रिबॉर्न मनीष | हम अब अकेले नहीं रहे हैं. इस आंदोलन ने लोकतंत्र के लिए सोचने वाली एक नई पीढ़ी तैयार की है.
'हरकारा डीप डाइव' में निधीश त्यागी ने लेखक, शिक्षाविद् और सोशल मीडिया पर अपनी वैचारिक टिप्पणियों के लिए चर्चित रिबॉर्न मनीष से जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन, युवाओं की भूमिका और भारतीय लोकतंत्र के भविष्य पर विस्तार से बातचीत की.
रिबॉर्न मनीष का मानना है कि जंतर-मंतर पर दिखाई दे रहा गुस्सा किसी एक मंत्री, एक मुद्दे या एक राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं है. यह वर्षों से जमा हो रहे सामाजिक और राजनीतिक असंतोष की अभिव्यक्ति है. उनके अनुसार, इस आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसकी अगुवाई किसी राजनीतिक दल के हाथ में नहीं है, बल्कि युवाओं ने स्वयं इसे अपना स्वर दिया है.
वे कहते हैं कि लंबे समय से लोकतंत्र, न्यायपालिका, मीडिया और राजनीतिक संस्थाओं को लेकर समाज में सवाल मौजूद थे, लेकिन लोग उन्हें खुलकर व्यक्त नहीं कर पा रहे थे. आज पहली बार बड़ी संख्या में युवा अपनी बात बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के सामने रख रहे हैं. यह केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी का एक नया अध्याय है.
रिबॉर्न मनीष के अनुसार, आंदोलन के शुरुआती दिनों में उन्हें भी यह संदेह था कि यह एक सीमित और प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह जाएगा. लेकिन जैसे-जैसे युवाओं की भागीदारी बढ़ी, यह आंदोलन अपने मूल स्वरूप से आगे बढ़कर व्यापक जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करने लगा. उन्होंने कहा कि अब यह आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उन युवाओं का है जो पहली बार बिना डरे अपनी बात कह रहे हैं.
बातचीत के दौरान उन्होंने नई पीढ़ी, विशेषकर Gen-Z को लेकर अपनी उम्मीद भी व्यक्त की. उनका कहना है कि जिस पीढ़ी को अक्सर राजनीतिक रूप से उदासीन समझा जाता था, उसी पीढ़ी ने यह साबित कर दिया है कि वह प्रश्न पूछना जानती है और लोकतंत्र के मूल्यों को समझती है. उनके अनुसार, यह भारत की लोकतांत्रिक परंपरा की स्वाभाविक निरंतरता है.
रिबॉर्न मनीष ने मुख्यधारा मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि स्वतंत्र पत्रकारिता और सोशल मीडिया आज लोगों को घटनाओं का एक वैकल्पिक दृष्टिकोण उपलब्ध करा रहे हैं. छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र आवाजें आज उन सवालों को सामने ला रही हैं, जिन्हें पारंपरिक मीडिया में पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा है.
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय राजनीति में बदलाव की प्रक्रिया पहले से चल रही थी, लेकिन अब उसका सामाजिक स्वरूप अधिक स्पष्ट दिखाई दे रहा है. युवाओं, किसानों, मध्यवर्ग और समाज के विभिन्न वर्गों के मुद्दे अब एक-दूसरे से जुड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं. लोकतंत्र में ऐसे क्षण महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि वे नागरिकों को अपनी भूमिका का एहसास कराते हैं.
बातचीत के अंत में रिबॉर्न मनीष ने कहा कि किसी भी सामाजिक या राजनीतिक परिवर्तन में समय लगता है. लेकिन इस आंदोलन ने यह साबित कर दिया है कि भारत की नई पीढ़ी लोकतंत्र के प्रश्नों से दूर नहीं है. उनके शब्दों में, लोकतंत्र हमारे बच्चों के हाथों से फिर से पल्लवित होगा और यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि है. पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

