सुहास पालशिकर | मोदी की लोकप्रियता से आगे: भारत के नए शासन की संरचना क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में "न्यू इंडिया" का नारा दिया था. 2019 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद इस परियोजना ने और गति पकड़ी. आज भारतीय राजनीति को देखने वाला कोई भी गंभीर पर्यवेक्षक महसूस कर सकता है कि देश एक बड़े संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. स्वतंत्रता के बाद स्थापित संवैधानिक गणराज्य की मूल अवधारणा को चुनौती देते हुए एक नई राजनीतिक व्यवस्था आकार ले रही है.

इस व्यवस्था को केवल नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता या व्यक्तित्व के सहारे नहीं समझा जा सकता. उसका चेहरा मोदी हैं, लेकिन उसकी वास्तविक संरचना तीन परस्पर जुड़े तत्वों से मिलकर बनी है. हिंदुत्व उसका मस्तिष्क है, नागरिक समाज उसकी भुजाएं हैं और राज्य उसकी वे टांगें हैं जो कठोर प्रहार करती हैं. इन तीनों ने मिलकर पिछले एक दशक में एक ऐसी सामूहिक मानसिक स्थिति पैदा की है जिसमें बड़ी संख्या में लोग सत्ता के दावों पर विश्वास करते रहे हैं, चाहे वास्तविकता कुछ भी रही हो.

व्यक्तिपूजा से आगे

मौजूदा दौर की राजनीति में सबसे अधिक चर्चा मोदी की होती है. 2014 में उन्हें ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया जो देश को बचा सकता है, व्यवस्था बदल सकता है और भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है. लोकतंत्रों में समय-समय पर ऐसे "मजबूत नेताओं" का उदय होता रहा है और भारत भी इसका अपवाद नहीं है.

मोदी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी वह छवि है जो असंभव को संभव बना सकती है. "मोदी हैं तो मुमकिन है" जैसे नारे इसी धारणा को मजबूत करते हैं. लेकिन यह लोकप्रियता केवल व्यक्तिगत करिश्मे का परिणाम नहीं है. इसके पीछे सावधानी से गढ़ी गई सार्वजनिक छवि, व्यापक प्रचार और सत्ता संसाधनों का इस्तेमाल भी शामिल है.

फिर भी केवल मोदी के व्यक्तित्व पर ध्यान केंद्रित करना एक भूल होगी. मौजूदा व्यवस्था की ताकत किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि उस वैचारिक और संस्थागत ढांचे में निहित है जिसने मोदी को संभव बनाया.

हिंदुत्व: सबसे व्यापक तत्व

मोदी की राजनीति को हिंदुत्व की पृष्ठभूमि के बिना नहीं समझा जा सकता. हिंदुत्व वह सूत्र है जो मोदी, भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राज्य तथा समाज में हो रहे व्यापक परिवर्तनों को जोड़ता है.

हिंदुत्व धर्म, संस्कृति और राष्ट्रवाद को एक साथ मिलाकर एक ऐसी राजनीतिक पहचान गढ़ता है जिसे चुनौती देना कठिन हो जाता है. इसका एक पक्ष धार्मिक प्रतीकों और सार्वजनिक आस्था का प्रदर्शन है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ी राजनीतिक परियोजना भी है. धार्मिक भावना को राजनीतिक आग्रह में बदलना, हिंदू धार्मिकता को राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत करना और विविध परंपराओं को एक समान राष्ट्रीय पहचान में ढालना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है.

इस राजनीति का सबसे केंद्रीय तत्व बहुसंख्यकवाद है. हिंदू समाज के एक हिस्से को यह विश्वास दिलाया जाता है कि वह ऐतिहासिक रूप से पीड़ित रहा है और उसकी राजनीतिक एकजुटता आवश्यक है. इसी कारण मुसलमानों से जुड़ा प्रश्न लगातार राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बना रहता है. इस तत्व को अलग कर दिया जाए तो हिंदुत्व की राजनीति का बड़ा हिस्सा अपना आकर्षण खो देता है.

हिंदुत्व मोदी की देन नहीं है. बल्कि मोदी का उदय उस लंबे राजनीतिक आंदोलन का परिणाम है जिसने 1980 के दशक के उत्तरार्ध से लगातार ताकत हासिल की. अंतर केवल इतना है कि आज हिंदुत्व पहली बार राज्य और नागरिक समाज दोनों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने की स्थिति में पहुंच गया है.

नागरिक समाज पर कब्जा

यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि हिंदुत्व का प्रभावी प्रतिरोध क्यों नहीं दिखाई देता. इसका एक बड़ा कारण नागरिक समाज का बदलता स्वरूप है.

2014 के बाद मीडिया, संस्कृति, मनोरंजन और सार्वजनिक जीवन के अनेक प्रभावशाली हिस्सों ने सत्ता के साथ खुद को जोड़ लिया. मीडिया के बड़े हिस्से ने आलोचनात्मक भूमिका निभाने के बजाय शासन के पक्ष में माहौल बनाने का काम किया. सवालों को कमजोर किया गया, आलोचनाओं को हाशिए पर धकेला गया और एक व्यापक सामूहिक विश्वास का निर्माण किया गया.

कॉरपोरेट जगत ने भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आर्थिक रूप से प्रभावशाली वर्गों ने सत्ता से टकराव के बजाय उसके साथ तालमेल को प्राथमिकता दी. परिणामस्वरूप स्वतंत्र नागरिक संस्थाओं और वैकल्पिक आवाजों को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया.

साथ ही नागरिक समाज को नए सिरे से गढ़ने का एक बड़ा प्रयास भी चल रहा है. थिंक टैंक, शैक्षणिक संस्थान, साहित्यिक मंच, सांस्कृतिक संगठन और कला जगत के विभिन्न हिस्सों में हिंदुत्व समर्थक संस्थाओं की उपस्थिति लगातार बढ़ी है. इससे स्वतंत्र और आलोचनात्मक सार्वजनिक स्थान सिकुड़ते गए हैं.

बहुआयामी राज्य शक्ति

मौजूदा व्यवस्था का तीसरा स्तंभ राज्य शक्ति है. चुनावी सफलताओं का इस्तेमाल करते हुए पिछले एक दशक में राज्य संस्थाओं को अधिक आक्रामक और केंद्रीकृत स्वरूप दिया गया है.

व्यक्तिपूजा और हिंदुत्व दोनों ही राज्य की कठोर भूमिका को वैधता प्रदान करते हैं. विरोध और असहमति को अक्सर राष्ट्र-विरोध या व्यवस्था-विरोध के रूप में पेश किया जाता है. परिणामस्वरूप दमनकारी उपायों को भी सार्वजनिक समर्थन मिल जाता है.

यह प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई. भारतीय राज्य पहले से ही शक्तिशाली था और आतंकवाद से निपटने तथा कल्याणकारी हस्तक्षेपों के नाम पर उसकी क्षमताओं का विस्तार होता रहा था. मौजूदा शासन ने इन्हीं संरचनाओं को वैचारिक वैधता प्रदान करते हुए और अधिक मजबूत किया.

तकनीक, निगरानी तंत्र और कानूनी साधनों के विस्तार ने राज्य की शक्ति को और बढ़ाया है. इसके साथ ही समाज में भी ऐसी प्रवृत्तियां उभरी हैं जिनमें निजी समूह और भीड़ स्वयं नियंत्रण और दंड की भूमिका निभाने लगते हैं. इस प्रकार राज्य और समाज के बीच की सीमाएं धुंधली होती चली जाती हैं.

चुनौती का सामना

मौजूदा भारतीय व्यवस्था को केवल "प्रतिस्पर्धी अधिनायकवाद" जैसे शब्दों में समेटना पर्याप्त नहीं है. राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तब सार्थक होती है जब सभी पक्षों को संसाधनों, मीडिया और सार्वजनिक मंचों तक अपेक्षाकृत समान पहुंच प्राप्त हो. लेकिन आज यह संतुलन लगातार कमजोर पड़ता दिखाई देता है.

साथ ही राष्ट्रीय पहचान की ऐसी परिभाषा गढ़ी जा रही है जिसमें नागरिकता का आदर्श एक विशेष सांस्कृतिक ढांचे से जुड़ जाता है. इससे लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा केवल चुनावी प्रश्न नहीं रह जाती, बल्कि समाज और संस्कृति के स्तर पर भी प्रभावित होती है.

इस स्थिति का मुकाबला तीन स्तरों पर करना होगा. पहला, बहुसंख्यकवादी राजनीति के मुकाबले एक समावेशी राष्ट्रीय कल्पना विकसित करनी होगी जो नागरिकों की निष्ठा पर संदेह करने के बजाय विश्वास को मजबूत करे. दूसरा, नागरिक समाज में स्वतंत्र और आलोचनात्मक सार्वजनिक स्थानों को बचाना होगा ताकि सत्ता से अलग विचार भी प्रभावी रूप से सामने आ सकें. तीसरा, संवैधानिक नैतिकता को फिर से राजनीतिक जीवन के केंद्र में स्थापित करना होगा.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चुनौती केवल पुरानी व्यवस्था को वापस लाने की नहीं है. लोकतांत्रिक राजनीति को एक नई कल्पना, नई भाषा और नए सामाजिक गठबंधनों की आवश्यकता है. यही तय करेगा कि भारत में लोकतांत्रिक संघर्ष आगे बढ़ेगा या मौजूदा व्यवस्था अपनी पकड़ और मजबूत करती जाएगी.

सुहास पालशिकर 2013 में शुरू हुई लोकनीति की पत्रिका ' स्टडीज इन इंडियन पॉलिटिक्स ' (सेज) के मुख्य संपादक हैं.

Previous
Previous

क्रिस्टोफ़ जाफ़रलो | भारत में परजीवी कौन हैं?

Next
Next

मणिपुर : तीन साल हो गए, पर जातीय हिंसा नहीं रुक रही, बंदूकधारियों के हमले में 3 कुकी ग्रामीणों की मौत, घर जलाए