‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद के साथ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार, दिल्ली में प्रदर्शन स्थलों पर लगाई जा रही पाबंदियों, पुलिस की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी पर चर्चा की. बातचीत का मुख्य विषय भारतीय संविधान के तहत नागरिकों को मिले विरोध के अधिकार और जंतर-मंतर जैसे प्रदर्शन स्थलों पर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती देने के लिए दायर की गई याचिका रहा.
अपूर्वानंद ने बताया कि 10 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन से पहले, 8 अक्टूबर की रात से ही लोगों को गिरफ्तार करने और हिरासत में लेने की कार्रवाई शुरू हो गई थी. इसके बाद उन्होंने निषेधाज्ञाओं की वैधता को चुनौती देते हुए अदालत में याचिका दायर की. उनके अनुसार, शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रखना और सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है.
बातचीत में उन्होंने शांति भंग होने की आशंका के आधार पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों पर सवाल उठाए. अपूर्वानंद ने कहा कि जब मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटा दिया जाता है, तो उसके मन में असुरक्षा और चिंता पैदा होती है. ऐसे में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले लोगों के विरोध को शांति भंग करने वाला बताना उचित नहीं है. उन्होंने सवाल किया कि शांतिपूर्ण ढंग से नारे लगाने और भाषण देने को किस आधार पर कानून-व्यवस्था के लिए खतरा माना जा सकता है.
दिल्ली पुलिस की भूमिका पर चर्चा करते हुए अपूर्वानंद ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग और प्रदर्शनकारियों को परेशान करने वाली भीड़ के प्रति कथित नरमी पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि पुलिस का दायित्व शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि लोग अपनी बात रख सकें और उन्हें किसी तरह का नुकसान न पहुंचे.
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में उपलब्ध न कराने और लोगों को अन्य स्थानों पर जाने के निर्देशों पर भी चर्चा हुई. अपूर्वानंद के मुताबिक, विरोध-प्रदर्शन का उद्देश्य सत्ता के केंद्रों तक अपनी बात पहुंचाना होता है. इसलिए प्रदर्शन स्थलों को संसद और सरकार के प्रमुख केंद्रों से दूर करना नागरिकों की आवाज को सीमित कर सकता है. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि लोगों को राजधानी में अपनी बात रखने के लिए भी जगह और अनुमति संबंधी शर्तों का सामना करना पड़े, तो लोकतांत्रिक भागीदारी कैसे सुनिश्चित होगी.
अदालतों की भूमिका पर अपूर्वानंद ने उम्मीद जताई कि न्यायपालिका नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करेगी. उन्होंने कहा कि बहुमत से चुनी गई सरकार भी संविधान से ऊपर नहीं है और न्यायपालिका का दायित्व है कि वह सरकारी फैसलों की संवैधानिकता की समीक्षा करे.
पूरी बातचीत हरकारा रोज़ाना के यूट्यूब चैनल पर सुन सकते हैं.

