पिनाराई के 'किले' का ढहना: केरल में वामपंथी शासन के अंत की कहानी
‘द मूकनायक’ में गीता सुनील पिल्लई की रिपोर्ट है कि 4 मई 2026 का दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक युग के अंत के रूप में दर्ज हो गया है. केरल, जिसे पिछले पांच दशकों से वामपंथी राजनीति का सबसे मजबूत और आखिरी गढ़ माना जाता था, वहां लाल झंडे की सत्ता का सूरज डूब गया है. यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने करीब 100 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया, जबकि पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) अपनी ताकत का आधा हिस्सा भी नहीं बचा सका.
इस परिणाम के साथ ही भारत में 'कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री' का दौर समाप्त हो गया है. पश्चिम बंगाल (2011) और त्रिपुरा (2018) के बाद केरल ही एकमात्र राज्य था जहाँ वामपंथियों की सरकार थी. 1978 के बाद यह पहली बार है जब भारत के किसी भी राज्य में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा.
आक्रोश की लहर: 'भूल गए पीड़ितों' का फैसला
विजयन सरकार की इस ऐतिहासिक हार के पीछे केवल विपक्षी रणनीति नहीं थी, बल्कि वे 'आंसू' थे जो पिछले दस वर्षों के शासन के दौरान जनता की आंखों से बहे थे.
एडीएम नवीन बाबू की मृत्यु: कन्नूर के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट नवीन बाबू की आत्महत्या ने पूरे राज्य को झकझोर दिया. माकपा नेता पीपी दिव्या द्वारा सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने के बाद उनकी मृत्यु ने यह संदेश दिया कि सत्ता के नशे में चूर नेता स्वतंत्र नौकरशाहों को डरा-धमका रहे हैं. उनकी विधवा, मंजुषा की न्याय की पुकार चुनावी अभियान का एक भावनात्मक केंद्र बन गई.
सिद्धार्थ की त्रासदी: वायनाड के वेटरनरी कॉलेज के छात्र जेएस सिद्धार्थ की हॉस्टल में हुई बर्बर पिटाई और मौत ने कैंपस हिंसा के काले चेहरे को उजागर किया. आरोप लगा कि माकपा के छात्र संगठन ने कॉलेज को 'टॉर्चर रूम' में बदल दिया था. पिता टी. जयप्रकाश के संघर्ष ने युवा मतदाताओं के बीच सरकार के प्रति भारी रोष पैदा किया.
दमनकारी राजनीति: 2022 में मुख्यमंत्री के सामने काला झंडा दिखाने वाले युवाओं पर 'हत्या के प्रयास' (आईपीसी 307) का मामला दर्ज करना सरकार के अहंकार का प्रतीक बन गया. जब केंद्र सरकार ने इसे नागरिक उड्डयन अपराध मानने से आठ बार इनकार किया, तो राज्य सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठे.
भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोप
पिनाराई विजयन के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी 'कैप्टन' वाली छवि को बुरी तरह प्रभावित किया. मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव एम. शिवशंकर की स्वर्ण तस्करी मामले में गिरफ्तारी और उनकी बेटी वीणा विजयन की कंपनी 'एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस' पर लगे वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों ने विपक्ष को "परिवारवाद और भ्रष्टाचार" का बड़ा हथियार दे दिया. हालाँकि ये आरोप कानूनी रूप से साबित नहीं हुए, लेकिन जनता की अदालत में इन्होंने गहरा प्रभाव डाला.
अपनों का ही विद्रोह: जब 'कॉमरेड' खिलाफ हो गए
इस चुनाव की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि माकपा ने अपने उन क्षेत्रों में भी हार का स्वाद चखा जिन्हें 'पार्टी विलेज' कहा जाता था. पय्यानूर और थालीप्परम्बु जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी से निष्कासित नेताओं ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और भारी बहुमत से जीत हासिल की. यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि पार्टी का जमीनी कार्यकर्ता अब नेतृत्व की कार्यशैली और भ्रष्टाचार से ऊब चुका था. राजनीतिक विश्लेषक एमजी राधाकृष्णन ने सही कहा था कि "विजयन की ताकत ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई." सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण ने पार्टी के भीतर लोकतंत्र को खत्म कर दिया था.
वायनाड: प्राकृतिक आपदा और प्रशासनिक विफलता
जुलाई 2024 में वायनाड के मुंडक्कई और चूरलमाला में आए भीषण भूस्खलन के बाद पुनर्वास कार्यों में हुई देरी ने आग में घी का काम किया. पीड़ितों को मिलने वाले फंड में देरी और चंदे के दुरुपयोग के आरोपों ने सरकार की संवेदनशीलता पर सवालिया निशान लगा दिया. आपदा से बचे लोग जब कर्ज के नोटिसों और अस्थाई घरों की बदहाली से जूझ रहे थे, तब उनकी नाराजगी मतपेटियों में तब्दील हो गई.
एक युग का अंत
80 वर्षीय पिनाराई विजयन, जिन्होंने लगभग 25 वर्षों तक पार्टी और सरकार पर अपनी पकड़ बनाए रखी, अब अपने ही निर्वाचन क्षेत्र धर्मदम में कड़े मुकाबले में पिछड़ते नजर आए. यह हार केवल एक पार्टी की हार नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति की हार है जिसने असहमति को दबाने और सत्ता को एक ही हाथ में केंद्रित करने की कोशिश की थी.
केरल का यह जनादेश लोकतंत्र की उस शक्ति का प्रमाण है जहां साक्षरता और राजनीतिक चेतना रखने वाली जनता ने स्पष्ट कर दिया कि सत्ता का अहंकार कभी भी जनभावनाओं से बड़ा नहीं हो सकता. 4 मई 2026 को केरल ने एक नई इबारत लिखी है, जो आने वाले समय में भारतीय वामपंथ के लिए आत्ममंथन का विषय रहेगी.

