले के दावे से मेल नहीं खाती.

क्या है पूरा मामला?

डीओजे ने जुलाई की शुरुआत में अदालत को बताया था कि मुकदमा वापस लेने का फैसला केवल प्रिंसिपल एसोसिएट डिप्टी अटॉर्नी जनरल आर. ट्रेंट मैककॉट्टर ने लिया था. उन्होंने अपने हलफनामे में खुद को इस फैसले का "अंतिम और एकमात्र निर्णयकर्ता" बताया था. उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने अमेरिकी अटॉर्नी जोसेफ नोसेला या किसी अन्य सरकारी वकील से अपने बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए नहीं कहा.

लेकिन अडानी के वकील द्वारा दाखिल दस्तावेज़ों में 11 मई 2026 का एक ईमेल शामिल था, जिसे अमेरिकी अटॉर्नी जोसेफ नोसेला ने बचाव पक्ष के वकीलों को भेजा था. इस ईमेल की प्रति मैककॉट्टर और न्याय विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को भी भेजी गई थी.

ईमेल में नोसेला ने अडानी समूह की ओर से अमेरिका में 10 अरब डॉलर निवेश करने के प्रस्ताव को मुकदमा समाप्त करने के आधार के रूप में साफ़ तौर पर खारिज कर दिया. हालांकि उन्होंने यह भी लिखा कि आपराधिक मामले के समाधान के लिए अन्य संभावित आधारों पर बातचीत जारी है.

न्यायाधीश गाराउफिस ने कहा कि इस ईमेल से संकेत मिलता है कि 11 मई तक नोसेला भी मामले के समाधान और निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल थे. इसलिए यह दावा कि केवल मैककॉट्टर ही फैसले के लिए जिम्मेदार थे, सवालों के घेरे में आ गया है.

अदालत ने क्या कहा?

अपने आदेश में न्यायाधीश गाराउफिस ने कहा कि अडानी के वकील द्वारा दाखिल दस्तावेज़ और नोसेला के ईमेल के अंश न्याय विभाग के पहले दिए गए स्पष्टीकरण का सीधे विरोध करते हैं. इससे यह संदेह पैदा होता है कि क्या अदालत के सामने मुकदमा वापस लेने की पूरी और वास्तविक वजह रखी गई है.

अदालत ने यह भी नोट किया कि मुकदमा वापस लेने की 18 मई की अर्जी पर नोसेला के हस्ताक्षर थे, लेकिन 4 जुलाई को मैककॉट्टर द्वारा दाखिल स्पष्टीकरण पर उनके हस्ताक्षर नहीं थे. ऐसे में अदालत ने नोसेला से सीधे हलफनामा देने को कहा है कि क्या वे मुकदमा वापस लेने के लिए मैककॉट्टर द्वारा बताए गए सभी कारणों से सहमत हैं और क्या इसके अलावा भी कोई वजह थी.

नोसेला को 17 जुलाई तक शपथपत्र दाखिल करने का आदेश दिया गया है.

अडानी ने क्या कहा?

अदालत के निर्देश पर गौतम अडानी ने भी हलफनामा दाखिल किया. उन्होंने कहा कि उन्हें किसी ऐसे समझौते की जानकारी नहीं थी जिसके बदले आपराधिक मामला वापस लिया गया हो.

हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनके वकीलों ने यह सुझाव दिया था कि यदि न्याय विभाग या अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग (एसईसी) चाहे, तो अडानी समूह का प्रस्तावित 10 अरब डॉलर का अमेरिकी निवेश किसी संभावित समाधान का हिस्सा हो सकता है.

मामले की पृष्ठभूमि

अमेरिकी न्याय विभाग ने नवंबर 2024 में गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और छह अन्य लोगों के खिलाफ अभियोग दायर किया था. आरोप था कि उन्होंने भारतीय राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के ठेके हासिल करने के लिए लगभग 25 करोड़ डॉलर की रिश्वत देने की योजना बनाई और इसके साथ ही अडानी समूह से जुड़े बॉन्ड खरीदने वाले अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया.

इसी मामले से जुड़े एक समानांतर दीवानी मुकदमे में अमेरिकी प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग ने भी गौतम और सागर अडानी पर निवेशकों को गुमराह करने का आरोप लगाया था.

मई 2026 में एसईसी के साथ एक प्रस्तावित समझौते के तहत दोनों ने आरोप स्वीकार या खारिज किए बिना कुल 1.8 करोड़ डॉलर का जुर्माना भरने पर सहमति जताई. इसके चार दिन बाद न्याय विभाग ने आपराधिक मामला वापस लेने की अर्जी अदालत में दाखिल कर दी.

अदालत की लगातार सख्ती

इससे पहले भी न्यायाधीश गाराउफिस न्याय विभाग की अर्जी पर सवाल उठा चुके हैं. उन्होंने मुकदमा वापस लेने के अनुरोध को "संक्षिप्त, सामान्य और निष्कर्षात्मक" बताते हुए कहा था कि सरकार को विस्तार से बताना होगा कि वह अभियोजन क्यों छोड़ना चाहती है.

इसके जवाब में मैककॉट्टर ने 4 जुलाई को अदालत में कहा था कि अडानी समूह के प्रस्तावित अमेरिकी निवेश का मुकदमा वापस लेने के फैसले से कोई संबंध नहीं था और उन्होंने यह निर्णय निवेश प्रस्ताव आने से पहले ही ले लिया था.

अब अडानी के वकील द्वारा पेश किए गए ईमेल के बाद अदालत ने मामले में और स्पष्टीकरण मांगा है. न्यायाधीश ने पहले ईमेल की पूरी प्रति भी तलब की थी. वकील रॉबर्ट जिउफ्रा ने अदालत को बताया कि पहले दाखिल दस्तावेज़ में केवल शुरुआती कुछ शब्द हटाए गए थे और बाद में पूरा ईमेल रिकॉर्ड पर प्रस्तुत कर दिया.

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