महाराष्ट्र | सूखाग्रस्त बीड में मोदी सरकार की ग्रामीण रोजगार योजना पर सवाल, कागजों पर मजदूरों की हाजिरी और मौके से गायब

‘स्क्रॉल’ में तबस्सुम बरनागरवाला की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त बीड जिले में ग्रामीण रोजगार योजना के तहत बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं. जांच में ऐसे कार्यस्थल मिले, जहां मजदूरों की डिजिटल हाजिरी दर्ज थी, लेकिन मौके पर कोई काम नहीं हो रहा था. कई मजदूरों ने बताया कि उन्हें अपने नाम पर जारी कार्यादेशों की जानकारी तक नहीं थी और कुछ के खातों में जमा रकम स्थानीय नेताओं द्वारा निकाल लिए जाने का आरोप है.

इस साल महाराष्ट्र के 358 में से 304 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है. राज्य में मानसूनी बारिश 18 प्रतिशत कम हुई, जबकि बीड में यह कमी 37 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो एक दशक में सबसे अधिक है. बारिश की कमी से फसलें प्रभावित हुईं और ग्रामीणों के सामने पानी तथा रोजगार का संकट गहरा गया.

चुंबली गांव के किसान सतीश शिरसाठ की एक एकड़ में लगी सोयाबीन की फसल खराब हो गई. उपज बेचकर उन्हें केवल 10,000 रुपये मिले, जबकि खेती में 20,000 रुपये खर्च हुए थे. अगस्त में उन्हें विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण), यानी वीबी-जी राम जी योजना के तहत छह दिन नहर खोदने का काम मिला और 3,000 रुपये की मजदूरी मिली. इसके बाद काम नहीं मिला. अक्टूबर के मध्य में वह पत्नी के साथ 350 किलोमीटर दूर सांगली चले गए, जहां दोनों गन्ना काटकर रोजाना 800 रुपये कमाने की उम्मीद कर रहे हैं.

कागजों पर हजारों मजदूर, लेकिन कार्यस्थल खाली

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 4 अक्टूबर को महाराष्ट्र में योजना के तहत 76,822 मजदूर कार्यस्थलों पर उपस्थित दर्ज किए गए. इनमें 40,267 मजदूर अकेले बीड जिले के थे. इस संख्या की जांच के लिए ‘स्क्रॉल’ ने पांच कार्यस्थलों का दौरा किया, जहां 47 मजदूरों के लिए काम स्वीकृत था. किसी भी स्थल पर मजदूर मौजूद नहीं मिले, जबकि पोर्टल पर उनके नाम और तस्वीरों के जरिए हाजिरी दर्ज थी.

जांच में 14 मजदूर अपने घरों पर मिले, 30 दूसरे स्थानों पर काम कर रहे थे या खेतों में थे, जबकि तीन का पता नहीं चला. कम से कम 16 मजदूरों या उनके परिजनों ने कहा कि उन्हें योजना की मस्टर रोल सूची में अपना नाम दर्ज होने की जानकारी नहीं थी. 4 अक्टूबर को बीड में दर्ज 40,267 मजदूरों की मजदूरी करीब 1.2 करोड़ रुपये बनती थी.

योजना के तहत मोबाइल मॉनिटरिंग ऐप से मजदूरों की समय और स्थान आधारित तस्वीर लेकर दिन में दो बार हाजिरी दर्ज की जानी है. लेकिन ‘स्क्रॉल’ ने जिन 47 मामलों की जांच की, उनमें ई-केवाईसी के दौरान ली गई पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल हाजिरी दर्ज करने के लिए किया गया था. एक व्हिसलब्लोअर ने जिला प्रशासन को शिकायत दी थी कि फर्जी जीपीएस ऐप और पहले से मौजूद तस्वीरों के जरिए बड़े पैमाने पर हाजिरी में हेराफेरी हो रही है.

अधूरी सड़कें और मजदूरों के नाम पर भुगतान

अहेरवाडगांव में सड़क निर्माण के एक कार्यादेश पर 10 मजदूरों की हाजिरी दर्ज थी, लेकिन मौके पर न मजदूर मिले और न निर्माण कार्य. स्थानीय लोगों के अनुसार, शिकायतों के बाद काम एक महीने पहले रोक दिया गया था. सूची में उपसरपंच अभिमान रंजवण और उनके परिवार के सदस्यों के नाम भी थे. परिवार के सदस्यों ने कहा कि उन्हें इस काम की जानकारी नहीं थी.

काकेडहीरा, कामखेड़ा और खापरपांगरी पंचायतों में भी ऐसे मामले सामने आए. कई लोगों ने कहा कि वे महीनों से योजना के तहत काम नहीं कर रहे थे, फिर भी उनकी हाजिरी दर्ज थी. कुछ लोगों ने भुगतान नहीं मिलने की बात कही. खापरपांगरी के विकास पालटे ने आरोप लगाया कि उनके खाते में हर महीने कुछ रकम जमा होती है, जिसे स्थानीय नेता निकाल लेते हैं.

बीड जिला परिषद के वरिष्ठ अधिकारी जितिन रहमान ने ‘स्क्रॉल’ को बताया कि प्रशासन ने अनियमितताओं को लेकर एक महीने पहले प्राथमिकी दर्ज कराई थी. उन्होंने कहा कि पिछले चार महीनों में गड़बड़ियां मिलने के बाद 23,000 प्रविष्टियां खारिज की गईं. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जवाब में डुप्लिकेट प्रविष्टियों की पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता, निरीक्षण और सामाजिक अंकेक्षण जैसे उपायों का उल्लेख किया, लेकिन बीड में मोबाइल मॉनिटरिंग ऐप की खामियों पर सीधे जवाब नहीं दिया.

सूखे के बीच पलायन का बढ़ता संकट

बीड से हर साल इस समय करीब 1.25 लाख लोग रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं. इस बार फसल खराब होने, पानी की कमी और रोजगार योजना में कथित अनियमितताओं के कारण पलायन की अवधि चार-पांच महीने से बढ़कर सात महीने से अधिक हो सकती है.

मोरफली गांव के किसान रमेश नारुते की सालाना कमाई सात लाख रुपये से घटकर करीब एक लाख रुपये रह गई. उन पर 4.5 लाख रुपये का कर्ज है और अब उन्हें भी काम की तलाश में सांगली जाना पड़ रहा है.

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि ग्रामीण रोजगार योजना के डिजिटल निगरानी तंत्र के बावजूद बीड में फर्जी हाजिरी, संदिग्ध कार्यादेश और मजदूरी में अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं. सूखे से जूझ रहे ग्रामीणों के लिए योजना की प्रभावशीलता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.

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