‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने रक्षा एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ सुशांत सिंह के साथ भारत-चीन संबंधों, अरुणाचल प्रदेश में सीमा विवाद और भारत की विदेश नीति पर चर्चा की.
सुशांत सिंह के अनुसार, भारत और चीन के संबंध सामान्य होने के दावों के बावजूद सीमा पर तनाव बना हुआ है. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच जारी गतिरोध का उल्लेख करते हुए कहा कि सीमा की वास्तविक स्थिति और सरकार की ओर से दी जाने वाली जानकारी के बीच अंतर को समझना जरूरी है. उनके मुताबिक, सीमा पर तनाव के बीच व्यापार बढ़ाना और उच्चस्तरीय मुलाकातों को संबंधों में सुधार का संकेत मानना पर्याप्त नहीं है.
सिंह ने कहा कि भारत और चीन की आर्थिक एवं सामरिक क्षमताओं के बीच का अंतर बढ़ा है, जिसका असर द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ा है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चीन में भारत की विदेश नीति को लेकर यह धारणा मजबूत हुई है कि भारत अपने स्वतंत्र राष्ट्रीय हितों के बजाय अमेरिकी रणनीति के अनुरूप फैसले लेता है. उनके अनुसार, इस धारणा को बदलने के लिए भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता प्रदर्शित करनी होगी और विदेश नीति से जुड़े निर्णय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर लेने होंगे.
अरुणाचल प्रदेश की स्थिति पर चर्चा करते हुए सिंह ने बताया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय लोगों की आवाजाही और भारतीय सैनिकों की गश्त से जुड़ी समस्याओं की खबरें सामने आई हैं. उन्होंने कुछ स्थानों पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच गतिरोध और पहले जैसी स्थिति बहाल न होने को चिंता का विषय बताया. उनका कहना था कि यदि सीमा पर स्थिति बदलती है और उसका समाधान नहीं निकलता, तो भविष्य में सीमा विवाद पर होने वाली बातचीत में भारत की स्थिति कमजोर हो सकती है.
बातचीत में 2017 के डोकलाम गतिरोध और 2020 के गलवान संघर्ष के बाद सीमा पर बनी स्थिति का भी उल्लेख हुआ. सिंह के अनुसार, इन घटनाओं के बाद कई क्षेत्रों में पहले जैसी स्थिति पूरी तरह बहाल नहीं हुई. उन्होंने कहा कि सीमा विवाद पर पारदर्शिता और स्पष्ट जानकारी जरूरी है, क्योंकि वास्तविक स्थिति को समझे बिना प्रभावी नीति बनाना कठिन है.
सिंह ने भारत की विदेश नीति की आलोचना करते हुए कहा कि देश को अपनी सामरिक क्षमता मजबूत करने, आर्थिक चुनौतियों से निपटने और प्रमुख शक्तियों के साथ संबंधों में स्वतंत्र निर्णय लेने की जरूरत है. उनके मुताबिक, विदेश नीति की सफलता केवल अंतरराष्ट्रीय छवि से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा और ठोस परिणामों से आंकी जानी चाहिए.
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