'आर्टिकल-14' बेतवा शर्मा लिखती हैं कि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने एक आवासीय परिसर में मकान मालिकों को किराए पर घर देते समय हिंदू परिवारों को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया. नोटिस पर “समिति के आदेशानुसार” लिखा था. भोपाल निवासी प्यारे खान ने 3 सितंबर 2026 को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन 23 अक्टूबर तक, यानी 48 दिन बाद भी प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज नहीं हुई थी. यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब मुस्लिमों के खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने या सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की शिकायतों पर अक्सर तत्काल एफआईआर दर्ज की जाती है.
प्यारे खान ने बताया कि शिकायत पर कार्रवाई की जानकारी लेने के लिए वह कई बार हबीबगंज थाने गए, लेकिन पुलिसकर्मी उन्हें एक-दूसरे के पास भेजते रहे. एक पुलिसकर्मी ने कहा कि पहले जांच होगी, उसके बाद मामला दर्ज किया जाएगा. हालांकि, कानून के अनुसार, यदि शिकायत संज्ञेय अपराध का आरोप लगाती है, तो पुलिस को एफआईआर दर्ज करके जांच करनी चाहिए. यदि शिकायत में आरोप स्पष्ट नहीं हैं, तो एफआईआर दर्ज करने से पहले 14 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच पूरी की जा सकती है.
सितंबर में खान ने भोपाल के 12 नंबर बस स्टॉप इलाके में स्थित नए आवासीय परिसर की दीवार पर यह नोटिस देखा था. इसमें मकान मालिकों से घर किराए पर देने के लिए हिंदू परिवारों को प्राथमिकता देने को कहा गया था. यह परिसर नगर निगम ने केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाया है. खान के अनुसार, नोटिस को देखकर उन्हें गहरा दुख हुआ, क्योंकि यह पहली बार था जब मुस्लिमों को घर किराए पर देने से जुड़ा भेदभाव किसी निजी बातचीत के बजाय सार्वजनिक नोटिस पर स्पष्ट रूप से लिखा गया था.
खान ने यह भी बताया कि जिस जमीन पर आवासीय परिसर बना है, वह कभी उनके दादा की थी. उनके अनुसार, उनके दादा के पास भोपाल में 150 एकड़ जमीन थी, जिसे 1962 में सरकार ने सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित किया था. खान ने छह एकड़ जमीन वापस पाने के लिए अदालत में मामला भी दायर किया है, लेकिन उनके मुताबिक, पिछले तीन वर्षों से इस मामले में प्रगति नहीं हुई है.
खान ने आरोप लगाया कि नोटिस हटाए जाने के बावजूद इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई और न ही माफी मांगी गई. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ऐसा निर्देश मुस्लिमों की ओर से जारी किया गया होता, तो पुलिस और अदालतों की प्रतिक्रिया क्या होती. उनके अनुसार, कानून सभी नागरिकों के लिए समान होना चाहिए.
आर्टिकल-14 से बातचीत में प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े अधिकारियों और स्थानीय निवासियों ने नोटिस जारी करने की जिम्मेदारी से इनकार किया. कुछ लोगों ने इसे नगर निगम का मामला बताया. नगर निगम की जोनल अधिकारी काजल मिश्रा ने कहा कि निगम को इस निर्देश की जानकारी नहीं थी और भवन के संचालन तथा रखरखाव की जिम्मेदारी रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन को सौंप दी गई थी. एक अन्य अधिकारी ने बताया कि परिसर की एसोसिएशन पूरी तरह गठित नहीं हुई थी और वहां एक अस्थायी समिति काम कर रही थी.
रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय मीडिया में खबर आने के बाद नोटिस हटाने में करीब तीन सप्ताह लगे. लेकिन 23 अक्टूबर तक खान को नगर निगम से भी अपनी शिकायत पर कोई जवाब नहीं मिला था. उन्होंने आशंका जताई कि जिम्मेदार लोगों की पहचान और कार्रवाई नहीं होने पर ऐसा नोटिस दोबारा लगाया जा सकता है.
लेख में मध्य प्रदेश में मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार तथा पुलिस कार्रवाई को लेकर व्यापक चिंताओं का भी उल्लेख किया गया है. खान का मामला इस सवाल को सामने लाता है कि धार्मिक आधार पर भेदभाव की शिकायतों पर कानून समान रूप से लागू किया जा रहा है या नहीं.

