आतंकी हमलों से सहमे कश्मीर के प्रवासी मजदूर, लेकिन घर लौटना भी आसान नहीं
‘आर्टिकल-14’ में प्रकाशित औकिब जावेद की रिपोर्ट कश्मीर में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की उस मुश्किल स्थिति को सामने लाती है, जहां एक तरफ लगातार आतंकी हमलों का डर है और दूसरी तरफ अपने परिवारों का पेट पालने के लिए मिलने वाली बेहतर कमाई उन्हें घाटी छोड़ने से रोकती है. 31 जुलाई 2026 को दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में दो प्रवासी मजदूरों की हत्या के बाद यह डर और गहरा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 से 2026 के बीच कश्मीर में कम से कम 25 गैर-स्थानीय मजदूर आतंकी हमलों में मारे जा चुके हैं.
कुलगाम के किलगाम गांव में ईंट भट्ठे पर काम करने वाले छत्तीसगढ़ के 24 वर्षीय दीपक रात्रे और 25 वर्षीय भूपिंदर भैना को आतंकियों ने बेहद करीब से गोली मार दी. दीपक की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि गंभीर रूप से घायल भूपिंदर ने श्रीनगर के एसकेआईएमएस अस्पताल में दो दिन बाद दम तोड़ दिया. घटना के बाद सुरक्षा बलों ने इलाके में तलाशी अभियान शुरू किया.
हमले के करीब 20 दिन बाद भी वहां काम कर रहे मजदूरों के बीच डर साफ दिखाई दे रहा था. जिस ईंट भट्ठे पर दोनों की हत्या हुई, वहां सुरक्षा के लिए कंसर्टिना तार लगाए गए थे, लेकिन मजदूरों ने काम बंद नहीं किया. रिपोर्ट के अनुसार, उस समय इलाके के अलग-अलग ईंट भट्ठों पर 500 से अधिक मजदूर काम कर रहे थे और हमले के बाद कुछ मजदूर घाटी छोड़कर चले गए.
डर और रोजी-रोटी के बीच फंसी जिंदगी
कश्मीर में काम करने वाले हजारों प्रवासी मजदूरों के लिए सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा और रोजगार के बीच चुनाव का है. यहां उन्हें रोजाना करीब 800 से 1,500 रुपये तक मिलते हैं, जो बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के दूसरे गरीब राज्यों में मिलने वाली मजदूरी से कई मामलों में दोगुनी है.
उत्तर प्रदेश के 42 वर्षीय राजेंद्र कुमार पिछले करीब 20 वर्षों से काम के लिए कश्मीर आते रहे हैं. वह आतंकवाद के सबसे कठिन दौर में भी घाटी में काम करते रहे हैं. 2016 में आतंकी कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद बने तनावपूर्ण माहौल को भी उन्होंने देखा था. उस समय स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में भी सहारा मिला.
हालिया हमले ने उनकी चिंता जरूर बढ़ाई है. परिवार लगातार फोन कर उनकी सुरक्षा के बारे में पूछता है, लेकिन स्थायी रूप से घर लौटना उनके लिए संभव नहीं है. उनके परिवार की आय का बड़ा हिस्सा कश्मीर में मिलने वाली मजदूरी पर निर्भर है.
कश्मीर की कमाई छोड़ना आसान नहीं
राजेंद्र कुमार मध्य कश्मीर के बडगाम जिले के एक ईंट भट्ठे पर काम करते हैं और रोज करीब 800 से 900 रुपये कमाते हैं. उनकी पत्नी और दो बच्चे भी उनके साथ काम करते हैं. पूरे परिवार की कमाई करीब 1,600 रुपये प्रतिदिन या लगभग 40,000 रुपये महीने तक पहुंच जाती है.
इसके मुकाबले उनके गृह क्षेत्र में ईंट भट्ठे या दूसरे असंगठित कामों में रोजाना करीब 300 से 400 रुपये ही मिलते हैं. यही अंतर उन्हें तमाम खतरों के बावजूद कश्मीर लौटने के लिए मजबूर करता है.
तीन साल पहले उत्तर प्रदेश से कश्मीर आए 29 वर्षीय श्रवण कुमार भी इसी स्थिति में हैं. वह पत्नी और दो बच्चों के साथ घाटी आए थे. घर पर जहां उन्हें काम मिलने पर करीब 400 रुपये रोज मिलते थे, वहीं कश्मीर में उनकी कमाई लगभग 800 रुपये प्रतिदिन है.
कुलगाम हमले के बाद उनके परिवार की चिंता बढ़ गई है. पिता उन्हें लगातार सावधान रहने और किसी विवाद में न पड़ने की सलाह देते हैं. लेकिन श्रवण के लिए कश्मीर छोड़ना आसान नहीं है. उनका कहना है कि वे यहां अपने परिवार का भरण-पोषण करने आए हैं और घर पर भी उनकी जिम्मेदारियां हैं.
कश्मीर में प्रवासी मजदूर लगातार निशाने पर
कुलगाम की घटना कोई अकेली घटना नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में प्रवासी मजदूर और दूसरे गैर-स्थानीय नागरिक आतंकियों के निशाने पर रहे हैं.
अक्टूबर 2024 में गांदरबल में एक सुरंग परियोजना पर काम कर रहे छह गैर-स्थानीय मजदूरों और एक स्थानीय डॉक्टर समेत सात लोगों की हत्या कर दी गई थी. इसके बाद बडगाम, शोपियां, अनंतनाग और त्राल में भी प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाकर हमले हुए.
2021 में बिहार और उत्तर प्रदेश के कई मजदूरों की हत्या की गई. 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के कुछ ही समय बाद पुलवामा में छत्तीसगढ़ के एक मजदूर की हत्या हुई. इसके बाद शोपियां में दो ट्रक चालकों और कुलगाम में पश्चिम बंगाल के पांच मजदूरों की हत्या कर दी गई थी.
इन घटनाओं ने निर्माण, ईंट भट्ठों, खेती और रेहड़ी-पटरी जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में काम करने वाले गैर-स्थानीय मजदूरों की सुरक्षा को गंभीर सवाल बना दिया है.
फिर भी मजदूर हर साल लौटते हैं
उत्तर प्रदेश के 42 वर्षीय मोहम्मद जाहिद करीब दो दशक से कश्मीर में काम कर रहे हैं. वह 2011 से लगातार घाटी आते रहे हैं. उनका कहना है कि स्थानीय लोगों के साथ उनका अनुभव अब तक सकारात्मक रहा है और उन्होंने कभी खुद को अलग या असुरक्षित महसूस नहीं किया.
जाहिद को कश्मीर में रोजाना 700 रुपये या उससे अधिक मिलते हैं, जबकि घर पर उन्हें करीब 300 से 400 रुपये मिलते थे. खेत में काम करने के साथ उन्हें नियोक्ता की ओर से खाना और दूसरी सुविधाएं भी मिलती हैं. इसलिए आतंकी हमलों की खबरों के बावजूद वह कश्मीर लौटते हैं.
कश्मीर आने वाले मजदूरों की संख्या भी बड़ी है. हर साल अनुमानित 3 से 4 लाख कुशल और अकुशल प्रवासी मजदूर जम्मू-कश्मीर आते हैं. इनमें बिहार, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के लोग बड़ी संख्या में शामिल हैं. इनमें से कई मजदूर वसंत में घाटी पहुंचते हैं और सर्दियों से पहले अपने घर लौट जाते हैं.
सुरक्षा बढ़ी, लेकिन खतरा पूरी तरह खत्म नहीं
कुलगाम हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा ने सुरक्षा अधिकारियों को आतंकवाद विरोधी अभियान तेज करने के निर्देश दिए. प्रवासी मजदूरों को बेहतर सुरक्षा देने के लिए उन्हें निर्धारित सुरक्षित समूहों में रखने की योजना पर भी चर्चा हुई.
ईंट भट्ठा मालिकों ने भी सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई है. बडगाम के एक भट्ठा मालिक के मुताबिक, कई भट्ठों पर उच्च क्षमता वाले सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और मजदूरों को खाना पकाने के लिए लकड़ी, चिकित्सा सहायता तथा दूसरी जरूरी सुविधाएं दी जाती हैं, ताकि उन्हें कम से कम बाहर जाना पड़े.
पुलिस के अनुसार संवेदनशील इलाकों में नियमित गश्त की जाती है और मजदूरों को हालात के आधार पर सुरक्षा संबंधी निर्देश दिए जाते हैं. हालांकि हर मजदूर को व्यक्तिगत सुरक्षा देना संभव नहीं है.
कश्मीर के प्रमुख धार्मिक नेता मीरवाइज मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने भी प्रवासी मजदूरों की हत्या की निंदा करते हुए कहा कि गरीब मजदूरों को निशाना बनाना इस्लाम और मानवीय मूल्यों के खिलाफ है.
'नागरिक आसान निशाना होते हैं'
जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस प्रमुख के. राजेंद्र कुमार के मुताबिक, आतंकी प्रवासी नागरिकों को इसलिए निशाना बनाते हैं क्योंकि वे आसान लक्ष्य होते हैं और जवाबी कार्रवाई नहीं कर सकते. उनके अनुसार, घाटी में पहले की तुलना में हालात में सुधार हुआ है, लेकिन आतंकियों का उद्देश्य अब डर का माहौल पैदा करना और अपनी मौजूदगी दर्ज कराना है.
इस पूरी स्थिति में प्रवासी मजदूर एक कठिन आर्थिक और सुरक्षा संकट के बीच फंसे हुए हैं. कश्मीर में उन्हें अपने घर से बेहतर मजदूरी मिलती है, जिससे उनके परिवारों की जरूरतें पूरी होती हैं. लेकिन हर आतंकी हमला उनके भीतर यह डर भी पैदा करता है कि अगली गोली किसे निशाना बनाएगी.
फिर भी बहुतों के लिए घर लौटना सुरक्षा का आसान रास्ता नहीं है. वहां लौटने का मतलब कम मजदूरी, अनिश्चित रोजगार और परिवार की आर्थिक परेशानियां हो सकता है. इसलिए इन मजदूरों के सामने विकल्प केवल "कश्मीर में रहना या घर लौटना" नहीं है. असल विकल्प है एक ऐसी जगह पर रहकर परिवार का पेट पालना जहां जान का खतरा मौजूद है, या फिर घर लौटकर उस रोजी-रोटी को खो देना जिस पर पूरा परिवार निर्भर है.

