रोजगार गारंटी योजना अधर में फंसी, ग्रामीण श्रमिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही
‘द हिन्दू’ में ज्यां द्रेज एवं मोहम्मद जमीर के रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार द्वारा भारत की रोजगार गारंटी व्यवस्था में किए गए बदलावों का खामियाजा ग्रामीण श्रमिकों को भुगतना पड़ रहा है. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा की जगह लाई गई विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण यानी वीबी-जी राम जी योजना के तहत रोजगार सृजन में अभूतपूर्व गिरावट के संकेत मिल रहे हैं.
जुलाई 2026 में वीबी-जी राम जी के तहत रोजगार सृजन पिछले वर्ष जुलाई में मनरेगा के मुकाबले 40 प्रतिशत से अधिक घटने की आशंका है. शुरुआत में जुलाई 2026 के लिए 7.7 करोड़ श्रम-दिवस का आंकड़ा सामने आया था, जिसके आधार पर करीब 50 प्रतिशत गिरावट बताई गई. बाद में यह आंकड़ा 8.3 करोड़ हुआ और ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार अंतिम आंकड़ा करीब 9 करोड़ श्रम-दिवस हो सकता है. इसके बावजूद जुलाई 2025 की तुलना में गिरावट 40 प्रतिशत से अधिक रहेगी, जो ग्रामीण रोजगार के लिए बड़ा झटका है.
सरकार का तर्क कितना सही है?
ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस गिरावट का कारण यह बताने की कोशिश की कि कुछ राज्यों ने जुलाई 2026 के कुछ हिस्सों में अधिनियम की धारा 6 के तहत वीबी-जी राम जी का काम रोक दिया था. लेकिन यह स्पष्टीकरण वास्तविक स्थिति को नहीं समझाता. इन राज्यों का कुल मनरेगा रोजगार में हिस्सा बहुत कम है और इन राज्यों को आंकड़ों से हटाने पर भी जुलाई की गिरावट लगभग उतनी ही रहती है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि रोजगार में जुलाई की गिरावट अचानक शुरू नहीं हुई, बल्कि यह संकट कई महीने पहले शुरू हो चुका था.
इसके पीछे वीबी-जी राम जी में संक्रमण की अव्यवस्थित प्रक्रिया भी है. मनरेगा को बदलने की दिशा में विधेयक दिसंबर 2025 में संसद से जल्दबाजी में पारित किया गया था. उस समय ग्रामीण विकास मंत्री ने घोषणा की थी कि नई व्यवस्था 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी. लेकिन 1 अप्रैल को ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि सरकार संक्रमण के लिए तैयार नहीं थी. विशेष रूप से नई व्यवस्था के नियम तक तैयार नहीं थे और मनरेगा मजबूरी में जारी रहा.
22 मई 2026 को ग्रामीण विकास मंत्रालय ने वीबी-जी राम जी के मसौदा नियम सार्वजनिक चर्चा के लिए जारी किए. ये नियम बड़े पैमाने पर मनरेगा के पुराने नियमों और आदेशों का ही दोहराव थे. अंतिम नियम जून के अंत में जारी होने शुरू हुए और 1 जुलाई को मनरेगा की आधिकारिक जगह वीबी-जी राम जी ने ले ली. नई व्यवस्था की मजदूरी दर भी 30 जून को घोषित हुई, जिसमें न्यूनतम दर 300 रुपये प्रतिदिन रखी गई. वास्तविक कीमतों के हिसाब से यह लगभग वही स्तर है जो मनरेगा की 2009-10 की कीमतों पर 100 रुपये प्रतिदिन की पुरानी व्यवस्था में था.
संक्रमण के दौरान जमीनी स्थिति
अप्रैल से जून 2026 के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में भारी भ्रम की स्थिति रही. मनरेगा की पुरानी व्यवस्था समाप्त हो रही थी, लेकिन नई व्यवस्था प्रभावी ढंग से शुरू नहीं हो पा रही थी. कई जिलों में मनरेगा के अधिकारियों ने नए काम शुरू करने से इनकार कर दिया. कई क्षेत्रों में मनरेगा का कोई काम ही उपलब्ध नहीं था.
यह स्थिति इसलिए भी गंभीर थी क्योंकि अप्रैल से जुलाई तक का समय सामान्यतः मनरेगा के लिए सबसे महत्वपूर्ण महीनों में होता है. देश के बड़े हिस्से में इन महीनों में कृषि गतिविधियां अपेक्षाकृत कम होती हैं और ग्रामीण श्रमिकों के लिए रोजगार गारंटी योजना की मांग बढ़ती है.
2024-25 और 2025-26 में अप्रैल से जुलाई के पहले चार महीनों में पूरे वर्ष के रोजगार का लगभग आधा हिस्सा पैदा हुआ था. इन दोनों वर्षों में इस अवधि में क्रमशः 128 करोड़ और 119 करोड़ श्रम-दिवस रोजगार मिला. लेकिन 2026-27 में मनरेगा और वीबी-जी राम जी को मिलाकर अप्रैल से जुलाई के बीच केवल 70 करोड़ श्रम-दिवस रोजगार पैदा हुआ. यह पिछले दो वर्षों के औसत से लगभग 43 प्रतिशत कम है.
रोजगार में गिरावट लगभग सभी बड़े राज्यों में हुई, हालांकि इसकी तीव्रता अलग-अलग रही. आंध्र प्रदेश, असम और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों में गिरावट अपेक्षाकृत कम रही, लेकिन अधिकांश राज्यों में यह 40 प्रतिशत से अधिक थी. 19 बड़े राज्यों में से 10 में रोजगार में 60 से 85 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई.
मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे भारत के बड़े और अपेक्षाकृत गरीब राज्यों में अप्रैल से जुलाई 2026 के दौरान रोजगार सृजन लगभग ठप हो गया. ग्रामीण गरीबों के लिए इन राज्यों में रोजगार गारंटी का इस तरह कमजोर पड़ना विशेष रूप से चिंताजनक है.
बजट बढ़ा, रोजगार घट गया
यह गिरावट इसलिए और चौंकाने वाली है क्योंकि वीबी-जी राम जी को मनरेगा की तुलना में रोजगार बढ़ाने वाली व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया था. 2026-27 के केंद्रीय बजट में वीबी-जी राम जी के लिए 95,692 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. यह 2025-26 में मनरेगा पर हुए वास्तविक खर्च से थोड़ा अधिक है.
अधिकांश राज्यों के लिए कुल खर्च में राज्यों का 40 प्रतिशत योगदान भी शामिल किया जाना है. केंद्र और राज्यों के योगदान को मिलाकर वीबी-जी राम जी के तहत कुल खर्च करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की उम्मीद थी. यह 2025-26 में मनरेगा पर हुए खर्च से लगभग 70 प्रतिशत अधिक होता.
जब मजदूरी की वास्तविक क्रय शक्ति में बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, तब अधिक बजट का स्वाभाविक अर्थ अधिक रोजगार होना चाहिए था. लेकिन हुआ इसके उलट. नई व्यवस्था के शुरुआती चार महीनों में रोजगार सृजन में अभूतपूर्व गिरावट दर्ज हुई.
आगे की राह अनिश्चित
अभी वीबी-जी राम जी पर अंतिम फैसला देना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसकी शुरुआत बेहद कमजोर रही है. देश के कुछ सबसे बड़े और गरीब राज्यों में कई महीनों तक रोजगार का लगभग समाप्त हो जाना गंभीर चेतावनी है.
आने वाले महीनों में स्थिति सुधर सकती है, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि 2026-27 के लिए अनुमानित करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का पूरा खर्च कैसे होगा. मजदूरी भुगतान में भी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. कार्यस्थल पर चेहरे की पहचान की व्यवस्था और केंद्र-राज्य के बीच खर्च बांटने की नई व्यवस्था इसके सामने अतिरिक्त चुनौतियां खड़ी कर सकती है.
इस प्रकार, रोजगार गारंटी कानून में बदलाव का उद्देश्य यदि ग्रामीण रोजगार बढ़ाना था, तो शुरुआती आंकड़े इसके विपरीत तस्वीर दिखा रहे हैं. पुरानी व्यवस्था के कमजोर पड़ने और नई व्यवस्था के ठीक से शुरू नहीं हो पाने के बीच ग्रामीण श्रमिक रोजगार के उस अधिकार से वंचित हो रहे हैं, जिस पर वे कृषि के कमजोर महीनों में विशेष रूप से निर्भर रहते हैं. फिलहाल वीबी-जी राम जी की राह अनिश्चित है और ग्रामीण रोजगार का भविष्य चिंताजनक दिखाई देता है.
ज्यां द्रेज एवं मोहम्मद जमीर रांची, झारखंड में स्वतंत्र शोधकर्ता हैं.

