मोदी का तमिल संस्करण: अन्नामलाई भाजपा का असफल प्रयोग या चूका हुआ अवसर?
के. अन्नामलाई. क्रेडिट: X.com/annamalai_k
‘साउथ फर्स्ट’ के मुताबिक, 2014 में भाजपा ने अपनी राजनीति का चेहरा बदलते हुए नरेंद्र मोदी को आगे किया. एक ओबीसी पृष्ठभूमि से आने वाले और गैर-वंशवादी नेता के रूप में मोदी को पेश करना पार्टी के लिए एक बड़ा रणनीतिक बदलाव था. इसका असर यह हुआ कि भाजपा ने अपने पारंपरिक सामाजिक आधार से आगे बढ़कर उत्तर और पश्चिम भारत में नए वोट समूहों को जोड़ा और केंद्र की सत्ता में लगातार तीन बार वापसी की.
2020 में जब पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई ने तमिलनाडु की राजनीति में कदम रखा, तो इसे भी भाजपा के उसी मॉडल के विस्तार के रूप में देखा गया. यह प्रयास द्रविड़ राजनीति के गढ़ में एक नए चेहरे को स्थापित करने की कोशिश था, जिसे "तमिलनाडु का मोदी मॉडल" कहा जाने लगा.
लेकिन 2026 में अन्नामलाई के भाजपा से अलग होने की चर्चा के साथ यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ कि क्या यह प्रयोग सफल रहा या यह एक अधूरा राजनीतिक प्रयोग बनकर रह गया. क्या अन्नामलाई ने भाजपा को मजबूत किया या भाजपा ने उन्हें बड़ा बनाया.
अन्नामलाई और भाजपा
अन्नामलाई ने 2019 में आईपीएस सेवा छोड़ने के बाद 2020 में भाजपा जॉइन की. पार्टी नेतृत्व ने उन्हें तुरंत संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी और वे तमिलनाडु भाजपा के उपाध्यक्ष बनाए गए. 2021 में उन्हें अरवाकुरिची से विधानसभा चुनाव लड़ाया गया और उसी साल वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बन गए.
पार्टी ने उन्हें न केवल पद दिए बल्कि राजनीतिक स्वतंत्रता और संसाधनों का भी समर्थन दिया. अन्नामलाई ने पारंपरिक भाजपा नेताओं से अलग जाकर आक्रामक लेकिन अपेक्षाकृत आधुनिक राजनीतिक शैली अपनाई. वे सीधे जनता और युवाओं से संवाद करते दिखे और सोशल मीडिया तथा सार्वजनिक बहसों में सक्रिय रहे.
इस शैली ने उन्हें तमिलनाडु में एक अलग पहचान दी, लेकिन साथ ही एक व्यक्तिगत जनाधार भी तैयार किया जो कई बार पार्टी से बड़ा दिखने लगा. भाजपा के भीतर उनके समर्थक और विरोधी दोनों खेमे सक्रिय हो गए.
वरिष्ठ पत्रकार मलन नारायणन के अनुसार अन्नामलाई और भाजपा के बीच तनाव की शुरुआत एआईएडीएमके गठबंधन को लेकर हुई. अन्नामलाई इस गठबंधन के पक्ष में नहीं थे, जबकि पार्टी के अन्य धड़े इसे जरूरी मानते थे. धीरे-धीरे यह मतभेद संगठनात्मक असंतोष में बदल गया.
मोदी और अन्नामलाई
लेखक और पत्रकार राजसंगीतन का मानना है कि अन्नामलाई दरअसल मोदी मॉडल का तमिल संस्करण हैं. दोनों नेताओं में ओबीसी पृष्ठभूमि, संगठन से बाहर से आना और व्यक्तित्व आधारित राजनीति जैसी समानताएं हैं.
मोदी की तरह अन्नामलाई भी मीडिया पर सीधे निर्भर नहीं रहते, बल्कि अपनी संवाद शैली और सार्वजनिक उपस्थिति से राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करते हैं. लेकिन अंतर यह है कि मोदी अपेक्षाकृत संयमित और संस्थागत तरीके से काम करते हैं, जबकि अन्नामलाई अधिक सीधे और टकरावपूर्ण शैली अपनाते हैं.
राजसंगीतन के अनुसार दोनों नेताओं ने पारंपरिक आक्रामक हिंदुत्व शैली को खुले रूप में नहीं अपनाया, बल्कि एक अधिक रणनीतिक और नियंत्रित राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया. वे खुले तौर पर सांप्रदायिक बयानबाजी से बचते हैं और संस्थागत राजनीति के भीतर रहकर प्रभाव बढ़ाते हैं.
हालांकि अन्नामलाई की राजनीति में एक सीमा भी दिखती है. उनके भाषण अधिकतर डीएमके विरोध पर केंद्रित रहे और वे कोई स्पष्ट वैकल्पिक विकास या सामाजिक एजेंडा नहीं दे पाए. इससे उनकी राजनीतिक पहचान मजबूत तो हुई, लेकिन व्यापक जनाधार में तब्दील नहीं हो सकी.
आगे क्या?
अन्नामलाई के भाजपा से अलग होने की चर्चा ने पार्टी के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं. तमिलनाडु में भाजपा पहले से ही कमजोर स्थिति में है और कई विश्लेषकों का मानना है कि अन्नामलाई के जाने से यह स्थिति और खराब हो सकती है.
मलन नारायणन का कहना है कि भाजपा का उद्देश्य डीएमके को रोकना था, लेकिन यह लक्ष्य अपेक्षित तरीके से हासिल नहीं हो सका. उनके अनुसार पार्टी लगभग दो दशक पीछे चली गई है.
दूसरी ओर कुछ सूत्रों का कहना है कि तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरण बन रहे हैं, खासकर मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के उभार के बाद. इस बदलाव ने पारंपरिक द्रमुक-एआईएडीएमके द्विध्रुवीय राजनीति को प्रभावित किया है.
अन्नामलाई के करीबी मानते हैं कि राज्य में जातीय और सामाजिक समीकरणों के आधार पर एक नया राजनीतिक स्पेस बन रहा है. उनका मानना है कि एक ओबीसी नेता के रूप में अन्नामलाई उस स्पेस को भर सकते हैं, यदि उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक रणनीति अपनाने दी जाए.
असफल कोशिश, लेकिन पूरी तरह असफल नहीं
विश्लेषकों की राय में अन्नामलाई का प्रयोग पूरी तरह असफल नहीं कहा जा सकता. भाजपा ने उन्हें एक ऐसे चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया जो पार्टी को तमिलनाडु में पहचान दिला सके और डीएमके के मुकाबले खड़ा कर सके.
हालांकि यह रणनीति उस स्तर तक सफल नहीं हो सकी जिसकी उम्मीद थी. पार्टी के भीतर पुराने और नए नेतृत्व के बीच तनाव, वैचारिक असमंजस और संगठनात्मक सीमाओं ने इस प्रयोग को कमजोर किया.
राजसंगीतन का मानना है कि भाजपा अब भी तमिलनाडु की सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं को पूरी तरह समझ नहीं पाई है. राज्य में ब्राह्मण विरोधी राजनीति की परंपरा और विभाजनकारी राजनीति के प्रति सामाजिक प्रतिरोध भाजपा के विस्तार में बड़ी बाधा बने हुए हैं.
अंततः अन्नामलाई का राजनीतिक सफर भाजपा के लिए एक प्रयोग था, जो आंशिक रूप से सफल और आंशिक रूप से असफल रहा. यह प्रयोग यह जरूर दिखाता है कि तमिलनाडु की राजनीति में किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के लिए स्थानीय सामाजिक समीकरणों को समझे बिना सफलता पाना आसान नहीं है.

