सुशांत सिंह | ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का कमियों से भरा विवरण, परमाणु तनाव बढ़ने के जोखिमों को उजागर करता है
‘द कारवां’ में प्रकाशित सुशांत सिंह का यह लेख पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान द्वारा 'ऑपरेशन सिंदूर' (मई 2025 का भारत-पाकिस्तान संघर्ष) पर दिए गए व्याख्यान का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है. 25 अगस्त 2026 को आरएसएस से जुड़े 'विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन' में बोलते हुए जनरल चौहान ने सरकार के आधिकारिक आख्यान को दोहराया कि यह भारत द्वारा जीती गई एक सीमित, 'गैर-संपर्क' सैन्य कार्रवाई थी. हालांकि, लेखक के अनुसार इस दावे में कई गंभीर कमियां और विरोधाभास हैं.
जनरल चौहान के अनुसार, प्रारंभिक योजना अभियानों को केवल ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन और तोपखाने तक सीमित रखने की थी. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बड़े कदम की मांग और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के बहावलपुर मुख्यालय को लक्ष्य बनाने के निर्देश के बाद भारतीय वायु सेना को शामिल करना पड़ा.
राजनीतिक नेतृत्व ने भारतीय वायु सेना पर सैन्य ठिकानों पर हमला न करने की शर्त ('रूल्स ऑफ एंगेजमेंट') लागू की, जिससे पाकिस्तान का वायु रक्षा तंत्र नष्ट नहीं किया जा सका. पाकिस्तान की चीन-समर्थित नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमताओं के कारण भारत ने पहली ही रात लड़ाकू विमान गंवाए. यथार्थवादी अनुमानों के अनुसार भारत ने चार विमान (कम से कम एक राफेल सहित) खोए, जिसे चौहान ने अपने व्याख्यान में नजरअंदाज किया.
चौहान ने दावा किया कि पाकिस्तान केवल व्यावसायिक सैटेलाइट तस्वीरों पर निर्भर था और चीन की भूमिका केवल सामान्य उपकरण रखरखाव तक सीमित थी. इसके विपरीत, उप सेना प्रमुख राहुल आर. सिंह ने स्पष्ट किया था कि डीजीएमओ बातचीत के दौरान पाकिस्तान के पास भारतीय सैन्य संपत्तियों की वास्तविक समय (रियल टाइम) जानकारी थी, जो चीन द्वारा दी जा रही थी.
चीनी राज्य टीवी पर 'एविएशन इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना' के इंजीनियरों ने स्वीकार किया कि वे युद्ध के दौरान पाकिस्तान के J-10CE विमानों को प्रत्यक्ष परिचालन सहायता दे रहे थे. चौहान का इसे सामान्य सहायता बताना दोनों देशों की संयुक्त सैन्य क्षमता को कम आंकने जैसा है.
जनरल चौहान ने युद्धविराम को केवल दो देशों के डीजीएमओ के बीच का स्वतंत्र फैसला बताया और डोनाल्ड ट्रम्प की मध्यस्थता को खारिज किया.
लेखक का तर्क है कि इतना बड़ा निर्णय प्रधानमंत्री मोदी, एनएसए अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के स्तर पर हुआ होगा. भारतीय वायु सेना के तत्कालीन उप प्रमुख नागेश कपूर के अनुसार, युद्धविराम से ठीक पहले अमेरिका ने भारत को पाकिस्तानी बैलिस्टिक मिसाइल हमले की चेतावनी दी थी. यह साबित करता है कि अमेरिका एक सक्रिय मध्यस्थ के रूप में कार्य कर रहा था.
व्याख्यान का सबसे चिंताजनक पहलू सरगोधा के पास 'किराना हिल्स' पर हुआ भारतीय हमला था, जो पाकिस्तान के परमाणु बुनियादी ढांचे से जुड़ा क्षेत्र है. चौहान ने तर्क दिया कि राडार की तलाश कर रहा एक 'हारोप' लोइटरिंग म्यूनिशन ईंधन खत्म होने पर गलती से वहां गिर गया. हालांकि इस दावे पर संदेह है, लेकिन इसे स्वीकार करने पर भी दो परमाणु-सशस्त्र देशों के बीच ऐसी घटना खतरनाक साबित हो सकती है. पाकिस्तान इसे परमाणु परिसंपत्तियों पर हमले के प्रयास के रूप में देख सकता है.
परमाणु हमले के डर से कोई भी देश अपने परमाणु हथियारों को उच्च अलर्ट पर रख सकता है, जिससे दोनों पक्षों में अलर्ट और जवाबी कार्रवाई का चक्र शुरू हो सकता है. यह घटना साबित करती है कि परिचालन संबंधी चूक से अनजाने में परमाणु तनाव बढ़ने का भारी जोखिम रहता है.
सुशांत के इस लेख का निष्कर्ष यह है कि आधिकारिक आख्यान में अनिश्चितताओं, तकनीकी विफलताओं और लड़ाकू विमानों के नुकसान को छिपाने से रणनीतिक स्थिरता हासिल नहीं होती. आधुनिक तकनीक (ड्रोन, लोइटरिंग म्यूनिशन) के दौर में एक भटका हुआ हथियार भी बड़े युद्ध का कारण बन सकता है.
भविष्य के संकटों को टालने के लिए दुस्साहस के बजाय संस्थागत संयम आवश्यक है. मसलन, स्पष्ट राजनीतिक-सैन्य रूल्स ऑफ एंगेजमेंट तय करना, दोनों देशों के बीच विश्वसनीय और त्वरित संकट संचार तंत्र स्थापित करना, अस्पष्ट या गलती से हुए हमलों को तुरंत स्पष्ट करने की प्रक्रियाएं बनाना और नई सैन्य तकनीकों के इस्तेमाल पर निरंतर संवाद बनाए रखना.
(सुशांत सिंह 'द कारवां' के कंसल्टिंग एडिटर हैं और रक्षा व सामरिक मामलों के जानकार भी हैं. यह अंग्रेजी में उनके मूल लेख का हिंदी में अनूदित सारांश है.)

