अपूर्वानंद | शिक्षा अब समान अवसर नहीं, 'जुआ' है
'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी के साथ बातचीत में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और सामाजिक कार्यकर्ता अपूर्वानंद ने जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध, परीक्षा व्यवस्था, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी से लेकर देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए.
अपूर्वानंद के मुताबिक, जंतर-मंतर पर जो हुआ उसे अभी "आंदोलन" कहना ठीक नहीं होगा. वह इसे लंबे समय से जमा गुस्से का "जन उभार" मानते हैं. उनके अनुसार इसमें केवल जेन-जी के युवा नहीं, बल्कि समाज के वंचित तबकों से आने वाले ऐसे नौजवान भी बड़ी संख्या में शामिल थे, जिनके सामने अवसर लगातार कम होते गए हैं. पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियां इस नाराजगी की वजह जरूर बनीं, लेकिन असंतोष इससे कहीं व्यापक है.
इस उभार के बाद पुलिस कार्रवाई पर भी अपूर्वानंद ने गंभीर सवाल उठाए. उनका आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के साथ नागरिकों के बजाय "दुश्मनों" जैसा व्यवहार किया गया. उन्होंने प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें जारी करने, उनकी पहचान कराने और अलग-अलग राज्यों में हुई कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि विरोध के बाद कुछ मुस्लिम प्रदर्शनकारियों की अलग पहचान और कथित सांप्रदायिक प्रोफाइलिंग की आशंका भी सामने आई है. उनके मुताबिक किसी भी आंदोलन और राजनीतिक दल को ऐसी प्रोफाइलिंग के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए.
लेकिन बातचीत का बड़ा सवाल पेपर लीक से आगे जाकर शिक्षा व्यवस्था पर था. क्या शिक्षा मंत्री बदलने या नई समिति बनाने से समस्या हल हो जाएगी? अपूर्वानंद का तर्क है कि जब आबादी के मुकाबले अवसर और सीटें बेहद कम हों और प्रतियोगिता इतनी कठिन तथा महंगी हो जाए कि उसमें उतरने के लिए ही कोचिंग पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़े, तब भ्रष्टाचार और असमानता को केवल परीक्षा प्रबंधन की समस्या मानना अधूरा है.
उन्होंने सवाल उठाया कि मेडिकल की सीटें इतनी कम क्यों हैं? सरकारी मेडिकल कॉलेज और सीटें क्यों नहीं बढ़ाई जातीं? निजी मेडिकल कॉलेज में भारी फीस देकर प्रवेश संभव है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर छात्र एक सीट के लिए बेहद कठिन प्रतियोगिता में उतरता है. ऐसे में परीक्षा को "लीक-प्रूफ" बनाने की तकनीक से पहले अवसरों की असमानता पर बात जरूरी है.
पेपर लीक रोकने के लिए नई समिति बनाने पर भी उन्होंने सवाल किया. उनका कहना था कि पहले बनी समितियों की रिपोर्ट और सिफारिशों पर क्या हुआ, यह स्पष्ट होना चाहिए. क्या उन रिपोर्टों को सार्वजनिक किया गया, संसद में रखा गया और शिक्षाविदों के बीच उन पर गंभीर बहस हुई? अगर पुरानी सिफारिशों के भविष्य का ही पता नहीं है, तो एक और समिति बनाने से भरोसा कैसे लौटेगा?
बातचीत में सबसे तीखा निष्कर्ष शिक्षा के बदलते चरित्र को लेकर आया. अपूर्वानंद के मुताबिक शिक्षा कभी सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता का ऐसा रास्ता थी, जहां अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों को समान अवसर मिलने की उम्मीद रहती थी. लेकिन सीटों की कमी, महंगी कोचिंग, अनिश्चित परीक्षाओं और रोजगार के संकट ने इसे "जुए" जैसी व्यवस्था में बदल दिया है.
उनका तर्क है कि विश्वविद्यालय का काम केवल बाजार की जरूरत के मुताबिक नौकरी के लिए तैयार उम्मीदवार पैदा करना नहीं, बल्कि छात्रों में समझ, विश्लेषण की क्षमता और बदलती परिस्थितियों से निपटने का बौद्धिक लचीलापन पैदा करना है.
पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

