राकेश कायस्थ | दिमागी नक्सल’ के पीछे की राजनीति क्या है?
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर चर्चा की. बातचीत में इस शब्द की राजनीतिक पृष्ठभूमि, शिक्षा और सवाल पूछने की प्रवृत्ति पर बढ़ते दबाव तथा सरकार की बदलती राजनीतिक स्थिति को समझने की कोशिश की गई.
राकेश कायस्थ के मुताबिक, ‘दिमागी नक्सल’ को महज भाषण का एक जुमला मानकर छोड़ देना ठीक नहीं होगा. उन्होंने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथित ‘बौद्धिक समाजवाद’ की परियोजना से जोड़ते हुए व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि इसका मकसद समाज में बुद्धि के असमान वितरण को खत्म कर सबको एक स्तर पर लाना है. उनके अनुसार, 2014 के बाद एक ऐसे ‘चौथे आदमी’ को राजनीतिक रूप से सशक्त किया गया, जिसे पहले सार्वजनिक बहस में बोलने का अधिकार नहीं मिलता था.
कायस्थ का तर्क है कि इस प्रक्रिया में शिक्षा और बौद्धिकता को लेकर समाज में एक बड़ा बदलाव आया. उनके मुताबिक, ‘बुद्धिजीवी’ शब्द को ही एक तरह की गाली में बदल दिया गया और सोशल मीडिया ने संख्या के आधार पर ज्ञान और विशेषज्ञता को चुनौती देने वाली संस्कृति को बढ़ावा दिया. इसी संदर्भ में वह ‘वन नेशन, वन आईक्यू’ जैसी व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति का इस्तेमाल करते हैं.
‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा को लेकर भी बातचीत में गंभीर सवाल उठता है. कायस्थ पूछते हैं कि आखिर किसी व्यक्ति को दिमागी नक्सल घोषित करने का आधार क्या होगा और कोई आम नागरिक कैसे साबित करेगा कि वह ऐसा नहीं है. वह आशंका जताते हैं कि अगर सवाल पूछना, असहमति और वैज्ञानिक सोच ही संदेह के दायरे में आने लगे, तो लोकतांत्रिक समाज के लिए स्थिति चिंताजनक हो सकती है.
इसी संदर्भ में उन्होंने एच. जी. वेल्स की कहानी ‘द कंट्री ऑफ द ब्लाइंड’ का उदाहरण दिया. कहानी के जरिए उनका सवाल था कि अगर पूरा समाज किसी एक विचार को सामान्य मान ले और अलग देखने या सोचने वाला व्यक्ति असामान्य घोषित कर दिया जाए, तो समस्या व्यक्ति में है या उस समाज की सोच में.
कायस्थ के अनुसार, छात्रों के हालिया आंदोलन ने भी सरकार के सामने एक नई चुनौती खड़ी की है. उनका मानना है कि जिस युवा वर्ग को सत्ता के साथ खड़ा माना जाता था, उसी वर्ग में सवाल और असहमति बढ़ रही है. इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्द को वह राजनीतिक बेचैनी की अभिव्यक्ति के तौर पर देखते हैं.
बातचीत के अंत में कायस्थ ने इसे प्रधानमंत्री मोदी की ‘बौद्धिक समाजवाद’ की परियोजना को बचाने की कोशिश बताया और व्यंग्य करते हुए कहा कि आने वाले समय में ‘दिमागी नक्सल’ भी मोदी काल के चर्चित राजनीतिक जुमलों की सूची में शामिल हो सकता है. सवाल यही है कि यह शब्द कुछ समय बाद खत्म हो जाएगा या भारतीय राजनीति में असहमति को परिभाषित करने वाला स्थायी राजनीतिक शब्द बन जाएगा.
पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

