आसिम अली | साझा कमियां

‘द टेलीग्राफ’ में आसिम अली का यह लेख भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रभुत्व के कारणों और विपक्षी दलों की वैचारिक तथा नीतिगत विफलताओं का गहन विश्लेषण करता है.

लेखक का मानना है कि देश वर्तमान में एक 'लोकतांत्रिक वसंत' का साक्षी बन रहा है. दार्शनिक कॉर्नेलियस कास्टोरियाडिस के अनुसार, लोकतंत्र की आत्मा मौजूदा संस्थागत व्यवस्था पर मौलिक सवाल उठाने में निहित है. पिछले दशक में किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों, मुसलमानों और दलितों के आंदोलनों के माध्यम से यह भावना प्रकट हुई है. विशेष रूप से, जंतर-मंतर से शुरू होकर सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की मांग करने वाले जनरेशन-ज़ेड (जेन-ज़ी) और युवाओं के विकेंद्रीकृत आंदोलन ने शिक्षा प्रणाली के खिलाफ एक व्यापक सामाजिक गठबंधन खड़ा किया है.

भाजपा की 2014 के बाद से केंद्र और कई राज्यों में निरंतर चुनावी सफलता केवल हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के कारण नहीं है, बल्कि यह इसके वैचारिक ढांचे और नवउदारवादी राज्य के गठबंधन का परिणाम है: जैसे—भाजपा 'नवउदारवादी हिंदुत्व' के जरिए शासन चलाती है. उसका हिंदुत्व का कार्य सामाजिक दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है—नागरिकता, पहचान और 'प्रजातंत्र' की सीमाओं को तय करता है. यह कथित बाहरी/आंतरिक खतरों (जिहाद, जनसांख्यिकीय असंतुलन) का हवाला देकर कार्यकारी शक्तियों के केंद्रीकरण को सही ठहराता है.

वहीं नवउदारवाद का कार्य समाज को संगठित करने की तकनीकें प्रदान करता है. नकद हस्तांतरण योजनाओं के जरिए कल्याणकारी योजनाओं का अराजनीतिकरण किया गया है, जिससे सामूहिक लामबंदी कमजोर हुई है. निजीकरण और आउटसोर्सिंग ने जातिगत आरक्षण के दायरे और श्रमिकों के संगठित विरोध के आधार को सीमित कर दिया है.

अली का कहना है कि विपक्ष की वैचारिक विफलता और उसके दोहरे रवैये ने भाजपा को कामयाब बनाया है. विपक्ष (विशेषकर कांग्रेस) भाजपा के उपर्युक्त मॉडल के खिलाफ एक सुसंगत और वैकल्पिक 'सामाजिक परिकल्पना' पेश करने में विफल रहा है. मसलन:

वैचारिक विरोधाभास: एक तरफ राहुल गांधी 90% हाशिए पर मौजूद आबादी बनाम 10% कुलीनपतियों की राजनीति का आह्वान करते हैं, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस शासित राज्यों में भाजपा जैसा ही नवउदारवादी मॉडल अपनाया जा रहा है. कर्नाटक इसका उदाहरण है, जहां राज्य सरकार "भूमि-दलाल" की तरह काम कर रही है. बड़े कॉर्पोरेट घरानों  और रियल एस्टेट के लिए ग्रामीण जमीनों का अधिग्रहण (जैसे 'ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप') किया जा रहा है. प्रस्तावित सुरंग बुनियादी ढांचा परियोजना केवल 3% कार मालिकों के लिए है, जो 'आर्थिक रंगभेद' को दर्शाती है. इसी तरह तेलंगाना का उदाहरण है, जहां ‘'HYDRAA' जैसी प्रवर्तन एजेंसियों के जरिए सत्तावादी और अनुशासनात्मक नवउदारवादी शासन चलाया जा रहा है.

अंत में अली कहते हैं कि युवा आंदोलनों द्वारा उठाए जा रहे मुद्दे—जैसे रोजगारहीन विकास और जर्जर शिक्षा प्रणाली—अतीत की नीतियों से भी जुड़े हैं. भाजपा को चुनौती देने और युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए विपक्ष को प्रचलित नवउदारवादी सहमति से अलग हटकर एक नया और विश्वसनीय सामाजिक-आर्थिक ढांचा पेश करना होगा, जिसकी वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कमी दिखती है.

(आसिम अली एक राजनीतिक शोधकर्ता और स्तंभकार हैं. अंग्रेजी में उनके मूल लेख का यह हिंदी में अनूदित सारांश है.)

Previous
Previous

सुशांत सिंह | ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का कमियों से भरा विवरण, परमाणु तनाव बढ़ने के जोखिमों को उजागर करता है

Next
Next

नवी मुंबई में 3,400 एसआईआर फॉर्म की फोटोकॉपी करते भाजपा कार्यकर्ता पकड़ा गया; 5 बीएलओ निलंबित