प्रधान की बलि भी मोदी को बचा नहीं पाएगी

हालिया विरोध प्रदर्शनों के चरम के दौरान जिन लोगों ने भी जंतर-मंतर का रुख किया, वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति वहां बने निर्भीक और स्पष्ट रूप से शत्रुतापूर्ण माहौल को अनदेखा नहीं कर सके. प्रतिरोध और अवज्ञा के उस नए-नवेले केंद्र पर बिताया गया एक घंटा ही इस स्वाभाविक सवाल को उठाने के लिए काफी था: मोदी ने आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान की बलि क्यों नहीं दी? क्या एक मामूली राजनेता इतना अपरिहार्य हो गया है कि यह शासन उसे बचाने के लिए अपने स्वयं के अस्तित्व को जोखिम में डाल देगा? राजा को बचाने के लिए प्यादे की कुर्बानी देने के समय की कसौटी पर खरे उतरे इस हथियार का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?

‘द वायर’ के लिए हरीश खरे ने लिखा है कि जब तक शनिवार दोपहर को प्रधान को अपना बिस्तर-बोरिया समेटने के लिए कहा गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अचल दिखने वाले शहंशाह भारत की युवा शक्ति के उस न रुकने वाले तूफान के आगे बेबस नजर आए. और इसी के साथ, मोदी की अजेयता का मिथक भी ध्वस्त हो गया. बेशक, अंतिम जवाबदेही शहंशाह की ही बनती है, लेकिन इस बात की चर्चा भी शुरू हो चुकी है कि किस तरह अमित शाह और आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व सहित अन्य दरबारियों ने इस बेहद बड़ी और महंगी नाकामी में योगदान दिया. आखिरकार इन हिसाब-किताबों का निपटारा कैसे होता है, यह सत्तारूढ़ व्यवस्था का अंदरूनी मामला है. लेकिन, वृहद राजनीति के लिए इसके फायदे साफ और अपरिवर्तनीय हैं.

इस पूरी घटना ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खुद द्वारा बनाए गए अकेलेपन पर रोशनी डाली है. वह एक ऐसे नेता हैं जो विदेशी धरती की झूठी और दिखावटी वाहवाही में सराबोर होना पसंद करते हैं, शायद इसे वे देश की सड़कों पर पनप रही चिंताओं और आक्रोश से दूर भागने के एक रास्ते के रूप में भी देखते हैं. जंतर-मंतर के इन "कॉकरोचों" ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मोदी को अब सत्ता के खेल का सर्वोपरि खिलाड़ी स्वीकार नहीं किया जाएगा.

शुरुआत करने के लिए, मोदी की अजेयता का आभास (आभामंडल) भारतीय राष्ट्रवाद के एकमात्र और सर्वोच्च पुजारी होने के उनके दावे पर टिका हुआ था. वह और सिर्फ वही 'राष्ट्रीय हित' के प्रतीक थे. उनके सभी विरोधियों, आलोचकों या निंदकों को 'राष्ट्रविरोधी' या 'भारत-विरोधी' का टैग लगाकर नीचा दिखाया जा सकता था. जंतर-मंतर के 'कॉकरोच' मोदी की इस रणनीति को जानते थे; उन्होंने इस आरोप का उपहास उड़ाया और इसका मजाक बनाया. मोदी के पारंपरिक विरोधियों के विपरीत, दिल्ली और भारत के अन्य शहरों तथा कस्बों के युवाओं ने रक्षात्मक रुख अपनाने से इनकार कर दिया. चूंकि उनकी मांगें शिक्षा प्रणाली से जुड़ी थीं, इसलिए शासन के पैरोकार — जो आमतौर पर दलीय या 'जातीय' आंदोलनों को बदनाम करने में काफी माहिर हैं — इन 'कॉकरोचों' को किसी एक दायरे में बांधने में असमर्थ रहे. सत्ता-समर्थक एंकरों द्वारा उन्हें अमेरिकी या चीनी एजेंट के रूप में चित्रित करने की कोशिशें पूरी तरह से नाकाम रहीं. न केवल प्रधानमंत्री, बल्कि पूरा संघ परिवार और उसका फर्जी सूचनाओं से जुड़ा सहयोगी उद्योग जल्द ही यह पाएगा कि राष्ट्रीय विमर्श को नियंत्रित और संचालित करने की उनकी क्षमता में भारी गिरावट आई है.

दूसरी बात, भारतीय राजनीतिक इतिहास के पिछले सौ वर्षों का एक सरल सबक यह है कि "करिश्मा" केवल तब तक ही बना रहता है जब तक कि वह "करिश्माई नेता" सफलता और प्रगति देने की क्षमता प्रदर्शित करने में सक्षम रहता है. "कॉकरोच क्रांति" राष्ट्रीय कल्पना में अपनी जगह बनाने में इसलिए सफल हो रही है क्योंकि मोदी शासन एक दोषपूर्ण 'व्यवस्था' को ठीक करने में असमर्थ साबित हुआ है. सत्ता में एक दशक से अधिक समय बिताने के बाद, कोई भी नेता यह नाटक करने का हकदार नहीं है कि उन्हें इस या उस क्षेत्र में 'व्यवस्था' के 'ध्वस्त' होने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, खासकर परीक्षाओं जैसी बुनियादी चीज़ के लिए.

धर्मेंद्र प्रधान प्रकरण ने इस सच्चाई को उजागर कर दिया है कि प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता बेहद कम हो गई है. "दोषियों" को "सजा" देने के उनके दृढ़ संकल्प के नवीनतम दावे की तुलना कुछ साल पहले ठीक यही करने के उनके पिछले — और अधूरे — वादों से की गई. देर-सबेर, इस चालाकी को समझ ही लिया जाता है. इंस्टाग्राम रील के जरिए ईमानदारी और भरोसे का प्रदर्शन करने की उनकी आखिरी वक्त की कोशिश को एक राजनेता की एक मामूली सी चाल से ज्यादा कुछ नहीं माना गया.

भाजपा के दृष्टिकोण से, पूरे जंतर-मंतर विरोध का सबसे दूरगामी प्रभाव ‘मोदी मतदाता वर्ग’ पर पड़ेगा, जिनका नेता और उनके शासन पर भरोसा परखा गया और वह स्पष्ट रूप से कमतर साबित हुआ. दुनिया भर के सभी व्यवस्थित समाजों में सभी सभ्य नागरिक यह विश्वास करना पसंद करते हैं कि वे किसी जंगल में नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित और सभ्य समाज में रहते हैं. आम नागरिक खुद को ऐसे शासक से दूर रखना पसंद करते हैं जो किसी "निर्भया" को प्रताड़ित होने से न रोक सके.

शासन को लगातार नागरिकों की सहमति और आज्ञाकारिता मिलती रही है क्योंकि इसके सबसे कट्टर समर्थकों ने खुद को यह समझा लिया था कि "मोदी साहब" केवल "बुरे" लोगों के पीछे ही जाते हैं. पूर्णता का वह सहज अहसास 20 जुलाई को तब चकनाचूर हो गया, जब पूरे देश ने राजधानी में अभूतपूर्व बर्बरता देखी. बेशक, यह पहली बार नहीं था जब भारतीय राज्य की दमनकारी शक्ति का प्रदर्शन किया गया था; लेकिन इस बार यह कश्मीर में "आतंकवादियों", छत्तीसगढ़ में "नक्सलियों" या उत्तर-पूर्व में "उग्रवादियों" के खिलाफ नहीं था. यह 'नया भारत' के ठीक दिल में था. चाहे यह बर्बरता किसी चतुर गृह मंत्री की साज़िशों का नतीजा थी या पिछले 12 वर्षों में स्वीकृत की गई नई डराने-धमकाने वाली प्रक्रियाओं का एक चरम रूप, युवा लड़के-लड़कियों पर बेकाबू हुए "सुरक्षा बलों" की वे परेशान करने वाली तस्वीरें इतनी जल्दी धुंधली नहीं होंगी और मोदी के पक्ष में खड़े मध्यम वर्ग की अंतरात्मा को कचोटती रहेंगी.

हर नागरिक के लिए विपक्ष के नेता — भले ही वह कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे नीचा दिखाने में भाजपा ने वर्षों बिताए हों — के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा की गई हाथापाई की तस्वीरें कम परेशान करने वाली नहीं थीं. यह बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है. खून से लथपथ राहुल गांधी की तस्वीरें हमारे निष्पक्षता के सामूहिक अहसास को आहत करती रहेंगी.

चूंकि यह ज्ञात नहीं है कि इन "कॉकरोचों" का नेतृत्व कौन कर रहा है, इसलिए कोई नहीं जानता कि जंतर-मंतर के इस आक्रोश और जुनून को किस ओर मोड़ा जाएगा या इसका क्या रूप होगा. भाजपा को उम्मीद है कि यह ऊर्जा शांत हो जाएगी. हालांकि, जो बात तय है वह यह कि पूर्ण नियंत्रण और कमान वाले शासन का मिथक अब और नहीं टिकाया जा सकता. शासन का नैतिक अधिकार खत्म हो चुका है. देश की राजनीति हमेशा के लिए निरंकुश शासकों को सहने के लिए तैयार नहीं है. सबसे बढ़कर, 2029 अब वैसी तय बात नहीं रह गई है जैसा कि कई लोगों ने मान लिया था.

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