कैसे वैश्विक ऑटो कंपनियों ने मोदी सरकार से भारत के पर्यावरण नियम बदलवाए
साल 2014 की शुरुआत में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने मारुति सुज़ुकी से साफ कहा था कि 20,000 वर्गमीटर से बड़े औद्योगिक भवन के निर्माण के लिए पहले पर्यावरण मंजूरी लेना अनिवार्य है. कुछ महीने बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इसी व्याख्या को सही ठहराया.
लेकिन इसी साल के अंत तक नरेंद्र मोदी सरकार ने नियम बदल दिए. दिसंबर 2014 में पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना में संशोधन कर औद्योगिक शेड को पूर्व पर्यावरण मंजूरी की अनिवार्यता से बाहर कर दिया गया.
‘आर्टिकल 14’ द्वारा सरकारी फाइलों, अदालत के दस्तावेज़ों और कंपनियों के रिकॉर्ड की समीक्षा से पता चलता है कि यह बदलाव दुनिया की कई बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों. जैसे वोक्सवैगन, मर्सिडीज-बेंज और मारुति सुज़ुकी. की लगातार लॉबिंग के बाद किया गया. वोक्सवैगन के मामले में भारतीय सरकारी अधिकारियों और राजनयिकों ने भी कंपनी का पक्ष रखा.
यह छूट लगभग दस साल तक लागू रही. मार्च 2024 में केरल हाईकोर्ट ने इसे अवैध करार दिया. जनवरी 2025 में केंद्र सरकार ने संशोधित रूप में फिर वही छूट बहाल की, लेकिन अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि इतने बड़े औद्योगिक भवनों को पर्यावरण जांच से बाहर रखने का कोई तार्किक आधार नहीं है. फिलहाल ऐसे प्रोजेक्टों के लिए फिर से पूर्व पर्यावरण मंजूरी आवश्यक है. दिसंबर 2025 में वोक्सवैगन ने भी पुणे के चाकण संयंत्र के विस्तार के लिए पर्यावरण मंजूरी का आवेदन दिया.
मंत्रालय और अदालत की शुरुआती राय
फरवरी 2014 में मारुति सुज़ुकी ने पर्यावरण मंत्रालय से पूछा था कि क्या ऑटोमोबाइल फैक्ट्रियां और उनके औद्योगिक शेड 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना के दायरे से बाहर हैं. मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने आंतरिक समीक्षा के बाद स्पष्ट किया कि ऑटोमोबाइल उद्योग भले अलग श्रेणी में हो, लेकिन 20,000 वर्गमीटर से बड़े औद्योगिक शेड के निर्माण के लिए पर्यावरण मंजूरी अनिवार्य है.
मारुति का कानूनी विवाद
यह पत्र ऐसे समय भेजा गया था जब हरियाणा में मारुति सुज़ुकी पर बिना पर्यावरण मंजूरी वाहन परीक्षण केंद्र बनाने का मामला चल रहा था. कंपनी ने दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी कि पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना केवल सूचीबद्ध परियोजनाओं पर लागू होती है.
26 मई 2014 को हाईकोर्ट ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि 20,000 वर्गमीटर से अधिक निर्मित क्षेत्र वाली सभी परियोजनाओं पर पर्यावरण प्रभाव आकलन के नियम लागू होंगे, चाहे उनका उद्देश्य कुछ भी हो. हालांकि अदालत ने फैसले को मिसाल न मानने की बात कही, लेकिन उसने यह स्पष्ट कर दिया कि बड़े औद्योगिक शेड के लिए भी पर्यावरण मंजूरी जरूरी है.
अदालत के फैसले के बाद शुरू हुई लॉबिंग
हाईकोर्ट के फैसले के एक महीने के भीतर वोक्सवैगन इंडिया ने तत्कालीन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर नियमों में बदलाव की मांग की. कंपनी ने कहा कि पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया लंबी है और इससे पुणे के चाकण संयंत्र के विस्तार में बाधा आ रही है.
इसके बाद कई महीनों तक वोक्सवैगन, मारुति सुज़ुकी, मर्सिडीज-बेंज, टाटा मोटर्स, शिंडलर, पर्किन्स और अन्य कंपनियों ने मंत्रालय को लगातार पत्र लिखे. बर्लिन स्थित भारतीय दूतावास, भारत-जर्मन वाणिज्य मंडल और उद्योग संवर्धन विभाग के अधिकारियों ने भी वोक्सवैगन के पक्ष में मंत्रालय से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया. उनका तर्क था कि इतनी बड़ी विदेशी निवेशक कंपनी की कारोबारी धारणा भारत में निवेश को प्रभावित कर सकती है.
उद्योग जगत का साझा अभियान
धीरे-धीरे यह मुद्दा केवल वोक्सवैगन तक सीमित नहीं रहा. कई कंपनियां और उद्योग संगठन इस अभियान में शामिल हो गए. चाकण से सांसद शिवाजी अधलराव पाटिल ने भी जावड़ेकर को पत्र लिखकर कहा कि महाराष्ट्र में लगभग 16,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं पर्यावरण मंजूरी के कारण अटकी हुई हैं और करीब 10,000 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता है. इनमें मर्सिडीज-बेंज, हीरो डेमलर, टाटा ऑटोकॉम्प, शिंडलर और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स जैसी कंपनियां शामिल थीं.
पाटिल के अनुसार मर्सिडीज-बेंज को महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का नोटिस मिलने के बाद उसने सांसद से मदद मांगी थी.
सरकार ने बदला अपना रुख
अगस्त 2014 में मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी अजय त्यागी ने एक नोट तैयार किया. इसमें उन्होंने माना कि दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि बड़े भवनों पर पर्यावरण प्रभाव आकलन के नियम लागू होते हैं. लेकिन उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि यदि सरकार औद्योगिक शेड को इस दायरे से बाहर रखना चाहती है तो अधिसूचना में संशोधन करना होगा.
इसी सुझाव के आधार पर सितंबर 2014 में मसौदा अधिसूचना जारी हुई. हालांकि उद्योग इससे भी संतुष्ट नहीं था और उसने अंतिम अधिसूचना में औद्योगिक भवनों को स्पष्ट रूप से छूट देने की मांग की.
दिसंबर 2014 में सरकार ने अंतिम अधिसूचना जारी कर औद्योगिक शेड को पर्यावरण मंजूरी की अनिवार्यता से बाहर कर दिया.
पारदर्शिता पर उठे सवाल
आर्टिकल 14 के अनुसार मंत्रालय ने अंतिम अधिसूचना में यह लिखा कि मसौदे पर कोई आपत्ति या सुझाव प्राप्त नहीं हुआ, जबकि मंत्रालय को कंपनियों, नागरिकों और पर्यावरण समूहों से कई प्रस्तुतियां मिली थीं.
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि निजी कंपनियों की आपत्तियों के आधार पर नियम बदले गए, लेकिन उन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया, तो यह नियामकीय पारदर्शिता और सरकार के पर्यावरण संरक्षण संबंधी संवैधानिक दायित्व दोनों का उल्लंघन हो सकता है.
केरल हाईकोर्ट ने रद्द किया संशोधन
2016 में एक पर्यावरण संगठन ने इस संशोधन को केरल हाईकोर्ट में चुनौती दी. मार्च 2024 में अदालत ने कहा कि अंतिम अधिसूचना मसौदे से काफी अलग थी और जनता को इस बदलाव पर अपनी राय देने का अवसर नहीं मिला. अदालत ने यह भी माना कि अधिसूचना में "कोई आपत्ति प्राप्त नहीं हुई" कहना गलत था. इसलिए संशोधन को अवैध घोषित कर दिया गया.
सुप्रीम कोर्ट की भी कड़ी टिप्पणी
इसके बावजूद जनवरी 2025 में केंद्र सरकार ने संशोधित रूप में फिर वही छूट बहाल कर दी. इस फैसले को एक पर्यावरण संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.
अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 20,000 वर्गमीटर से बड़े किसी भी निर्माण का पर्यावरण पर असर पड़ना स्वाभाविक है. इसलिए औद्योगिक शेड या शैक्षणिक संस्थानों को पर्यावरण मंजूरी से बाहर रखने का कोई तार्किक आधार नहीं है. अदालत ने संकेत दिया कि इस तरह का भेदभाव पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है.
लेख के अनुसार यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि कैसे उद्योग जगत की लगातार लॉबिंग, सरकारी हस्तक्षेप और राजनीतिक समर्थन के बाद केंद्र सरकार ने पहले अपने ही मंत्रालय और अदालत की व्याख्या को पलटते हुए नियम बदले. बाद में इन्हीं बदलावों को अदालतों ने कानूनी कसौटी पर खारिज कर दिया और बड़े औद्योगिक निर्माणों के लिए पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता को फिर से स्थापित किया.

