जनगणना के फील्ड आंकड़े सरकारी दावों से मेल नहीं खा रहे, गणनाकर्मियों को दोबारा सर्वे के निर्देश
डिजिटल जनगणना के लिए घर-घर सर्वेक्षण और डिजिटल मैपिंग करते जनगणनाकर्मी. | फोटो साभार: सुशील कुमार वर्मा.
‘द हिन्दू’ के मुताबिक, देशभर में चल रही जनगणना के दौरान जुटाए जा रहे आंकड़ों और सरकारी रिकॉर्ड के बीच अंतर सामने आने के बाद कई राज्यों में गणनाकर्मियों को घरों का दोबारा दौरा कर जानकारी की समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं. विशेष रूप से खुले में शौच, पेयजल, रसोई ईंधन और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से जुड़े आंकड़ों में सामने आई विसंगतियों ने अधिकारियों का ध्यान खींचा है.
2 जून को राजस्थान के जनगणना संचालन निदेशक ने जिला स्तरीय अधिकारियों को पत्र लिखकर बताया कि अब तक एकत्र किए गए फील्ड डेटा के विश्लेषण में कुछ विसंगतियां सामने आई हैं. अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे जनगणना प्रबंधन एवं निगरानी प्रणाली (सीएमएमएस) पोर्टल के माध्यम से ब्लॉक स्तर के आंकड़ों का वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार सत्यापन करें.
पत्र में विशेष रूप से बड़ी संख्या में परिवारों को "खुले में शौच" की श्रेणी में दर्ज किए जाने का उल्लेख किया गया. इसके अलावा ऐसे परिवार, जिनके पास एलपीजी कनेक्शन हैं, उनके यहां लकड़ी, उपले, फसल अवशेष या मिट्टी के तेल जैसे ईंधनों के इस्तेमाल की प्रविष्टियां भी अधिकारियों की नजर में आईं. पेयजल से जुड़े आंकड़ों में कई घरों के लिए "उपचारित स्रोत से नल का पानी" विकल्प दर्ज नहीं किया गया था. कुछ मामलों में इंटरनेट सुविधा उपलब्ध दिखाई गई, जबकि परिवार के पास मोबाइल फोन या लैंडलाइन नहीं था.
एक वरिष्ठ जनगणना अधिकारी ने कहा कि यह प्रक्रिया केवल आंकड़ों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है. उनके अनुसार फील्ड सत्यापन के दौरान सामने आई किसी भी विसंगति को दूर करना आवश्यक है ताकि अंतिम आंकड़े वास्तविक स्थिति को दर्शा सकें.
हालांकि कई गणनाकर्मियों ने दावा किया है कि उन्हें कुछ प्रविष्टियों को बदलने के लिए दबाव का सामना करना पड़ रहा है. राजस्थान के एक गणनाकर्मी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि यदि किसी घर की छत टीन की हो तो उसे पक्की छत के रूप में दर्ज करने को कहा जाता है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिन घरों में शौचालय नहीं है, वहां आसपास के किसी सार्वजनिक या पड़ोसी के शौचालय की उपलब्धता के आधार पर "शौचालय तक पहुंच" दर्ज करने को कहा जाता है.
उत्तर प्रदेश के एक गणनाकर्मी ने आरोप लगाया कि सरकारी कर्मचारी होने के नाते उन्हें ऐसे विकल्प चुनने से बचने को कहा गया है जो सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
गणनाकर्मियों का कहना है कि सर्वेक्षण के दौरान उन्हें बड़ी संख्या में ऐसे परिवार मिले हैं जिनके पास बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. कई लोगों ने उनसे एलपीजी कनेक्शन, आवास, शौचालय, नल से पानी और पेंशन जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में मदद की मांग की.
उत्तराखंड आंगनवाड़ी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रेखा देवी ने कहा कि कई गांवों में मोबाइल नेटवर्क की समस्या है, जबकि पूरी जनगणना प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से संचालित की जा रही है. उन्होंने बताया कि कर्मचारियों को अपने नियमित कार्यों के साथ-साथ जनगणना की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ रही है.
यह देश की पहली पूर्ण डिजिटल जनगणना है. फिलहाल हाउसलिस्टिंग ऑपरेशन चरण चल रहा है, जिसमें आवास, सुविधाओं और घरेलू संपत्तियों से जुड़े 33 प्रश्न पूछे जा रहे हैं. यह चरण 30 सितंबर तक पूरा किया जाना है. करीब 32 लाख गणनाकर्मी मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए आंकड़े दर्ज कर रहे हैं, जबकि पूरी प्रक्रिया की निगरानी सीएमएमएस पोर्टल पर वास्तविक समय में की जा रही है.

