मध्य प्रदेश | वनाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों के बीच आदिवासियों के घरों पर चला बुलडोजर
‘डाउन टू अर्थ’ में सत्याम श्रीवास्तव की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के कोसमी गांव में वन विभाग की कार्रवाई के दौरान 12 आदिवासी परिवारों की झोपड़ियां तोड़ दी गईं और उनकी खड़ी फसलें नष्ट कर दी गईं. यह कार्रवाई वन भूमि पर कथित अतिक्रमण के आरोप में की गई, लेकिन प्रभावित परिवारों के वनाधिकार संबंधी दावों पर फैसला लंबित होने के कारण विभाग की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं.
11 अक्टूबर की रात मध्य प्रदेश राज्य वन विकास निगम की टीम चार खुदाई मशीनों और चार ट्रैक्टरों के साथ गांव पहुंची. टीम ने बरेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों की अस्थायी झोपड़ियां ढहा दीं. ग्रामीणों के मुताबिक, मक्का और अरहर की फसल नष्ट करने के साथ सिंचाई के कुएं को मिट्टी और पत्थरों से भर दिया गया. परिवारों को बेदखली की धमकी दिए जाने का आरोप भी लगाया गया है.
प्रभावित ग्रामीण इकराम बरेला के पास जमीन के स्वामित्व का दस्तावेज नहीं है, लेकिन उनके पास वनाधिकार कानून, 2006 के तहत दावा दर्ज होने की सरकारी रसीद है. उनका व्यक्तिगत वनाधिकार दावा 11 दिसंबर 2025 को दर्ज हुआ था. 18 जुलाई 2026 को भूमि सत्यापन दर्ज किया गया और 7 अगस्त को उप-मंडलीय समिति ने इसे जिला वनाधिकार समिति को भेज दिया. 15 अक्टूबर तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ था. ऐसे में सवाल है कि बेदखली से पहले अधिकारियों ने लंबित दावों की स्थिति की जांच की थी या नहीं.
वन भूमि और गांव की सीमाओं का विवाद
कोसमी गांव में 145 परिवार और 998 अनुसूचित जनजाति के निवासी हैं. गांव का कुल क्षेत्रफल 2,230 हेक्टेयर है, जिसमें 1,621 हेक्टेयर वन और 509 हेक्टेयर कृषि भूमि है. गांव की राजस्व सीमा और वन विभाग के प्रबंधन वाले क्षेत्र एक-दूसरे से मिलते हैं. ऐसे इलाकों में कई समुदाय पीढ़ियों से रहते और खेती करते आए हैं. वनाधिकार कानून का उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वन भूमि पर निर्भर समुदायों के अधिकारों को मान्यता देना भी है.
जांच रिपोर्ट पर सवाल
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कार्रवाई का विरोध किया और प्रभावित परिवारों के समर्थन में धरना दिया. इसके बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश पर जिला कलेक्टर ने जांच कर रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी. रिपोर्ट में इकराम बरेला समेत नौ लोगों पर 31.48 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा करने और निगम द्वारा लगाए गए सागौन के 78,700 पौधे नष्ट करने का आरोप लगाया गया. गूगल अर्थ की तस्वीरों के आधार पर रिपोर्ट में कब्जे की शुरुआत 2022 से बताई गई.
हालांकि, इकराम बरेला के लंबित दावे और ग्रामीणों के पास मौजूद पुराने दस्तावेज इस दावे की जांच की जरूरत को रेखांकित करते हैं. वनाधिकार कानून की धारा 4(5) के तहत पात्र वनवासियों को उनके अधिकारों की मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने से पहले बेदखल नहीं किया जा सकता. दावा दर्ज होने मात्र से जमीन का स्वामित्व साबित नहीं होता, लेकिन लंबित दावों की अनदेखी कर बेदखली करना सवाल खड़े करता है. व्यक्तिगत वनाधिकार के लिए 13 दिसंबर 2005 से पहले का कब्जा महत्वपूर्ण है. ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास वन विभाग की पुरानी कार्रवाइयों से जुड़े दस्तावेज हैं, हालांकि कुछ रिकॉर्ड फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं.
वन विकास निगम की भूमिका और आगे का रास्ता
जांच रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में कोसमी की 186.96 हेक्टेयर वन भूमि क्षेत्रीय वन प्रभाग से मध्य प्रदेश राज्य वन विकास निगम को हस्तांतरित की गई थी. निगम का दावा है कि उसने हस्तांतरित भूमि के 135 हेक्टेयर क्षेत्र में 3,37,500 सागौन के पौधे लगाए. हालांकि, वन भूमि का प्रबंधन किसी सरकारी निगम को सौंपना और उस पर पहले से रह रहे पात्र समुदायों के अधिकारों को मान्यता देना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं. भूमि हस्तांतरण से वनाधिकार कानून के तहत पात्र लोगों के अधिकार स्वतः समाप्त नहीं होते.
ग्रामीणों का दावा है कि निगम को सौंपा गया वन खंड संख्या 426 गांव की पारंपरिक सीमाओं में आता है. इससे ग्रामसभा के सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता का सवाल भी उठता है. चौहान और यादव की बैठक के बाद भोपाल तक प्रस्तावित पैदल मार्च स्थगित कर दिया गया, लेकिन वनाधिकारों का विवाद अब भी अनसुलझा है.
रिपोर्ट के अनुसार, विवाद स्पष्ट करने के लिए राज्य सरकार और वन विभाग को पुराने उपग्रह चित्र, वन कार्ययोजनाएं, 2005 से पहले के अतिक्रमण रजिस्टर और संबंधित सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए. इन रिकॉर्ड की प्रतियां ग्रामसभाओं और पंचायतों को भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि प्रभावित समुदाय अपने दावों के समर्थन में साक्ष्य जुटा सकें. रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ की तरह मध्य प्रदेश में भी पुराने वन रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है.

