अजीत साही | हम एक जनविद्रोह को आकार लेते हुए देख रहे हैं 

वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही ने अपने एक विस्तृत विश्लेषण में दावा किया है कि भारत में इस समय जो कुछ हो रहा है, वह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक व्यापक जनविद्रोह की शुरुआत हो सकती है. उनका मानना है कि इतिहास में अधिकांश जनआंदोलनों को उनके निर्णायक मोड़ तक पहुंचने से पहले असंभव माना जाता रहा है.

मौजूदा आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता इसका राष्ट्रीय स्वरूप है. यह किसी एक राज्य, समुदाय या संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में दिखाई दे रहा है. आंदोलन अब किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं रह गया है और यह राजनीतिक तथा आर्थिक असंतोष की व्यापक अभिव्यक्ति बन चुका है.

अजीत साही लिखते हैं, "जनविद्रोह हमेशा असंभव दिखाई देते हैं, जब तक वे सफल नहीं हो जाते." इसी संदर्भ में उनका तर्क है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति लंबे समय तक एक मजबूत और अजेय नेता की छवि पर आधारित रही है. लेकिन वर्तमान घटनाक्रम ने उस छवि को गंभीर चुनौती दी है. किसी भी मजबूत नेता की राजनीतिक ताकत केवल लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके प्रति लोगों के मन में मौजूद भय और सम्मान से भी संचालित होती है. यदि वह भय समाप्त होने लगे, तो सत्ता की वैधता और प्रभावशीलता दोनों कमजोर पड़ने लगती हैं.

विश्लेषण में नई पीढ़ी की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलावों में से एक बताया गया है. Gen-Z प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहले की पीढ़ियों की तरह नहीं देखती. युवाओं के लिए रोजगार, आय, अवसर और भविष्य कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न हैं. आंदोलन में शामिल अनेक युवा खुलकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि वे अपने परिवारों के राजनीतिक विचारों से अलग सोच रखते हैं. यह बदलाव भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना गया है.

"राजनीतिक नैरेटिव बनाए जा सकते हैं, आर्थिक वास्तविकताओं को नहीं." इस टिप्पणी के साथ लेख में प्रदर्शनकारियों की आर्थिक चिंताओं को आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बताया गया है. प्रदर्शन में शामिल बड़ी संख्या उन वर्गों से आती है, जिन्हें पिछले एक दशक में सत्तारूढ़ राजनीति का समर्थक माना जाता रहा है. लेकिन आज उनकी प्रमुख चिंताएं बेरोजगारी, घटती आय और आर्थिक असुरक्षा हैं. लेख का तर्क है कि आर्थिक संकट और जन असंतोष को लंबे समय तक राजनीतिक प्रचार के सहारे छिपाया नहीं जा सकता.

लेख में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बदलते संबंधों का भी उल्लेख किया गया है. इसमें कहा गया है कि जब राज्य की दमनात्मक कार्रवाई से लोगों में भय पैदा होने के बजाय आक्रोश और एकजुटता बढ़ने लगे, तो राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं. इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां सत्ता के पक्ष में मौजूद भय का संतुलन बदलते ही राजनीतिक व्यवस्था कमजोर पड़ गई.

यह आंदोलन अब किसी एक संगठन, नेता या मुद्दे का नहीं रह गया है. इसके समर्थन में देशभर से लोग स्वेच्छा से सहयोग कर रहे हैं. भोजन, दवाइयां और अन्य आवश्यक सामग्री प्रदर्शनकारियों तक पहुंचाई जा रही हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि आंदोलन सामाजिक स्तर पर व्यापक समर्थन हासिल कर रहा है.

अपने निष्कर्ष में अजीत साही लिखते हैं कि इतिहास इस बात की गारंटी नहीं देता कि कोई भी आंदोलन कब और कैसे सफल होगा. लेकिन इतिहास यह अवश्य बताता है कि जब जनता सत्ता से डरना छोड़ देती है, आर्थिक मुद्दे वैचारिक विभाजनों पर भारी पड़ने लगते हैं और समाज के विभिन्न वर्ग एक साझा असंतोष के आधार पर एकजुट होने लगते हैं, तब राजनीतिक परिवर्तन अपेक्षा से कहीं अधिक तेजी से घटित हो सकते हैं. उनके अनुसार, भारत इस समय एक ऐसे ही ऐतिहासिक मोड़ की ओर बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है.

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