जॉन कुरियन | भारत की इथेनॉल नीति की सबसे बड़ी कीमत गरीब चुकाएंगे
भारत में इथेनॉल मिश्रित ईंधन को ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और कच्चे तेल के आयात को कम करने वाली नीति के रूप में पेश किया जा रहा है. लेकिन इस नीति का असली बोझ कौन उठा रहा है, यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण है.
राजनीतिक पारिस्थितिकी के विशेषज्ञ जोआन मार्टिनेज अलियर के साथ बातचीत के दौरान मुझे पहली बार समझ आया कि इथेनॉल केवल ईंधन का मुद्दा नहीं है. यह भोजन, पानी, जमीन और श्रम से जुड़ा सवाल भी है. ब्राजील के इथेनॉल कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए अलियर ने बताया था कि इससे कार रखने वाले अपेक्षाकृत समृद्ध लोगों को लाभ मिला, जबकि पानी, जमीन और गन्ना मजदूरों की कीमत पर इसकी लागत चुकाई गई. उन्होंने इसे "पारिस्थितिक वितरण संघर्ष" कहा था, जिसमें लाभ एक समूह को मिलता है और नुकसान दूसरे समूह पर डाल दिया जाता है.
भारत की इथेनॉल नीति को भी इसी नजरिए से देखने की जरूरत है.
ईंधन के लिए भोजन
जुलाई में सरकार ने राज्यसभा को बताया कि 2025-26 के इथेनॉल आपूर्ति वर्ष में जून 2026 तक सरकारी तेल कंपनियों ने 705.43 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदा, जिस पर 49,577 करोड़ रुपये खर्च हुए. पिछले तीन वर्षों में इथेनॉल खरीद पर 1.72 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं. देश में लगभग 501 इथेनॉल डिस्टिलरी हैं, जिनकी वार्षिक क्षमता करीब 16 अरब लीटर है.
सरकार का तर्क है कि खाद्य सुरक्षा की जरूरत पूरी होने के बाद बचा हुआ अनाज इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. इससे कच्चे तेल के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा बचती है और किसानों को कीमत गिरने से सुरक्षा मिलती है.
लेकिन इस "अधिशेष" की अर्थव्यवस्था पर सवाल उठता है. भारतीय खाद्य निगम किसानों से लगभग 44 रुपये प्रति किलो की दर से चावल खरीदता है और उसे इथेनॉल डिस्टिलरी को करीब 23 रुपये प्रति किलो में बेचता है. यानी सार्वजनिक धन से खरीदा गया खाद्यान्न निजी वाहनों के ईंधन को सब्सिडी दे रहा है.
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न मिलता है और इसमें चावल की बड़ी हिस्सेदारी है. ऐसे में चावल को इथेनॉल की ओर मोड़ना खाद्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है. मक्का की बढ़ती मांग किसानों को दालों और तिलहनों से दूर कर सकती है, जिससे गरीब परिवारों के लिए जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमत और उपलब्धता प्रभावित हो सकती है.
पानी और जमीन की कीमत
इथेनॉल की पर्यावरणीय लागत भी कम नहीं है. भारत में एक टन चावल पैदा करने में करीब 2,800 से 3,500 घन मीटर पानी लगता है. गन्ने को भी 1,500 घन मीटर से अधिक पानी की जरूरत होती है, जबकि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे जल संकट वाले राज्यों में इसकी खेती भूजल और नदियों पर भारी दबाव डालती है.
मक्का का जल पदचिह्न भी भारत में वैश्विक औसत से काफी अधिक है. यानी इथेनॉल उत्पादन के लिए जिन फसलों का विस्तार हो रहा है, वे पानी की उपलब्धता पर गंभीर असर डाल सकती हैं.
भारत के इथेनॉल लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अनुमानतः 70 से 80 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त कृषि भूमि की जरूरत पड़ सकती है. इतनी बड़ी जमीन को इथेनॉल फसलों की ओर मोड़ने से खेती जंगलों के किनारों तक फैल सकती है, मिट्टी में जमा कार्बन प्रभावित हो सकता है और इथेनॉल से मिलने वाला जलवायु लाभ कम हो सकता है.
इसकी मानवीय कीमत भी है. देश के गन्ना क्षेत्रों में कटाई का काम आज भी बड़े पैमाने पर हाथ से होता है और मजदूरों को अत्यधिक गर्मी में काम करना पड़ता है. अध्ययनों में कृषि मजदूरों के बीच हीट स्ट्रोक और किडनी की गंभीर बीमारियों का उल्लेख मिलता है. लेकिन ऐसी मानवीय लागत इथेनॉल नीति के आर्थिक आकलन में दिखाई नहीं देती.
पुराने वाहनों पर ज्यादा बोझ
इथेनॉल मिश्रण का असर वाहनों पर भी अलग-अलग पड़ता है. अप्रैल 2023 के बाद बने आधुनिक ईंधन इंजेक्शन वाले वाहन इथेनॉल की कम ऊर्जा क्षमता और संक्षारक प्रभाव को बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं. इनमें ईंधन दक्षता में करीब 2 से 5 प्रतिशत की कमी हो सकती है.
लेकिन पुराने कार्बोरेटर वाले वाहनों में स्थिति अलग है. उनकी माइलेज 15 से 20 प्रतिशत तक गिर सकती है और ईंधन लाइन तथा कार्बोरेटर में खराबी आ सकती है. इनकी मरम्मत का खर्च वाहन मालिकों को खुद उठाना पड़ता है.
भारत में दोपहिया वाहन कुल पंजीकृत वाहनों का लगभग 70 से 75 प्रतिशत हैं. इनका इस्तेमाल डिलीवरी कर्मचारियों, छोटे कारोबारियों, मजदूरों और रोजाना आने-जाने वाले लोगों द्वारा किया जाता है. बड़ी संख्या में ये वाहन 2023 से पहले के हैं. इसके विपरीत निजी कारों का स्वामित्व मुख्यतः अपेक्षाकृत संपन्न परिवारों के पास है.
इसलिए इथेनॉल नीति का तकनीकी बोझ भी समान रूप से वितरित नहीं है.
तीन तरफ से दबाव
भोजन, पर्यावरण और वाहन तकनीक को एक साथ देखें तो तस्वीर स्पष्ट होती है. इथेनॉल नीति से कच्चे तेल के आयात में कमी और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन में गिरावट जैसे फायदे हो सकते हैं, लेकिन इसकी लागत गरीब परिवारों, जल संकट वाले कृषि क्षेत्रों और दोपहिया वाहन पर निर्भर कामगारों तक पहुंच रही है.
इसका विकल्प मौजूद है. कृषि अवशेषों, धान की पराली और गन्ने की खोई से बनने वाला दूसरी पीढ़ी का इथेनॉल खाद्य फसलों के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा नहीं करता. पानी और जमीन पर इसका दबाव भी कम हो सकता है. पानीपत में इंडियन ऑयल का 2जी इथेनॉल संयंत्र इस दिशा की संभावनाएं दिखाता है, हालांकि इसकी तकनीक महंगी है और कृषि अवशेषों को इकट्ठा करने की बड़ी चुनौती है.
ऊर्जा संक्रमण जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि उसका खर्च वही लोग उठाएं जिनकी आवाज नीति बनाने की प्रक्रिया में सबसे कमजोर है. भारत की इथेनॉल नीति का मूल्यांकन केवल पेट्रोल में मिश्रण के प्रतिशत से नहीं, बल्कि इस सवाल से भी होना चाहिए कि इस नीति का लाभ किसे मिलता है और इसकी कीमत कौन चुकाता है.
लेखक जॉन कुरियन तिरुवनंतपुरम स्थित सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के पूर्व प्रोफेसर और विकास क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.

