फरहान सिद्दीकी | आधुनिक भारत में दलित महिलाओं के जीवन में जाति, वर्ग और पितृसत्ता
‘काउंटरकरंट्स’ में प्रकाशित फरहान सिद्दीकी के लेख के मुताबिक, भारत में लैंगिक न्याय की चर्चा केवल एक अमूर्त ‘महिला’ की अवधारणा के आधार पर नहीं की जा सकती. महिलाओं का वास्तविक जीवन श्रम, संपत्ति, जाति, वर्ग और लैंगिक संबंधों से प्रभावित होता है. दलित महिलाओं के मामले में इन सभी स्तरों को अलग-अलग करके देखना संभव नहीं है, क्योंकि उनका शोषण एक साथ जाति, वर्ग और पितृसत्ता से जुड़ा है. यही वजह है कि दलित नारीवाद मुख्यधारा के उस नजरिए को चुनौती देता है, जिसमें जाति को महिलाओं के सवाल से अलग या गौण मुद्दा माना जाता है.
भारत में जाति केवल सामाजिक पहचान या भेदभाव का आधार नहीं रही है. इसने ऐतिहासिक रूप से यह तय किया है कि कौन किस तरह का काम करेगा, किसे संसाधनों तक पहुंच मिलेगी और समाज में किसका दर्जा क्या होगा. दलित समुदायों को लंबे समय तक सम्मानजनक और बेहतर आय वाले कामों से दूर रखा गया. दलित महिलाओं पर इसके साथ लैंगिक शोषण का अतिरिक्त बोझ पड़ा. इसलिए एक दलित महिला एक साथ श्रमिक, वंचित जाति की सदस्य और पितृसत्तात्मक व्यवस्था से प्रभावित महिला होती है. इन तीनों स्थितियों को अलग करके उसका अनुभव समझना संभव नहीं है.
नारीवाद की अलग-अलग धाराओं ने महिलाओं के शोषण को अलग तरीके से समझाया है. उदारवादी नारीवाद ने समान अधिकार, कानून और संस्थागत बराबरी पर जोर दिया. रेडिकल नारीवाद ने पुरुष वर्चस्व और पितृसत्ता को शोषण का मूल आधार माना, जबकि मार्क्सवादी नारीवाद ने वर्ग, श्रम और उत्पादन तथा सामाजिक पुनरुत्पादन की व्यवस्था को केंद्र में रखा. दलित नारीवाद इसमें जाति को जोड़ता है और बताता है कि भारत में महिलाओं की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति जाति से गहराई से प्रभावित होती है.
इस दृष्टि से जाति और वर्ग को भी एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. सदियों से जाति व्यवस्था ने श्रम और आर्थिक संबंधों को आकार दिया है और वर्ग संबंध जातिगत असमानताओं को बनाए रखने में भूमिका निभा सकते हैं. इसलिए वास्तविक सामाजिक बदलाव के लिए जातिगत शोषण, पितृसत्ता और आर्थिक शोषण तीनों को एक साथ चुनौती देना जरूरी है.
दलित महिलाओं के मामले में ‘दलित पितृसत्ता’ की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है. वे अपने समुदाय के भीतर पुरुष नियंत्रण और पितृसत्ता का सामना कर सकती हैं, जबकि प्रभावशाली जातियों की ओर से जातिगत हिंसा और आर्थिक शोषण भी झेलती हैं. इसलिए केवल शिक्षा, रोजगार और कानूनी अधिकार उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है. उन सामाजिक और आर्थिक संबंधों को भी बदलना होगा जो निर्भरता और शोषण पैदा करते हैं. सामूहिक संगठन और एकजुटता इसी मुक्ति की महत्वपूर्ण शर्त हैं.
मंजुला पद्मनाभन के नाटक ‘लाइट आउट’ में इन संबंधों को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण मिलता है. नाटक महिलाओं के खिलाफ हिंसा को सामान्य मान लेने वाली सामाजिक मानसिकता पर सवाल उठाता है. घरेलू कामगार सुशीला और मध्यमवर्गीय पात्रों के बीच संबंध बताते हैं कि घर जैसे निजी माने जाने वाले क्षेत्र में भी वर्ग और सामाजिक असमानता मौजूद रहती है. सुशीला का श्रम घर के भीतर जरूरी है, लेकिन उसकी गरिमा और सुरक्षा को उसी स्तर का महत्व नहीं मिलता.
नाटक में यौन हिंसा को भी व्यापक सामाजिक शक्ति संबंधों से जोड़कर देखा जा सकता है. हिंसा किसी सामाजिक शून्य में पैदा नहीं होती. जब समाज में कुछ लोगों के जीवन को दूसरों की तुलना में कम मूल्यवान माना जाता है, तब हिंसा और उसके प्रति चुप्पी दोनों उस व्यवस्था को मजबूत करते हैं. ‘लाइट आउट’ यह दिखाता है कि चुप रहना भी राजनीतिक रूप से निष्पक्ष नहीं है. हालांकि हाशिये की महिलाओं को केवल असहाय पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय यह उनके प्रतिरोध और एजेंसी की संभावना भी सामने लाता है.
दलित महिलाओं की वास्तविक स्थिति को आंकड़ों से भी समझा जा सकता है. एआईडीएमएएम की 2021 की रिपोर्ट ने बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं की कमजोर सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डाला. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत की लगभग आठ प्रतिशत महिलाएं दलित हैं और उनकी साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से कम है. रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ दर्ज मामलों में केवल 18.9 प्रतिशत मामलों में दोषसिद्धि का उल्लेख है. 81 मामलों में 65 प्रतिशत शारीरिक हिंसा और 16 प्रतिशत यौन हिंसा से संबंधित थे.
2014 से 2019 के बीच अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज शिकायतों में दलित महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अत्याचारों की बड़ी संख्या दर्ज हुई. कानून और उसके लिए जारी होने वाले सरकारी फंड महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल कानून बन जाना पर्याप्त नहीं है. आर्थिक निर्भरता, जातिगत भेदभाव, संस्थागत असमानता और सामाजिक दबाव के कारण हाशिये के समुदायों के लिए कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करना भी मुश्किल हो सकता है.
फिर भी दलित और आदिवासी महिलाओं का इतिहास केवल पीड़ित होने का इतिहास नहीं है. यह प्रतिरोध का इतिहास भी है. आदिवासी कार्यकर्ता हिडमे मरकाम का उदाहरण बताता है कि जमीन, खनन, संसाधनों और राज्य की शक्ति के खिलाफ संघर्ष करने वाली महिलाओं को किस तरह दमन का सामना करना पड़ता है. उन पर आदिवासी महिलाओं के खिलाफ कथित फर्जी मुठभेड़ों और यौन हिंसा के विरोध तथा खनन हितों के खिलाफ सक्रियता के संदर्भ में यूएपीए के तहत कार्रवाई हुई.
भंवरी देवी का मामला भी कानून और सामाजिक बदलाव के बीच के अंतर को दिखाता है. 1991 में बाल विवाह रोकने के काम के दौरान उनके साथ बलात्कार हुआ. इस संघर्ष ने आगे चलकर विशाखा दिशानिर्देश और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़े कानूनी बदलावों में भूमिका निभाई. लेकिन उनके हमलावरों का बरी होना बताता है कि प्रगतिशील कानून होने के बावजूद न्याय व्यवस्था में जातिगत पूर्वाग्रह बने रह सकते हैं.
बंत सिंह का मामला भी प्रतिरोध की कीमत दिखाता है. उन्होंने अपनी बेटी के यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी और आरोपियों को सजा दिलाने में सफलता हासिल की. इसके बाद उन पर बर्बर हमला किया गया, जिसमें उन्होंने दोनों हाथ और एक पैर गंवा दिए. ये उदाहरण बताते हैं कि जाति और लैंगिक सत्ता को चुनौती देने वालों के खिलाफ प्रभावशाली सामाजिक समूह किस तरह प्रतिक्रिया दे सकते हैं.
इसलिए न्याय व्यवस्था को केवल कानूनों की मौजूदगी से नहीं आंका जा सकता. पुलिस, अदालतों और स्थानीय स्तर पर होने वाले अनौपचारिक समझौतों की प्रक्रिया भी जातिगत और लैंगिक असमानता को दोहरा सकती है. घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा जैसे कानून महत्वपूर्ण हैं, लेकिन असमान सामाजिक परिस्थितियों में उनका प्रभाव सीमित हो सकता है.
जरूरत ऐसे विशेष और सक्षम न्यायालयों की है जो एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून को प्रभावी ढंग से लागू कर सकें. पुलिस की कार्रवाई की निगरानी, गंभीर हिंसा के मामलों में अनौपचारिक समझौतों को रोकना, संवेदनशील इलाकों में विशेष सुरक्षा और पीड़ितों के सामाजिक तथा आर्थिक पुनर्वास जैसे कदम जरूरी हैं.
दलित महिलाओं की मुक्ति को केवल लैंगिक बराबरी के सवाल तक सीमित नहीं किया जा सकता. जाति, वर्ग, गरीबी, श्रम और पितृसत्ता उनके जीवन में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इसलिए वास्तविक मुक्ति के लिए जातिगत शोषण, पितृसत्ता और आर्थिक असमानता को एक साथ चुनौती देना होगा. सामूहिक संगठन, श्रम की गरिमा, सामाजिक स्वामित्व और वास्तविक समानता इस बदलाव के केंद्र में होने चाहिए. लैंगिक न्याय तभी व्यापक सामाजिक और आर्थिक मुक्ति का हिस्सा बन सकता है, जब महिलाओं को केवल मौजूदा व्यवस्था में जगह देने के बजाय उन सामाजिक और आर्थिक संरचनाओं को भी बदला जाए जो उनके शोषण को लगातार पुनरुत्पादित करती हैं.
फरहान सिद्दीकी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मानवाधिकार में स्नातकोत्तर हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.

