श्रवण गर्ग | सरकार की नजर में वांगचुक साहब की स्थिति अभी उतनी गंभीर नहीं है, जितनी चिंता देश में व्यक्त की जा रही है.
‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और निधीश त्यागी ने जंतर-मंतर पर चल रहे सोनम वांगचुक के आमरण अनशन, सरकार की प्रतिक्रिया और इस आंदोलन की बदलती दिशा पर विस्तार से चर्चा की. दोनों का कहना था कि आंदोलन अब अपने मूल मुद्दे से आगे बढ़कर एक बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है.
चर्चा की शुरुआत दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से दिए गए उस आश्वासन से हुई, जिसमें कहा गया कि सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की प्रतिदिन निगरानी की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप किया जाएगा. श्रवण गर्ग का कहना था कि सरकार ने अदालत में यह नहीं कहा कि वह वांगचुक से अनशन समाप्त करने की अपील करेगी या उनकी मांगों पर बातचीत शुरू करेगी. इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार फिलहाल आंदोलन को अपने तरीके से आगे बढ़ने देना चाहती है.
श्रवण गर्ग ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता इस समय संसद के मानसून सत्र और संभावित परिसीमन विधेयक के लिए राजनीतिक समर्थन जुटाने पर अधिक दिखाई देती है. उनके अनुसार, सरकार की रणनीति और आंदोलन की दिशा को साथ रखकर देखने की जरूरत है. उन्होंने यह भी कहा कि यदि संसद सत्र के दौरान कोई अप्रत्याशित स्थिति पैदा होती है तो उसका राजनीतिक असर व्यापक हो सकता है.
निधीश त्यागी ने कहा कि यह आंदोलन शुरुआत में शिक्षा, परीक्षा और युवाओं के मुद्दों से जुड़ा था, लेकिन अब पूरा विमर्श सोनम वांगचुक के आमरण अनशन पर केंद्रित हो गया है. उनका मानना था कि इससे मूल प्रश्न पीछे छूटते दिखाई दे रहे हैं. चर्चा में यह भी सवाल उठाया गया कि क्या आंदोलन की दिशा स्वाभाविक रूप से बदली है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक रणनीति काम कर रही है.
श्रवण गर्ग ने आंदोलन के संचालन, उसके संसाधनों और विभिन्न राजनीतिक दलों की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए. उन्होंने कहा कि यदि आंदोलन स्वयं को गैर-राजनीतिक बताता है तो फिर राजनीतिक दलों से समर्थन मांगने और कुछ दलों को प्राथमिकता देने जैसे फैसलों पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है. उन्होंने कांग्रेस, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों की भूमिका पर भी चर्चा करते हुए कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक संदेश कई स्तरों पर दिखाई दे रहे हैं.
बातचीत के अंत में दोनों ने सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य को सबसे महत्वपूर्ण बताते हुए उनसे आमरण अनशन समाप्त करने की अपील की. उनका कहना था कि लोकतांत्रिक आंदोलनों की सफलता केवल लंबे अनशन से नहीं, बल्कि व्यापक जनसमर्थन, संवाद और स्पष्ट राजनीतिक लक्ष्य से तय होती है. साथ ही उन्होंने आगाह किया कि यदि जन आंदोलनों का केंद्र केवल प्रतीकात्मक घटनाओं तक सीमित हो जाए तो मूल जनसरोकार और युवाओं के वास्तविक मुद्दे पीछे छूट सकते हैं. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

