ज्यादा भारतीय छात्र उच्च शिक्षा छोड़ रहे हैं, क्योंकि अब डिग्री लागत के लायक नहीं लगती

‘स्क्रोल’ में मिलिंद मुरुगकर की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में उच्च शिक्षा की डिग्री का मूल्य लगातार घट रहा है और इसी वजह से छात्रों और अभिभावकों के लिए डिग्री हासिल करने में लगने वाला समय और पैसा अब पहले जैसा उचित निवेश नहीं लगता.

जुलाई के पहले सप्ताह में जब युवा जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा में दाखिले से जुड़े 2022-23 और 2023-24 के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण यानी एआईएसएचई के आंकड़े जारी किए. आंकड़ों के अनुसार, 2011 के बाद पहली बार भारत में स्नातक स्तर पर छात्रों की संख्या में गिरावट आई है. 2023-24 में स्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिला पिछले वर्ष की तुलना में 93,321 कम रहा, यानी 0.29% की गिरावट दर्ज की गई.

महाराष्ट्र में यह गिरावट और अधिक चिंताजनक रही. राज्य में कक्षा 12 के करीब 5% छात्रों ने स्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिला नहीं लिया. 2022-23 में राज्य में स्नातक स्तर पर 36,88,956 छात्र थे, जो 2023-24 में घटकर 35,04,046 रह गए. यानी करीब 1.85 लाख छात्रों की कमी हुई.

यह गिरावट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि महाराष्ट्र देश के सबसे औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों में शामिल है. मुंबई, पुणे, नासिक और औरंगाबाद जैसे शहरों में विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में रोजगार के बड़े अवसर हैं. संगठित क्षेत्र की अच्छी नौकरियों के लिए स्नातक डिग्री आमतौर पर जरूरी मानी जाती है. ऐसे राज्य में युवाओं के बीच डिग्री की घटती अहमियत एक बड़े बदलाव की ओर संकेत करती है.

यह तर्क दिया जा सकता है कि छात्रों ने लंबी अवधि की डिग्री के बजाय कम अवधि के कौशल आधारित प्रमाणपत्र या डिप्लोमा पाठ्यक्रमों का विकल्प चुना होगा. लेकिन एआईएसएचई के आंकड़े इस संभावना की पुष्टि नहीं करते. डिप्लोमा और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों में दाखिले में केवल मामूली वृद्धि हुई है.

ऐसे में सवाल उठता है कि महाराष्ट्र के इतने बड़े हिस्से के युवा अचानक उच्च शिक्षा से दूरी क्यों बनाने लगे. इसका एक कारण शिक्षा के प्रति घटता उत्साह हो सकता है, लेकिन इसके पीछे परिवारों की कमजोर होती आर्थिक क्षमता भी महत्वपूर्ण है. दोनों कारण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.

अधिकांश अभिभावक उच्च शिक्षा को समय और पैसे के निवेश के रूप में देखते हैं. यदि डिग्री हासिल करने के बाद बेहतर रोजगार और स्थिर नौकरी की संभावना नहीं बनती, तो वे इस निवेश की उपयोगिता पर सवाल उठाने लगते हैं. वहीं, जब परिवार की आय स्थिर रहती है या घटती है, तो बच्चों की उच्च शिक्षा छुड़ाने की संभावना बढ़ जाती है.

भारत की स्थिति विकसित देशों से भी काफी अलग है. अमेरिका में हाई स्कूल पूरा करने वाले करीब 64% छात्र डिग्री देने वाले संस्थानों में दाखिला लेते हैं. भारत में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात इससे लगभग आधा है. अधिकांश विकसित देशों में माध्यमिक शिक्षा के बाद औपचारिक उच्च शिक्षा में भागीदारी भारत की तुलना में दोगुने से अधिक है और वहां शिक्षा की गुणवत्ता भी बेहतर है.

विडंबना यह है कि उच्च शिक्षा में दाखिले में गिरावट के आंकड़े ऐसे समय सामने आए जब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में शिक्षा पर सरकारी खर्च का हिस्सा घटने को लेकर भी सवाल उठ रहे थे.

डिग्री के कमजोर होते महत्व को समझने के लिए उसके "सिग्नलिंग वैल्यू" को देखना जरूरी है. सामान्य तौर पर डिग्री नौकरी बाजार को यह संकेत देती है कि व्यक्ति के पास संबंधित ज्ञान और कौशल मौजूद हैं. लेकिन भारतीय कॉलेजों में शिक्षा के गिरते स्तर के कारण डिग्री अब वास्तविक क्षमता की गारंटी देने के बजाय केवल नौकरी के लिए एक न्यूनतम औपचारिक योग्यता बनती जा रही है.

वर्तमान नियामक व्यवस्था में ऐसे नए और आधुनिक शैक्षणिक संस्थान स्थापित करना भी मुश्किल है, जो बाजार की जरूरत के मुताबिक आधुनिक कौशल और ज्ञान उपलब्ध करा सकें. पुराने संस्थानों को वास्तविक प्रतिस्पर्धा से काफी हद तक सुरक्षा मिलती है. उन पर शिक्षण स्तर सुधारने, पाठ्यक्रम बदलने या नई शिक्षण पद्धतियां अपनाने का पर्याप्त दबाव नहीं है.

इसी व्यवस्था का राजनीतिक इस्तेमाल भी हुआ है. लेखक के अनुसार, राजनेता देश में नए शैक्षणिक संस्थानों के सबसे बड़े संचालकों और आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गए हैं. इससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट को बढ़ावा मिला है.

भारत में शिक्षा के "व्यावसायीकरण" की अक्सर आलोचना होती है, लेकिन समस्या केवल निजीकरण या पैसा कमाने तक सीमित नहीं है. एक वास्तविक प्रतिस्पर्धी व्यवस्था में खराब गुणवत्ता वाले संस्थानों को छात्रों की कमी के कारण बाहर होना पड़ता. लेकिन भारत की मौजूदा व्यवस्था में कम गुणवत्ता वाले संस्थान भी लंबे समय तक टिके रह सकते हैं और उनका विस्तार भी हो सकता है.

जब डिग्री से मिलने वाला रोजगार संबंधी लाभ उसमें लगने वाले समय और पैसे की तुलना में कम हो जाता है, तो उच्च शिक्षा से बाहर निकलना छात्रों और अभिभावकों के लिए एक तर्कसंगत आर्थिक फैसला बन जाता है. वे एक ऐसी व्यवस्था से बाहर निकलने का विकल्प चुनते हैं, जिस पर उनका भरोसा कम हो रहा है.

इसी पृष्ठभूमि में कॉकरोच जनता पार्टी ने शिक्षा की गुणवत्ता को राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया. लेखक का मानना है कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, उसकी पहुंच और डिग्री के घटते मूल्य पर राजनीतिक चर्चा को लंबे समय तक जारी रखना जरूरी है.

Previous
Previous

मणिपुर के कुकी-ज़ो समूह ने जनगणना में देरी पर उठाए सवाल, राष्ट्रपति शासन वापस लागू करने की मांग की

Next
Next

झारखंड में मतदाता नाम हटाने वाले फॉर्म की जांच के आदेश