सोनिया गांधी | गाज़ा पर भारत मौन, जबकि दुनिया लगातार खिलाफ में आवाज़ उठा रही है

सोनिया गांधी े ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखा है कि गाजा में इजरायल की क्रूरता पर भारत सरकार की निरंतर चुप्पी न तो नैतिक रूप से सही है और न ही भारत के राष्ट्रीय व रणनीतिक हितों के पक्ष में है. भारतीय राष्ट्रवाद और वैश्विक जनमत की मांग है कि भारत को इस नरसंहार के खिलाफ अपनी आवाज उठानी चाहिए.

वह लिखती हैं कि सितंबर 2025 में, 'ऑक्यूपाइड पैलेस्टिनियन टेरिटरी' (मशगूल फिलिस्तीनी क्षेत्र) पर गठित संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि इजरायली अधिकारी गाजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ नरसंहार कर रहे हैं. जून 2026 में, इसी आयोग ने—जिसके प्रमुख अब भारत के एक प्रतिष्ठित न्यायविद्, सेवानिवृत्त न्यायाधीश (जस्टिस) एस. मुरलीधर हैं—मार्मिक रूप से इस बात को दोहराया है कि इजरायली कार्रवाइयों का उद्देश्य गाजा में बच्चों को निशाना बनाकर फिलिस्तीनियों के अस्तित्व को ही समाप्त करना है.

94 पन्नों की यह रिपोर्ट दिल दहला देने वाली है, जिसमें गाजा में इजरायल द्वारा मचाई गई तबाही की भयावहता और उसकी कार्रवाइयों के पीछे छिपे नरसंहार के इरादे के गंभीर विवरण दिए गए हैं. कम से कम 20,000 बच्चे मारे जा चुके हैं, और अन्य 44,000 घायल हुए हैं, जिनमें से कई जीवन भर के लिए अपंग हो गए हैं. बच्चों को निशाना बनाना आकस्मिक (संयोगवश) नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है.  मारे गए या घायल हुए लोगों में 27 प्रतिशत बच्चे हैं और कई लड़कों के सिर और गर्दन में गोलियां लगी पाई गईं. गाजा के 97 प्रतिशत स्कूल नष्ट हो चुके हैं. बाल चिकित्सा अस्पतालों सहित स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा तबाह कर दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप गर्भपात और प्रसव संबंधी जटिलताओं में 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

हमास द्वारा इजरायल पर किए गए कायरतापूर्ण, भयानक और पूरी तरह से अस्वीकार्य हमले के बाद से बीते ढाई वर्षों में, यह स्पष्ट हो गया है कि इजरायली सशस्त्र बलों और राजनीतिक नेतृत्व की जवाबी कार्रवाई घोर क्रूरता और बर्बरता से प्रेरित रही है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों सहित वरिष्ठ इजरायली नेताओं ने गाजा की "पूर्ण नाकेबंदी" और "पूर्ण विनाश" का आह्वान किया है, फिलिस्तीनियों को "जानवर" करार दिया है जिनका "अस्तित्व का कोई अधिकार नहीं है", और इजरायल के लिए सफलता को इस रूप में परिभाषित किया है कि "सैकड़ों-हजारों लोग गाजा छोड़कर भाग जाएं".

नरसंहार के इस स्पष्ट इरादे के बावजूद, वाशिंगटन डीसी में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार के समर्थन ने इजरायली सरकार को फिलिस्तीनियों के खिलाफ अपना क्रूर अभियान जारी रखने में सक्षम बनाया है. लेकिन शेष दुनिया ने अपने विवेक के कचोटने को महसूस किया है.

अमेरिकी बाधा के कारण संयुक्त राष्ट्र किसी दृढ़ संकल्प के साथ कार्रवाई करने में असमर्थ रहा है, लेकिन अपनी एजेंसियों के माध्यम से उसने इजरायली युद्ध अपराधों के दस्तावेजीकरण में एक उत्कृष्ट भूमिका निभाई है. ऐतिहासिक रूप से पश्चिमी ब्लॉक से जुड़ी प्रमुख शक्तियों—जिनमें फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं—ने फिलिस्तीनी मुद्दे के प्रति दशकों की उदासीनता के बाद अब फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दे दी है. दक्षिण अफ्रीका, जिसके साथ भारत का उपनिवेशवाद-विरोधी एकजुटता का एक लंबा इतिहास रहा है, 1948 के नरसंहार कनवेंशन के उल्लंघन के लिए इजरायल को अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में खींच लाया है. कई यूरोपीय देशों ने इजरायल को हथियारों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है, और कई लाटिन अमेरिकी देशों ने इजरायल के साथ अपने संबंधों को कम या खत्म कर दिया है. अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) ने तो इजरायली राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट तक जारी कर दिए हैं. बहुत बड़ी संख्या में ऐसे देश, जिनके साथ भारत के करीबी संबंध हैं, गाजा में इजरायल की कार्रवाइयों को नरसंहार के रूप में स्वीकार कर चुके हैं.

इज़रायल के खिलाफ बढ़ते जन आक्रोश और गाजा पर बरपाई गई गैर-वाजिब क्रूरता का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा संज्ञान लिए जाने के बीच, भारत अकेला मौन रहने वाला देश बना हुआ है. जस्टिस मुरलीधर की रिपोर्ट, जिसने गाजा नरसंहार के खिलाफ बातचीत और सक्रियता को फिर से तेज कर दिया है, का नरेंद्र मोदी सरकार ने पथरीली खामोशी से स्वागत किया है. यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है—याद करें कि 2020 के दिल्ली दंगों से पहले भाजपा नेताओं के भड़काऊ बयानों पर दिल्ली पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठाने के बाद जस्टिस मुरलीधर का दिल्ली उच्च न्यायालय से तबादला कर दिया गया था.

उत्तर-औपनिवेशिक एकजुटता, राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय शांति के प्रति हमारी प्रतिबद्धता के लिए भारत ऐतिहासिक रूप से दुनिया के देशों के बीच असाधारण था. आज हम वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था के खुले उल्लंघन, ग्लोबल साउथ में अपने साथी लोगों की पीड़ा, और गाजा तथा वेस्ट बैंक में खुले तौर पर प्रदर्शित हो रहे मानवीय गरिमा के पतन के प्रति अपनी निरंतर उदासीनता में असाधारण (अकेले) बने हुए हैं.

हिन्द रजब की दुखद कहानी गाजा में इज़रायली नरसंहार की अकथनीय क्रूरता का प्रतीक है—महज पांच साल की एक बच्ची, जो अपने परिवार के साथ गाजा शहर से भाग रही थी, जब इज़रायली बलों ने उनकी कार पर 335 गोलियां चलाईं, जिससे उसके परिवार के छह सदस्यों की मौत हो गई और वह अपने रिश्तेदारों के शवों के साथ कार में फंसी रह गई, जबकि चिकित्सा कर्मियों ने उसे बचाने का प्रयास किया. आखिरकार दो चिकित्सा कर्मियों के साथ उसकी भी हत्या कर दी गई. भारत के नागरिकों को, दुनिया के नागरिकों के रूप में, हिन्द रजब और अनगिनत अन्य फिलिस्तीनी बच्चों की कहानी जानने का अधिकार है. फिर भी, इज़रायल की संवेदनशीलता का सम्मान करने के लिए, भारत में इस फिल्म को महीनों तक रोके रखा गया और अब भारी जन दबाव के बाद ही इसे मंजूरी दी गई है.

मोदी सरकार की चुप्पी और निष्क्रियता न केवल नैतिक रूप से निंदनीय है, बल्कि राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से भी समझ से परे है.हम ऐसे समय में इज़रायल के रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र में और आगे खिसक रहे हैं, जब दुनिया तेजी से उससे दूरी बना रही है. इन परिस्थितियों में, और ईरान पर इज़रायल के युद्ध तथा उसके शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की हत्या से कुछ ही दिन पहले प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा, इतिहास में एक हैरान करने वाले रणनीतिक फैसले के रूप में दर्ज की जाएगी. हमने फिलिस्तीन, ईरान और व्यापक मध्य पूर्व में अपने ऐतिहासिक सहयोगियों से खुद को अलग कर लिया है. हमने खुद को वैश्विक जनमत से दूर कर लिया है. और हमने पाकिस्तान जैसे देश को—जो खुद भयानक आतंकवादियों को पनाह देता रहा है—एक मध्यस्थ का स्थान हथियाने का मौका दे दिया है—एक ऐसी भूमिका जिस पर सभी पक्षों के साथ हमारे ऐतिहासिक मैत्रीपूर्ण संबंधों को देखते हुए हमारा स्वाभाविक दावा होता. हमारे रणनीतिक हित और नैतिकता के बलिदान ने हमें प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बीच दोस्ती के अलावा कुछ नहीं दिया, जो अब अमेरिका सहित पूरी दुनिया में आलोचनाओं के घेरे में हैं.

भारतीय राष्ट्रवाद की भावना यह मांग करती है कि हम अपने फिलिस्तीनी भाइयों और बहनों के लिए आवाज उठाएं जिनके बच्चों को इतनी बेरहमी से निशाना बनाया गया है. राष्ट्रीय हित का गणित मांग करता है कि हम इज़रायली शासन की गाजा में नरसंहार की कार्रवाइयों और कब्जे वाले वेस्ट बैंक में लाखों फिलिस्तीनी परिवारों के क्रूर विस्थापन और बेदखली के खिलाफ वैश्विक जनमत को जवाब दें. मोदी सरकार की निरंतर चुप्पी को तार्किक या नैतिक रूप से कतई नहीं समझाया जा सकता.

(लेखिका कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष हैं)

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